जीडीपी में गिरावट अनुमान से कम, क्या मोदी सरकार को इस पर ख़ुश होना चाहिए?

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    • Author, आलोक जोशी
    • पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए

सांस रोककर जिसका इंतज़ार हो रहा था, वो ख़बर आ ही गई. पिछले साल भारत की जीडीपी में गिरावट आशंका से कम रही है और साल की चौथी तिमाही में जितने सुधार का अनुमान लगाया गया था, उससे कुछ बेहतर आंकड़ा सामने आया है.

लेकिन यह जीडीपी के मोर्चे पर पिछले 40 साल से भी ज़्यादा वक़्त का सबसे ख़राब प्रदर्शन है.

फिर भी आंकड़ों पर नज़र रखने वाले अर्थनीति के जानकार कुछ चैन की सांस ले रहे हैं.

वजह यह है कि वित्त वर्ष 2020-21 के लिए जहां क़रीब 8 फ़ीसदी गिरावट का अनुमान लगाया जा रहा था. वहीं यह आंकड़ा 7.3 प्रतिशत पर ही थम गया है. और उस साल की चौथी तिमाही में यानी जनवरी से मार्च के बीच जहां 1.3% बढ़त का अंदाज़ा था वहां 1.6% बढ़त दर्ज हुई है.

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साल की पहली दो तिमाहियों में ज़बर्दस्त गिरावट के बाद तीसरी तिमाही यानी अक्टूबर से दिसंबर के बीच भारत की जीडीपी में मामूली बढ़त दर्ज हुई थी.

0.4% की यह बढ़त उत्साहजनक तो नहीं थी लेकिन इतना संतोष ज़रूर देती थी कि लगातार तीसरी तिमाही मंदी में नहीं बीती. अब संशोधित अनुमान में यह आंकड़ा 0.5% हो गया है. यानी कुछ और बेहतर. और यही भारत की अर्थव्यवस्था के मंदी से उबरने का औपचारिक संकेत भी था.

क्या मानकर चल रहे थे जानकार

ज़्यादातर जानकारों को उम्मीद यही थी कि फ़रवरी 2021 में कोरोना की दूसरी लहर शुरू होने के बावजूद पिछले वित्त वर्ष की चौथी तिमाही यानी इस साल जनवरी से मार्च के बीच भी इकोनॉमी में कुछ सुधार ही नज़र आएगा.

स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया का नाउकास्टिंग मॉडल यानी भविष्यवाणी के बजाय वर्तमान का हाल बताने वाले गणित के हिसाब से इस दौरान जीडीपी में 1.3% की बढ़त दिखनी चाहिए थी.

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ज़ाहिर है तस्वीर बेहतर दिख रही है. लेकिन इन्हीं आंकड़ों में कुछ गहरी चिंताएं भी छिपी हैं. ख़ासकर चौथी तिमाही में जो ग्रोथ रेट दिख रही है वो परेशान करने वाली है.

याद रखिए कि पिछले साल मार्च में लगा लॉकडाउन जून में ख़त्म हो गया था और जुलाई से अनलॉक यानी दोबारा काम धंधे शुरू करने का काम चल रहा था. दिसंबर आते आते क़रीब क़रीब सब कुछ खुल चुका था.

कोरोना की दूसरी लहर का नामोंनिशान भी नहीं था और हालात सामान्य हो चुके थे. कम से कम मान तो लिया ही गया था कि सब कुछ ठीक है. ऐसे में उस तिमाही के लिए सिर्फ़ 1.6% की ग्रोथ दिखाती है कि अर्थव्यवस्था की हालत नाज़ुक है.

मामूली राहत

उधर जीडीपी का आंकड़ा आने से कुछ ही पहले सरकार की तरफ़ से यह एलान भी आया कि साल 2020-21 में देश का फ़िस्कल डेफ़िसिट यानी सरकारी ख़ज़ाने का घाटा जीडीपी का 9.3% हो चुका था. हालांकि यह इससे पहले दिए गए 9.5% के अनुमान से कुछ कम रहा, यह भी मामूली राहत की बात है.

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उधर अर्थव्यवस्था के लिए ज़रूरी आठ सेक्टरों यानी कोर सेक्टर्स में उत्पादन का आंकड़ा पिछले महीने यानी अप्रैल में 56% से ज़्यादा उछाल दिखा रहा है. लेकिन इसकी वजह भारी तेज़ी नहीं बल्कि इसके पिछले साल इसी दौरान पूरे देश में लगा हुआ लॉकडाउन था, जिसकी वजह से सब कुछ ठप था.

और चिंता की ख़बर यह भी है कि प्राइवेट फ़ाइनल कंज़ंप्शन यानी सरकार के अलावा आम लोगों और प्राइवेट कंपनियों की तरफ़ से होने वाले ख़र्च में क़रीब आठ लाख करोड़ रुपए की गिरावट आई है. इसके सामने सरकार का ख़र्च बढ़ा ज़रूर है लेकिन वो भी क़रीब एक लाख अस्सी हज़ार करोड़ रुपए ही है. लेकिन यह तो बीती बातों का ही हिसाब है.

