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ग्राउंड रिपोर्ट: बिहार के पूर्णिया में हिंसा, मामला सांप्रदायिक नहीं तो फिर क्या?
- Author, विष्णु नारायण
- पदनाम, मझवा (पुर्णिया, बिहार) से बीबीसी हिन्दी के लिए
बिहार के पूर्णिया में मझवा की महादलित बस्ती के लोगों के लिहाज़ से बीता पूरा सप्ताह अनिश्चितताओं से भरा रहा है. 19 मई की रात यहाँ अल्पसंख्यक समुदाय से संबंध रखनेवाले दर्जनों लोगों ने कथित तौर पर महादलित बस्ती के लोगों पर हमला किया जिसमें एक व्यक्ति पूर्व चौकीदार मेवालाल राय की मौत हो गई.
पुलिस ने इस मामले में अबतक पाँच लोगों को गिरफ़्तार किया है. ये इलाक़ा पूर्णिया ज़िला के बायसी प्रखंड के अंतर्गत पड़ता है.
लेकिन प्रशासन, पुलिस और स्थानीय लोगों से बातचीत के बाद ये लगता है कि पूरा मामला ज़मीन के झगड़े का है.
डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट राहुल कुमार ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि पूरा मामला भूमि विवाद से जुड़ा है और प्रशासन इस बात को लेकर चौकन्ना है कि घटना को कोई और रंग ना दिया जाये.
पूर्णिया ज़िले के बायसी प्रखंड व विधानसभा क्षेत्र के इस इलाक़े में परमान नदी जिसे स्थानीय लोग परवान भी बुलाते हैं, की वजह से इलाक़े की रूपरेखा बदलती रहती है.
मझवा-नियामतपुर गाँव के अधिकांश ग्रामीण (अल्पसंख्यक समुदाय और महादलित समुदाय) साल 1987 से पहले कहीं और रहते थे. चूंकि नदी अपनी धारा बदलती रहती है लोग उससे तालमेल बिठाकर अपने ठिकाने बदलते रहते हैं.
लेकिन इस बीच प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत बनने वाली सड़क के किनारे गुज़र-बसर कर रहे महादलित समुदाय के लोग और अल्पसंख्यक समुदाय के लोग अक्सर भूमि विवाद को लेकर आमने-सामने आ जा रहे हैं.
घटना की रात घायल हुए पुलिसकर्मी दिनेश राय कहते हैं, "उस शाम चार बजे भी दोनों पक्षों के बीच मारपीट हुई. मामला थाने तक पहुँचा और समझा-बुझाकर मामला शांत कराया गया. लेकिन रात साढ़े दस बजे के आसपास बस्ती को 100 से 200 लोगों ने तीनों तरफ़ से घेर लिया. हम बीच में आये, बोले कि हम थाने से हैं तो हमको भी बुरी तरह पीटा गया. हम बेसुध हो गए, फिर भी हमको पीटते रहे."
इस पूरे मामले को लेकर नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव ने ट्विटर के माध्यम से सरकार पर हमला बोला है. तेजस्वी ने ट्वीट करते हुए बायसी की घटना पर लिखा कि बायसी की घटना बिहार और नीतीश सरकार पर कलंक है. साथ ही उन्होंने दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करने व पीड़ित पक्ष के लिए मुआवज़े की माँग की है.
वहीं राजद के वरिष्ठ नेता व पूर्व विधानसभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी मझवा की घटना पर कहते हैं कि "देखिए प्रथमदृष्टया तो यह ज़मीन को लेकर हुआ विवाद लगता है, लेकिन मेरा यह मानना है कि प्रशासन यहाँ पूरी तरह फ़ेल है. यदि प्रशासन तत्पर होता तो ऐसी घटना ना होती. यह प्रशासन का काम है कि इस तरह की विवादित जगहों को चिन्हित करे और उपद्रवी तत्वों को चिन्हित करके उनपर कार्रवाई करे कि भविष्य में ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं दोबारा ना हों."
गाँव में बतौर आशाकर्मी काम करने वाली उर्मिला देवी अपने चोटिल पैर को दिखाते हुए कहती हैं कि टोले में उस रोज़ झगड़ा टटिया (बांस की घेराबंदी) को लेकर शुरू हुआ था. थाने में दोनों पक्षों को समझाने-बुझाने के बाद से सभी को ऐसी उम्मीद थी कि मामला सुलझ जाएगा लेकिन रात को दूसरे पक्ष ने हमला बोल दिया.
उर्मिला देवी कहती हैं कि हमलावरों के हाथ में धारदार हथियार भी थे और उन्होंने न महिलाओं को बख़्शा और न ही बुज़ुर्गों को छोड़ा और उनके बार-बार ये बताने पर कि वो आशाकर्मी हैं और सबके बच्चों का ख्याल रखती हैं किसी पर कोई असर नहीं हुआ.
