बिहार में इंजीनियरिंग, मेडिकल में लड़कियों के आरक्षण का प्रस्ताव, नीतीश सरकार का कितना बड़ा मास्टर स्ट्रोक?

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • बिहार में 38 इंजीनियरिंग और 10 मेडिकल कॉलेज हैं.
  • राज्य में इंजीनियरिंग की कुल सीटें तकरीबन नौहज़ार हैं और मेडिकल की 1200 के आसपास.
  • इनमें लड़कियों की हिस्सेदारी महज़ 15 फ़ीसदी है.
  • यानी 85 फ़ीसदी सीटों पर लड़कों का कब़्जा है.

ये आँकड़े बिहार के उच्च तकनीकी शिक्षण संस्थानों (मेडिकल और इंजीनियरिंग) में छात्र-छात्राओं के बिगड़े अनुपात को बताने के लिए काफ़ी है. अपनी सरकार की चौथी पारी में नीतीश कुमार इस पर ध्यान देने की बात कर रहे हैं.

2 जून को विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग की एक रिव्यू मीटिंग में उन्होंने अफ़सरों को इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में लड़कियों के लिए एक तिहाही सीटें आरक्षित करने संबंधी बिल तैयार करने को कहा है.

'द बिहार इंजीनियरिंग यूनिवर्सिटी एक्ट' और 'पॉवर एंड फंक्शन ऑफ़ यूनिवर्सिटिज़ एक्ट' नाम से प्रस्तावित बिल विधानसभा के अगले सत्र में लाए जाने की संभावना है. इसकी जानकारी ख़ुद नीतीश कुमार ने अपने ट्विटर हैंडल से दी.

अगर ये बिल पास हो जाता है, तो बिहार ऐसा करने वाला संभवत: भारत का पहला राज्य होगा. नीतीश कुमार की पार्टी जनता दल (यू) के प्रवक्ता निखिल मंडल ने पटना से बातचीत में बीबीसी को बताया, "ये अचानक लिया गया फ़ैसला नहीं है. 2005 से लेकर 2021 तक हमारी सरकार ने चरणबद्ध और योजनाबद्ध तरीक़े से महिलाओं की बेहतरी के लिए काम किया है. पंचायत में महिलाओं को आरक्षण, साइकिल योजना जैसी योजनाएँ समय-समय पर महिलाओं को बराबरी का अधिकार देने के लिए हम पहले भी लाते रहे हैं."

लेकिन क्या केवल बिहार को ये करने की ज़रूरत है? आइए जानते हैं भारत में क्या है स्थिति.

इंजीनियरिंग में लड़कियों की भागीदारी

  • भारत की आबादी में महिलाओं की भागीदारी लगभग आधी है.
  • 12वीं पास करने वाली लड़कियाँ तकरीबन 45 फ़ीसदी हैं.
  • देश के अलग-अलग कॉलेज़ों में इंजीनियरिंग करने वाली लड़कियाँ 28 फ़ीसदी हैं.
  • लेकिन आईआईटी से बीटेक करने वाली लड़कियाँ केवल 8-10 फ़ीसदी हैं.

तीन साल पहले देश के वर्तमान राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने आईआईटी खड़गपुर में एक समारोह में शिरकत करते हुए कहा था, "एक बात मेरे लिए अब तक पहेली बनी हुई है. 12वीं में लड़कियाँ लड़कों से बेहतर प्रदर्शन करती हैं, लेकिन आईआईटी में उनकी संख्या चिंताजनक रूप से कम क्यों हो जाती है."

इसका उदाहरण रिया सिंह हैं.

रिया सिंह, बिहार के देवघर में रहती है. 12वीं में 90 फ़ीसदी नंबर आने के बाद पहली बार में आईआईटी की परीक्षा पास नहीं कर पाईं, तो उन्होंने घरवालों से अगले साल कोचिंग के लिए कोटा भेजने की ज़िद की. लेकिन रिया के माता-पिता ने साफ़ इनकार कर दिया. मजबूरी में पश्चिम बंगाल के आसनसोल से फिजिक्स में ऑनर्स कर रही हैं.

बीबीसी से बात करते हुए रिया ने कहा, "ऐसा भी नहीं कि घरवालों के पास कोचिंग के लिए पैसे नहीं थे. बस मेरे माता-पिता चाहते हैं कि मैं उनके साथ रह कर पढ़ाई करूँ. मेरी तरह कई और लड़कियाँ होंगी, जो इस सोच की वजह से आगे नहीं बढ़ पाती. पहले तो स्कूलों की पढ़ाई इंजीनियरिंग और मेडिकल के लिए काफ़ी नहीं होती. कोचिंग मिल जाए, एग्ज़ाम भी पास कर लें, तो मनपसंद की ब्रांच नहीं मिलती. माता-पिता हर ब्रांच को महिलाओं के लिए नहीं सही भी नहीं मानते."

भारत में मेडिकल में लड़कियों की भागीदारी

हैदराबाद के एलवीपीई इंस्टीट्यूट के प्रतिष्ठित वैज्ञानिक डॉ. डी बालासुब्रमण्यम ने मेडिकल और इंजीनियरिंग में महिलाएँ कम क्यों हैं? इस पर ख़ूब रिसर्च किया है.

