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कोरोना वैक्सीन: इस रफ़्तार से आख़िर कब पूरा होगा अभियान?
- Author, राघवेंद्र राव
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोरोना महामारी की दूसरी लहर से जूझते भारत की उम्मीदें अब टीकाकरण पर टिकी हैं. केंद्र सरकार ने 18 साल से अधिक उम्र के सभी लोगों के लिए टीकाकरण की अनुमति दे दी है लेकिन मौजूदा हालात में बहुत से लोगों के लिए टीका लगवा पाना मुश्किल हो रहा है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 अप्रैल को यह घोषणा की थी कि एक मई से 18 साल से अधिक उम्र के लोगों को वैक्सीन लगनी शुरू हो जाएगी. कोरोना महामारी की दूसरी बड़ी लहर से जूझते भारत के लोगों के लिए यह घोषणा राहत भरी थी.
लेकिन एक मई आने से पहले ही यह साफ़ दिखने लगा कि इस टीकाकरण अभियान की पूरी तैयारी नहीं हो पाई थी. 30 अप्रैल को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने जनता से अपील करते हुए कहा कि वे पहली मई से अस्पतालों के बाहर कतारें न लगाएं क्योंकि वैक्सीन की सप्लाई उपलब्ध नहीं हो पाई है.
हैरानी की बात ये थी कि जहाँ एक तरफ़ दिल्ली सरकार वैक्सीन नहीं ख़रीद पाई, वही 30 अप्रैल की शाम दिल्ली के कुछ प्रमुख निजी अस्पतालों ने यह घोषणा कर दी की उन्हें वैक्सीन का स्टॉक मिल गया है और वे एक मई से 18 साल से अधिक उम्र के लोगों के लिए टीकाकरण शुरू कर रहे हैं.
एक मई की सुबह होते ही दिल्ली के प्रमुख निजी अस्पतालों के बाहर वैक्सीन लगवाने वालों की लंबी क़तारें लग गईं लेकिन दिन के ख़त्म होते होते पूरे देश में 18 से 44 वर्ष के लोगों में से मात्र 84,599 लोगों को पहली डोज़ लग पाई.
कई राज्य सरकारें, जिसमे भारतीय जनता पार्टी शासित सरकारें भी शामिल हैं, यह पहले ही कह चुकी हैं कि उनके पास 18 साल से ऊपर के लोगों को लगाने के लिए पर्याप्त वैक्सीन नहीं है.
कोविन प्लेटफ़ॉर्म पर टीके के लिए रजिस्टर करने के बाद भी 18 से 44 साल के आयु वर्ग के लोगों को वैक्सीन लगवाने के लिए अप्वाइंटमेंट नहीं मिल पा रहा.
वहीं दूसरी ओर निजी अस्पताल वैक्सीन लगाने के लिए लोगों से 900 से 1250 रूपए तक वसूल रहे हैं लेकिन वैक्सीन की कमी के कारण ये निजी अस्पताल भी कम ही संख्या में टीकाकरण कर पा रहे हैं.
मशहूर हृदय रोग विशेषज्ञ और मेदांता अस्पताल के चेयरमैन डॉ नरेश त्रेहन का मानना है कि टीकाकरण के मामले में खुले बाज़ार की नीति अपनाना सही नहीं है.
डॉ त्रेहन कहते हैं, "क़ीमत निर्धारित करके सरकार वैक्सीन ख़रीद लेती और निजी अस्पताल सरकार से ख़रीद लेते. लोगों ने फ्री-मार्केट के कारण अपनी जान-पहचान से या पैसे देकर या किसी के माध्यम से वैक्सीन ख़रीद ली, यह ग़लत है."
डॉ त्रेहन कहते हैं कि वे इस पक्ष में हैं कि प्राइवेट सेक्टर को अनुमति दी जाए लेकिन प्राइवेट सेक्टर के लिए जो क़ीमत तय की गई है उस क़ीमत पर केंद्र सरकार को वैक्सीन ख़रीदकर निजी क्षेत्र को देनी चाहिए. वे कहते हैं, "ये न्यायसंगत होगा और सभी को एक ही क़ीमत पर वैक्सीन मिलेगी."
