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दिल्ली पुलिस के इस जवान की तस्वीर के पीछे की पूरी कहानी
- Author, भूमिका
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
"वर्दी पहने इंसान को देखकर लोग अपने-अपने हिसाब से अंदाज़ा लगा लेते हैं, लेकिन वर्दी के अंदर है तो हाड़-माँस का ही एक आदमी. जो किसी भी दूसरे बेटे की तरह ही सोचता है. बस आंटी को देखकर यही सोचा कि इनको पैदल कैसे जाने दूँ. मेरी माँ-दादी होतीं तो जाने देता क्या..."
कोरोना के इस दौर में बुज़ुर्गों को घर से बेदख़ल कर देने की कई कहानियाँ सामने आई हैं.
ऐसे में दिल्ली पुलिस के बीट कॉन्सटेबल कुलदीप सिंह की कही ये बातें उम्मीद बचाये रखती हैं और राहत देती हैं कि अभी भी बहुत कुछ अच्छा बचा हुआ है.
हो सकता है सोशल मीडिया पर आपने भी वो तस्वीर देखी हो जिसमें दिल्ली पुलिस का एक जवान एक बुज़ुर्ग महिला को गोद में उठाये वैक्सीनेशन सेंटर की ओर बढ़ा जा रहा है. इन शख़्स का नाम कुलदीप सिंह है.
मूल रूप से राजस्थान के हनुमानगढ़ के रहने वाले कुलदीप सिंह दिल्ली पुलिस में बीट कॉन्सटेबल हैं.
उनकी पोस्टिंग उत्तरी दिल्ली के कश्मीरी गेट थाने में है. वो जो बीट देखते हैं उसके तहत सीनियर सिटीज़न्स भी आते हैं. चार महीने पहले ही उनकी पोस्टिंग इस बीट में हुई है. हमने इस वायरल हुई तस्वीर के आगे और पीछे की कहानी समझने के लिए कुलदीप सिंह से बात की.
अपने इलाक़े के बुज़ु्र्गों से मिलते रहना, हाल-चाल पूछना, ज़रूरत में मदद करना कुलदीप की ड्यूटी है.
ख़ासतौर पर उनके संपर्क में रहना जो बुज़ुर्ग हैं और अकेले रहते हैं.
जिन बुज़ुर्ग महिला को गोद में उठाकर कुलदीप वैक्सीन लगवाने ले गए थे, वो 82 साल की रिटायर्ड टीचर शैला डिसूज़ा हैं जो अपनी एक हाउस-हेल्प के साथ रहती हैं. कुलदीप अक्सर उनसे मिलने जाते रहते हैं. कभी दवाइयाँ देने के लिए तो कभी सिर्फ़ हाल-चाल जानने के लिए.
कुछ दिन पहले जब कुलदीप शैला डिसूज़ा के घर गए तो उनके हाथ में काफ़ी दर्द था.
'डर था कि आंटी को कोरोना ना हो जाये'
कुलदीप बताते हैं, "उस दिन मैंने वैक्सीन का दूसरा डोज़ लिया था तो हाथ में दर्द था. पर मैंने सोचा कि उन्हें देख आता हूँ. हाल-चाल ले लेता हूँ. मैं उनके घर गया तो मैं एक तरफ़ बैठकर अपना हाथ सहलाने लगा तो उन्होंने पूछ लिया कि क्या हुआ. मैंने उन्हें बताया कि वैक्सीन ली है तो थोड़ा दर्द है. इस पर आंटी ने कहा कि लगवाना तो मैं भी चाहती हूँ पर लगेगी कैसे..?"
कुलदीप बताते हैं कि मैंने उन्हें कहा कि अगर आप वैक्सीन लगवाना चाहती हैं तो ज़रूर लग जाएगी.
इसके बाद कुलदीप ने अपने अधिकारियों से बात की जिसके बाद अस्पताल में वैक्सीन के लिए बात हो गई.