अपराधी क़िस्म के लोगों से गाँव में टेंशन
मुखिया प्रतिनिधि अरुण यादव बताते हैं कि "ये मामला ज़रा पुराना है. यहां इस सड़क के दोनों ओर महादलित लोगों को बसे हुए 30 से अधिक साल हो गए. पहले इस बस्ती के तमाम लोग इस जगह से थोड़ी दूरी पर पीछे रहते थे लेकिन नदी के कटाव के बाद वे यहां आकर बस गए. इधर सावजी लोग का ज़मीन था और वो लोग बेचकर चले गए."
"बीते 24 अप्रैल को भी यहां आगज़नी हुई थी. ज़मीन के क़ब्ज़ा और बाउंड्री को लेकर दो स्थानीय लोगों के बीच टेंशन हुआ था, लेकिन कुछ जनप्रतिनिधियों ने दोनों पक्षों से बातचीत कर मामले को सुलझा लिया. गांव में पंचायत भी हुई थी. लेकिन फिर मामले में कुछ उपद्रवी तत्व कूद पड़े. हमला करने वालों में से कुछ लोग आपराधिक प्रवृत्ति के हैं. वैसे ही चंद लोगों की वजह से गांव में टेंशन बना रहता है."
खपरा पंचायत के सरपंच प्रतिनिधि मोहम्मद निज़ाम भी कुछ ऐसी ही बात कहते हैं कि यह मामला जो आज इतना बड़ा दिखाई पड़ रहा है वो दरअसल एक-दो मुस्लिम परिवारों और एक-दो महादलित परिवारों के बीच का है.
मोहम्मद निज़ाम के मुताबिक़ दिक़्क़त की शुरुआत वहां से हुई जब कुछ महादलित परिवार के लोग पीछे की आवंटित ज़मीन और घरों को छोड़कर सड़क के किनारे आकर बसने लगे.
उनके हिसाब से यह सारा मामला लोक निर्माण विभाग (PWD) की ज़मीन पर क़ब्ज़े को लेकर है. चूंकि मुस्लिम समुदाय के लोगों की ज़मीनें भी वहीं आसपास हैं. ऐसे में वे अपने सामने की ज़मीन (आमतौर पर सरकारी या गैरसरकारी) पर अपना हक़ समझते हैं और यही बात विवाद के जड़ में है.
उनके अनुसार इस झगड़े को ख़त्म करने के लिए प्रशासन दोनों समुदाय के लोगों को सरकारी ज़मीन से हटाकर बसावे. सरकार ज़मीन ख़रीदे और ज़रूरतमंद में बांटे.
स्थानीय लोगों का मानना है कि पुलिस दोषियों को चिन्हित कर कार्रवाई करे और आम लोगों को परेशान न किया जाए. उनका दावा कि मामले में हिंदू-मुसलमान का कोई मामला है ही नहीं और राजनीतिक लोग इसे अनावश्यक तूल दे रहे.
चूंकि घटना के बाद से मुस्लिम समुदाय के अधिकांश पुरुष वहां से ग़ायब हैं तो हमारी बातचीत 20 वर्षीय शमीमा से हुई. शमीमा कहती हैं कि हम दोनों पार्टी सालों से मेल-मिलाप से ही रहते रहे हैं. लेकिन फ़िलहाल पुलिस प्रशासन की वजह से लोग डरे हुए हैं.
नियामतपुर-मझवा की ओर जाने वाली सड़क ने शायद ही कभी इतनी गहमागहमी देखी गई हो. शासन-प्रशासन की गाड़ियों के साथ ही अलग-अलग पार्टियों के प्रतिनिधि वहां बारी-बारी से पहुँच रहे हैं.
घटना की जानाकारी देते हुए पूर्णिया के डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट राहुल कुमार ने बीबीसी को बताया कि 19 की रात यहां आगज़नी की गई जिसमें 13 घर जल गए, 1 व्यक्ति की मृत्यु भी हो गई.
राहुल कुमार ने कहा कि पाँच लोगों को गिरफ़्तार किया जा चुका है. साथ ही प्रशासन चौकन्ना है और तैयार है कि इस घटना को कोई और रंग न दिया जाए. यह मामला भूमि विवाद से जुड़ा है. पीड़ित और आरोपी पक्ष दोनों स्थानीय हैं और सड़क के किनारे बरसों से बसे हैं.
वो कहते हैं कि प्रशासन प्रशासन पीड़ित पक्ष को उचित मुआवज़ा दिलाने की कोशिश कर रहा है.
हालांकि स्थानीय विधायक सैय्यद रुकनुद्दीन अहमद प्रशासन पर निष्क्रिय का आरोप लगाते हैं. सैय्यद रुकनुद्दीन अहमद असदउद्दीन ओवैसी के दल एआईएमआईएम से तालुक्क़ रखते हैं.
विधायक सैय्यद रुकनुद्दीन अहमद कहते हैं कि साल 2015 में भी कुछ-कुछ ऐसा ही मामला आया था और बीते 24 अप्रैल को भी यहां आगज़नी हुई लेकिन फिर भी प्रशासन सचेत न हुआ और घटना हो गई.
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