कितनी वैक्सीन की ज़रूरत है?
भारत में 45 साल से ज़्यादा उम्र के लोगों को अभी तक लगभग 16 करोड़ डोज़ लग चुके हैं लेकिन इस श्रेणी में आने वाले इन 44 करोड़ लोगों के लिए अभी भी 72 करोड़ टीकों की ज़रूरत है, क्योंकि 44 करोड़ लोगों के लिए 88 करोड़ डोज़ की ज़रूरत होगी.
18 से 44 साल के लोगों की संख्या 62 करोड़ के क़रीब है जिनके लिए 124 करोड़ डोज़ की ज़रूरत पड़ेगी.
18 साल से कम उम्र की आबादी को छोड़कर, कुल 106 करोड़ लोग हैं, जिन्हें टीका लगना है. अगर अगले एक साल में भी इन 106 करोड़ लोगों को वैक्सीन लगाने का लक्ष्य रखा जाए तो भी भारत को हर रोज़ लगभग 54 लाख टीके लगाने होंगे.
मौजूदा हालात ये हैं कि भारत में हर दिन औसतन 20 से 25 लाख टीके ही लग पा रहे हैं, शनिवार-रविवार को यह संख्या और भी नीचे आ जाती है. मिसाल के तौर पर दो मई को रविवार था और उस दिन पूरे देश में केवल 12.10 लाख डोज़ ही लगे. वीकेंड के दिनों में टीका लगने की संख्या में भारी गिरावट कई हफ़्तों से देखी जा रही है.
अगर हम यह मानकर चलें कि 70 प्रतिशत आबादी को वैक्सीन लगने से हर्ड इम्युनिटी आ जाएगी तो भी इन 106 करोड़ लोगों में से कम से कम 74 करोड़ लोगों को एक साल में वैक्सीन की दोनों डोज़ लगाने के लिए हर दिन कम से कम 40 लाख लोगों का टीकाकरण सुनिश्चित करना होगा. इस हिसाब से हर महीने 12 करोड़ टीके लगाने होंगे.
कैसा रहा है वैक्सीन रोलआउट?
भारत में जनवरी से टीकाकरण शुरू होने के बाद चार मई की सुबह तक वैक्सीन की कुल 15.89 करोड़ डोज़ ही लगाई जा सकी थी.
इनमें से 12.92 करोड़ पहली डोज़ थीं और 2.97 करोड़ दूसरी डोज़. बहुत से राज्यों में पहली डोज़ लगवा चुके लोग दूसरी डोज़ का इंतज़ार कर रहे हैं लेकिन वैक्सीन की कमी के कारण दूसरी डोज़ लगने में देरी हो रही है.
डॉ नरेश त्रेहन का मानना है कि वैक्सीन वितरण का जो सिस्टम पहले चल रहा था उसे अस्त-व्यस्त करने की ज़रूरत नहीं थी. वे कहते हैं, "अगर निजी कंपनियों को ज़्यादा दाम देने हैं और सरकार का बोझ कम करना है, तो ये होना चाहिए. पर ये जो अव्यवस्था हो गई है बाज़ार में जिन्होंने बैकडोर से वैक्सीन ख़रीद ली वो तो बड़े ख़ुश हैं और बहुत से लोग जिन्हे एक डोज़ लग चुकी थी वो बीच में फँस गए हैं. इस समस्या का समाधान बहुत ज़रूरी है."
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन कई मौक़ों पर कहते रहे हैं कि देश में वैक्सीन की कोई कमी नहीं है. केंद्र सरकार भी हर रोज़ बुलेटिन जारी करके ये बताती रहती है कि उसने राज्यों को अब तक कितने मुफ़्त टीके उपलब्ध कराए हैं और राज्यों के पास कितनी डोज़ बची है.
केंद्र सरकार का कहना है कि सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया को दिए गए 10 करोड़ डोज़ के आर्डर में से तीन मई तक 8.74 करोड़ कोविशील्ड टीकों की डिलीवरी हो चुकी थी. इसी तरह भारत बायोटेक को दिए गए दो करोड़ कोवैक्सीन टीकों के आर्डर में से 88.13 लाख डोज़ तीन मई तक आ चुकी थी.