कुलदीप बताते हैं, "मैं वैक्सीन लगवाने के लिए उन्हें लेने गया तो जैसे ही वो बिस्तर से उतरीं तो मुझे अंदाज़ा हो गया कि इनके लिए मुश्किल है. मेरे दिमाग़ में तुरंत मेरी माँ-दादी आ गईं. मैंने उन्हें बोला आंटी पैदल रहने दो मैं ले चलता हूँ. फिर मैंने उन्हें गोद में उठा लिया और सीढ़ियों से नीचे आ गया."
कुलदीप बताते हैं कि उन्हें किसी बात की चिंता नहीं थी, चिंता बस ये थी कि कहीं आंटी को उनकी वजह से कोरोना ना हो जाए.
वे कहते हैं, "वैसे तो हम सारी सावधानी रखते हैं. लेकिन ड्यूटी भी तो करते हैं. मुझे आंटी को लेकर डर था, इसलिए मैंने उन्हें पीपीई किट पहना दी ताकि वो सुरक्षित रहें."
'दो साल बाद मैंने बाहर की दुनिया देखी'
शैला डिसूज़ा को अरुणा आसिफ़ अली अस्पताल में वैक्सीन की पहली डोज़ लगी.
कुलदीप बताते हैं कि जब वो शैला डिसूज़ा को वापस गोद में घर छोड़ने आये, तब वो बहुत ख़ुश थीं.
कुलदीप कहते हैं कि उन्होंने ज़्यादा कुछ नहीं कहा, सिर्फ़ इतना ही कहा कि "आप जिस तरह से मुझे उठाकर ले गए मुझे बहुत सुरक्षित महसूस हो रहा था. वैक्सीन के बहाने ही सही लेकिन लगभग दो साल बाद मैंने आपकी वजह से बाहर की दुनिया देखी."
कुलदीप दिल्ली शहर में अकेले रहते हैं और उनका मानना है कि शायद यही वजह है कि अब उनकी ड्यूटी से जुड़े लोग भी उन्हें परिवार की तरह लगते हैं.
कुलदीप बताते हैं कि जब से उनकी तस्वीर मीडिया में आयी है, तब से उनका फ़ोन बजे जा रहा है.
वे कहते हैं, "मुझे ख़ुद ही नहीं पता था कि इंसानियत के एक छोटे से काम से मेरा इतना नाम हो जाएगा. मेरे घर से सुबह से फ़ोन आ रहे हैं. गाँव में कोई ऐसा नहीं है जिसके पास एंड्रॉयड फ़ोन हो और उसने देखा नहीं. देख-देखकर फ़ोन कर रहे हैं गाँववाले. घरवाले तो ख़ुशी के मारे कुछ बोल ही नहीं पा रहे."
दिल्ली पुलिस: दो चेहरे, दो पक्ष
लेकिन एक कुलदीप हैं जो बुज़ुर्ग को गोद में उठाते हैं और दूसरी ओर ऐसी कई तस्वीरें हैं जिसमें दिल्ली पुलिस का अलग ही रंग दिखता है. इस पर क्या कहेंगे आप?
कुलदीप कहते हैं, "सख़्ती पुलिस नहीं करती है, पब्लिक ख़ुद करवाती है. अगर पब्लिक लॉकडाउन के नियमों को माने, घर रहे तो क्यों ही ऐसा हो. ये सब उनके स्वास्थ्य और सुरक्षा के लिए ही तो है. बार-बार कहा जाता है, रोज़ अनाउंस किया जाता है कि सुरक्षित रहें, लेकिन कुछ लोग हैं जो नहीं मानते और इसीलिए सख़्ती करनी पड़ती है, क़ानूनी कार्रवाई करनी पड़ती है."
कुलदीप कहते हैं, "पुलिस को लेकर सबकी अपनी राय होती है, लेकिन पुलिस जब जनता के हित के लिए काम करती है तो भी लोग बोलते हैं. तब दुख होता है. मगर ख़ाकी पहनी है तो हमारे लिए सिर्फ़ ड्यूटी ही सब कुछ है."
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