हैदराबाद से बीबीसी से बात करते हुए उन्होंने कहा, "पूरे भारत में साइंस, टेक्नोलॉजी, इंजीनियरिंग, मेडिसिन (STEM) में महिलाओं की औसत हिस्सेदारी मात्र 10-15 फ़ीसदी है. उत्तर भारत में ये आँकडे थोड़े कम और दक्षिण भारत में थोड़े ज़्यादा हो सकते हैं. उनका कहना है कि इंजीनियरिंग के मुक़़ाबले मेडिकल के क्षेत्र में लड़कियाँ थोड़ा ज़्यादा अनुपात में आती हैं. डॉक्टर और नर्स को परंपरागत तौर पर भारत ही नहीं विश्व भर में 'देखभाल' (केयरगिविंग) से जुड़ा पेशा मानते हैं. महिलाओं को इस वजह से मेडिकल प्रोफ़ेशन से ज़्यादा जोड़ कर देखा जाता है. अधिकतर अस्पतालों में नर्स आपको महिलाएँ ही मिलेंगी."

लड़कियों के पिछड़ने की वजह

तकनीकी शिक्षण संस्थानों ख़ास कर आईआईटी में लड़कियों की कमी, केंद्र सरकार के लिए चिंता का सबब थी.

इसके पीछे के कारण का पता लगाने के लिए 2017 में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने तात्कालीन आईआईटी मंडी के डायरेक्टर प्रोफेसर तिमोथी ए गोंज़ालविस की अध्यक्षता में एक कमेटी का गठन किया था. कमेटी ने पाया कि आईआईटी में लड़कियों के कम आने के पीछे दो अहम वजहें हैं. पहला है लड़कियों को लेकर समाज में मौजूद पूर्वाग्रह और दूसरा है रोल मॉडल की कमी.

क्या इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में सीटें आरक्षित करके समाज का पूर्वाग्रह बदला जा सकता है? क्या बिहार सरकार के नए प्रस्ताव से रोल मॉडल की कमी को दूर किया जा सकता है?

इस पर डॉ. डी बालासुब्रमण्यम कहते हैं कि कहीं से तो शुरुआत करनी होगी. ये एक अच्छी पहल है. उम्मीद की जा सकती है बाक़ी राज्य भी इससे सबक लेंगे. 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' जैसे अभियानों ने भी लड़कियों को शिक्षा के क्षेत्र में बढ़ावा देने में अच्छी मदद की है. भारत में गाँव-गाँव तक मोबाइल की पहुँच ने भी लड़कियों को जागरूक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. भले ही बाक़ी लोग इसे इतनी तवज्जो ना देते हों, लेकिन मेरी समझ से मोबाइल ने भी लड़कियों को शिक्षा क्षेत्र में आगे बढ़ने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.

आईआईटी मंडी की रिपोर्ट में भी सिफ़ारिश की गई थी कि लड़कियों के लिए उच्च शिक्षण संस्थानों में सीटें बढ़ानी चाहिए, ताकि लड़कों के लिए अवसर ना घटाते हुए लड़कियों की संख्या बढ़ाई जा सके. इस रिपोर्ट के बाद भारत के 23 आईआईटी में साल 2018 में लड़कियों के लिए 800 सीटें बढ़ाई गईं थी. साल 2020 तक आईआईटी में लड़कियों की संख्या 20 फ़ीसदी करने का प्रस्ताव था.

ज़ाहिर है बिहार सरकार को भी नए प्रस्तावित क़ानून में इस बात का ख़्याल रखना होगा लड़कियों के लिए सीटें आरक्षित करते हुए, लड़कों के लिए सीटें कम ना कर दी जाएँ. साल दर साल इसके लिए एक लक्ष्य भी रखना होगा.

महिलाओं के लिए नीतीश सरकार के पुराने फ़ैसले

दरअसल ये पहला मौक़ा नहीं है, जब नीतीश सरकार ने ख़ास तौर पर लड़कियों के लिए फ़ैसला किया हो.

बिहार देश का पहला राज्य है, जिसने पंचायत और नगर निकायों के चुनाव में महिला आरक्षण लागू किया. हालाँकि गाँवों में महिला सरपंच होने के बावजूद सरपंच पतियों का चलन बिहार में ख़ूब है, लेकिन कई महिला मुखिया ऐसी भी हैं जिन्होंने बेहतर काम किया और नाम कमाया.

मुख्यमंत्री बालिका साइकिल योजना, नीतीश सरकार ने 2007 में शुरू की थी. शुरुआत में आठवीं पास करने के बाद पढ़ने वाली छात्राओं को साइकिल के लिए 2000 रुपए दिए जाते थे. अब इस राशि को बढ़ाकर 3000 रुपए कर दिया गया है. इससे स्कूल जाने वाली छात्राओं की संख्या में बड़ा इजाफ़ा हुआ.

2018 की असर रिपोर्ट (Annual Status of Education Report-ASER) के मुताबिक़ जहाँ 2006 में 11 से 14 साल की लड़कियों का बिहार में ड्रॉप-आउट रेट 17 फ़ीसदी था, 2018 में ये घटकर केवल 4.2 फ़ीसदी ही रह गया.

इतना ही नहीं, छात्राओं को स्कूल यूनिफ़ॉर्म के लिए पैसे दिए जाने लगे. स्कूलों में छात्राओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए उनके इस फ़ैसले को 'गेम-चेंजर' तक कहा गया.

बाल विवाह रोकने और महिला शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से नीतीश सरकार ने 12वीं पास करने वाली अविवाहित लड़कियों को 10 हजार रुपए और स्नातक करने वाली लड़कियों को 25 हज़ार रुपए की प्रोत्साहन राशि देने का भी प्रावधान जोड़ा.

अगर इंजीनियरिंग और मेडिकल कॉलेजों में महिलाओं के आरक्षण का बिल पास हो जाता है, तो इस फेहरिस्त में ये एक उपलब्धि जुड़ जाएगी. माना जाता है कि इन योजनाओं की बदौलत नीतीश कुमार ने 'जातिगत राजनीति' के लिए चर्चित बिहार में 'महिला मतदाताओं' का अपना अलग 'वोट बैंक' तैयार किया है.

ये भी पढ़ें :

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)