आर्थिक हालात अभी भी कितने चिंताजनक?

इसके बाद की तस्वीर तो खतरनाक दिख रही है और उसमें सुधार के न आसार दिखते हैं न ही कोई रास्ता. हालांकि अब भी ऐसी ख़बरें दिख रही हैं कि महामारी के बावजूद भारत चालू वित्त वर्ष में बहुत तेज़ ग्रोथ दिखाकर दुनिया को चौंका सकता है.

लेकिन ऐसी भविष्यवाणी करने वाले धीरे धीरे अपने अनुमान बदलते जा रहे हैं. बार्कलेज़ ने 2021-22 के लिए भारत की जीडीपी ग्रोथ का अनुमान दूसरी बार घटाकर 11 से 9.2% कर दिया है. और इसके साथ ही उसने और भयानक स्थिति की भी कल्पना की है.

यानी अगर कोरोना की तीसरी लहर आने का डर सच साबित हुआ तब. बार्कलेज़ के अर्थशास्त्रियों का कहना है कि उस हालत में भारत की जीडीपी बढ़ने की रफ्तार और गिरकर इस वित्त वर्ष में 7.7% ही रह सकती है.

लॉकडाउन से होता आर्थिक नुक़सान

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बार्कलेज़ ने हिसाब लगाया है कि मई के महीने में हर एक हफ्ते के लॉकडाउन से आर्थिक गतिविधि को आठ अरब डॉलर का झटका लग रहा है, यानी हर हफ्ते 58 हज़ार करोड़ रुपए. अप्रैल में यही आंकड़ा 5.3 अरब डॉलर था, यानी करीब 38 हज़ार करोड़ और यह भी बार्कलेज़ के उस पुराने अनुमान से काफ़ी ज़्यादा था कि एक हफ्ते का लॉकडाउन मतलब 3.5 अरब डॉलर का नुक़सान. यानी तब हर हफ्ते 25 हज़ार करोड़ रुपए.

उसका कहना है कि मई में तो यह नुक़सान इतना ही रह सकता है लेकिन अगर कहीं जून में भी लॉकडाउन की नौबत आ गई तो हर हफ्ते होने वाला नुक़सान और बड़ा हो सकता है.

यह आशंका अब सिर्फ आशंका नहीं है. देश के अनेक राज्यों में लॉकडाउन जून में भी चलते रहेंगे यह एलान हो चुका है. ऐसे में जीडीपी सुधरेगी कैसे?

मोदी सरकार को क्या करना चाहिए?

नरेंद्र मोदी

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इस सवाल का जवाब घूम फिरकर वही है जो साल भर पहले बताया गया था कि सरकार को बड़े पैमाने पर ख़र्च करना होगा. लोगों की जेब में सीधे पैसा डालना होगा और रोज़गार बचाने या नए रोज़गार पैदा करने के लिए इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट बनाने होंगे और उन उद्योगों को सहारा देना होगा जिन पर मंदी की मार पड़ी है और जहां लोगों की रोज़ी-रोटी पर ख़तरा बड़ा है.

सीआईआई प्रेसिडेंट उदय कोटक सरकार से पूछ चुके हैं कि अब नहीं तो कब. बैंक आरबीआई से मांग कर चुके हैं कि जो लोग क़र्ज़ की किस्त नहीं भर पा रहे हैं उन्हें राहत देने का फिर कोई इंतज़ाम किया जाए. सीएमआईई के सर्वे दिखा रहे हैं कि देश में 97% लोगों की कमाई बढ़ने के बजाय साल भर में कम हो गई है.

और इसी एक साल में देश की लिस्टेड कंपनियों का मुनाफ़ा 57% बढ़ गया है. इसी का नतीजा है कि कंपनियों का कुल मुनाफ़ा अब देश की जीडीपी का 2.63% हो गया है जो दस साल में सबसे ऊंचा है. इस मुनाफ़े की वजह बिक्री या कारोबार बढ़ना नहीं बल्कि ख़र्च में कटौती है.

मुनाफ़े में इस उछाल के बावजूद प्राइवेट सेक्टर नए प्रोजेक्ट लगाने या नया निवेश करने की हालत में नहीं है क्योंकि कारख़ाने दो तिहाई क्षमता पर ही काम कर रहे हैं.

ऐसे में एकमात्र उम्मीद मोदी सरकार से यही है कि वो क़र्ज़ लेकर बांटे, नोट छापकर बांटे या कोई और नया तरीक़ा निकाले. लेकिन इकोनॉमी को गड्ढे से निकालने का काम अब उसी के बस का है.

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