केंद्र सरकार का यह भी कहना है कि मई, जून और जुलाई के महीनों के लिए उसने 11 करोड़ कोविशील्ड और पाँच करोड़ कोवैक्सीन टीकों की ख़रीद का आर्डर दे दिया गया है.
अगर यह मानकर भी चला जाए कि मई, जून और जुलाई के महीनों में केंद्र राज्यों को 16 करोड़ टीके मुफ़्त उपलब्ध करवा देगा, तो भी राज्य सरकारों और निजी अस्पतालों को मिलकर इन तीन महीनों के लिए 20 करोड़ टीकों का प्रबंध करना होगा.
अगर हर दिन 40 लाख टीके, हर महीने 12 करोड़ टीके या अगले तीन महीनों में 36 करोड़ टीके लगाने लक्ष्य हो, क्योंकि इसके बिना एक साल में टीकाकरण का काम पूरा नहीं हो पाएगा.
क्या रणनीति पर दोबारा सोचने की ज़रूरत है?
अनुमानों के अनुसार सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक मई महीने में कुल नौ करोड़ वैक्सीन डोज़ बना पाएँगे, जिसका 50 प्रतिशत केंद्र सरकार को दिया जाएगा और बाक़ी राज्य सरकारों और निजी अस्पतालों को अधिक दाम पर ख़रीदना होगा.
जहाँ सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक केंद्र सरकार को 150 रूपए की क़ीमत पर वैक्सीन का एक डोज़ उपलब्ध करवा रहे हैं, वहीँ दूसरी तरफ़ दोनों ने राज्य सरकारों और निजी अस्पतालों के लिए वैक्सीन महंगे दामों पर बेचने की घोषणा की है.
सीरम इंस्टीट्यूट राज्य सरकारों को 300 रूपए और निजी अस्पतालों को 600 रूपए प्रति डोज़ की क़ीमत पर वैक्सीन बेच रहा है.
वहीं भारत बायोटेक ने राज्य सरकारों को 400 रूपए और निजी अस्पतालों को 1200 रूपए प्रति डोज़ की क़ीमत पर वैक्सीन बेचने का फ़ैसला किया है.
बीबीसी ने सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक से जानना चाहा कि अब तक उन्होंने कितने टीके केंद्र और राज्य सरकारों को और कितने टीके निजी अस्पतालों को उपलब्ध करवाए हैं. उनसे ये भी पूछा गया कि वे प्रतिदिन या हर हफ्ते या हर महीने कितने टीकों का उत्पादन कर रहे हैं. ये सवाल भी किया गया कि किस-किस राज्य सरकार ने और किन निजी अस्पतालों ने टीके ख़रीदने के लिए ऑर्डर दिए हैं.
सीरम इंस्टीट्यूट और भारत बायोटेक की ओर से इन सवालों का कोई जवाब नहीं दिया गया.
डॉ त्रेहन का मानना है कि अभी भी देर नहीं हुई है. वे कहते हैं, "मेरी सरकार से विनती है कि इसे थोड़ा-सा विराम दें. इस मामले पर पुनर्विचार करके एक हफ़्ते में अभियान दोबारा शुरू किया जा सकता है. यह जो निराशा लोग महसूस कर रहे हैं कि उन्हें वैक्सीन मिलेगी कि नहीं मिलेगी और कब मिलेगी, यह निराशा ऐसे संक्रमण के दौर में लोगों में नहीं आनी चाहिए."
पिछले कुछ दिनों से भारत में कोविड के नए मामलों का आँकड़ा लगातार साढ़े तीन लाख को छू रहा है और हर दिन 3,000 से अधिक जानें जा रही हैं.
अस्पताल में बिस्तर और ऑक्सीजन की कमी से जूझते देश की सबसे बड़ी उम्मीद अब वैक्सीन ही है. लेकिन जिस तरह भारत का टीकाकरण कार्यक्रम चल रहा है, आम लोगों के पास इंतज़ार करने के सिवा कोई रास्ता बचा नहीं दिखा रहा है.
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