विजयन की दोबारा विजय, चार कारणों से ध्वस्त हुई 40 साल पुरानी परंपरा

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    • Author, राघवेंद्र राव
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पिछले 40 वर्षों से केरल में यह परंपरा बन गई थी कि सत्तारूढ़ राजनीतिक दल को पाँच साल बाद बाहर जाने का रास्ता दिखा दिया जाता था.

वहाँ की जनता विपक्ष को सत्ता में ले आती थी, लेकिन अगली बार उसे फिर बाहर कर दिया जाता था. अब वो परंपरा टूट गई, जब केरल ने पिनरई विजयन की अध्यक्षता वाली लेफ़्ट डेमोक्रेटिक फ़्रंट (एलडीएफ़) को लगातार दूसरी बार सरकार बनाने के लिए चुन लिया.

2016 के विधानसभा चुनावों में एलडीएफ़ ने 140 सदस्यों वाले सदन में 91 सीटें जीतकर सरकार बनाई थी, इस बार उसने 93 सीटों पर जीत हासिल की है और दोबारा सरकार बनाने जा रही है.

केरल में ऐसा क्या हुआ जिस वजह से वहाँ के चुनावी गणित में यह फेरबदल आया? बीबीसी ने केरल के कुछ राजनीतिक विश्लेषकों से बात करके यही जानने की कोशिश की.

1. पिनरई विजयन की छवि

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जे. प्रभाष एक राजनीतिक विश्लेषक और केरल विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान के पूर्व प्रोफ़ेसर हैं.

वे कहते हैं, "यह पिनरई विजयन के पक्ष में जनादेश है. उन्होंने ख़ुद को आपदा-प्रबंधक और एक मज़बूत नेता के रूप में स्थापित किया है. लोगों ने विजयन को एक ऐसे नेता के रूप में देखा, जो संकट की स्थिति में प्रदेश का नेतृत्व करने में सक्षम हो."

प्रभाष के अनुसार कांग्रेस की अध्यक्षता वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ़्रंट या भारतीय जनता पार्टी के पास पिनरई जैसा कोई क़द्दावर नेता नहीं था.

वे कहते हैं कि विजयन ने अकेले ही चुनाव अभियान को संभाला और उनके सामने उनकी पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व से भी कोई और नेता उभरकर सामने नहीं आता दिखा.

प्रभाष कहते हैं, "यूडीएफ़ को यह नहीं पता था कि वह लोगों को क्या बताना चाहता है, न ही उसके पास बताने वाला कोई था. एलडीएफ़ के बारे में जनता को बताने का काम सिर्फ़ एक ही व्यक्ति कर रहा था, और वो थे विजयन."

राजनीतिक टिप्पणीकार और स्तंभकार जी. प्रमोद कुमार कहते हैं कि अन्य सभी नेताओं की तुलना में विजयन केरल के सबसे बड़े नेता हैं.

वे कहते हैं, "सीपीएम की एकल आवाज़ के रूप में उन्हें प्रोजेक्ट करने का एक ठोस प्रयास किया गया है. वह पार्टी का चेहरा और आवाज़ हैं. यह जीत विजयन की जीत मानी जाएगी क्योंकि उन्होंने आगे बढ़कर अभियान का नेतृत्व किया."

कुमार यह भी कहते हैं कि यह एक अलग सवाल है कि प्रशासनिक रूप से विजयन सरकार ने जो किया वो अच्छा था या बुरा, लेकिन यही धारणा बनी कि केरल का नेतृत्व करने में वही सक्षम हैं.

कुमार का मानना है कि चाहे पिनरई विजयन का प्रदर्शन अच्छा रहा हो या बुरा, उन्होंने निश्चित रूप से प्रभाव डाला.

वे कहते हैं, "यह काफ़ी हद तक उनका शो था. सभी उम्मीदवारों को उन्होंने ख़ुद चुना. यह काफ़ी हद तक विजयन का ही विचार था कि लगातार दो कार्यकाल जीतने वालों को टिकट नहीं दिया गया था. यह विजयन की इंजीनियरिंग है."

दक्षिण भारत की राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार इमरान क़ुरैशी के अनुसार जो भी स्कैंडल राज्य में हुए, विजयन पर कभी कोई इल्ज़ाम नहीं लगा और उनकी छवि पाक साफ़ रही. उनके अनुसार विजयन सरकार का अच्छा प्रदर्शन और अपने वादों को पूरा करना ही उनके काम आया है.

2. आपदा प्रबंधन में बेहतर प्रदर्शन

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विश्लेषकों का मानना है कि विजयन सरकार ने अपनी लोक कल्याण की नीतियों और आपदा प्रबंधन की कुशलता से लोगों का दिल जीत लिया.

प्रमोद कुमार कहते हैं, "कोविड के दौरान उनकी सरकार ने सामाजिक सुरक्षा पेंशन बढ़ाई है. उन्होंने लोगों को नए तरीक़े से राशन दिया है. इन नीतियों का नतीजा यह निकला कि महामारी के दौर में भी ग़रीब लोगों के पास कुछ पैसा और भोजन था, इसलिए उन्हें इस मुश्किल समय में अधिक संघर्ष नहीं करना पड़ा."

कुमार के अनुसार विजयन सरकार आम तौर पर एक सक्रिय सरकार के रूप में नज़र आई.

वे कहते हैं कि चूँकि यह एक अच्छी तरह से काम करने वाली सरकार थी, इसलिए लोगों में कोई सत्ताविरोधी भावना नहीं थी. कुमार कहते हैं, "कुल मिलाकर यह एक बहुत ही व्यापक और समग्र जीत है. कांग्रेस कुछ भी नहीं कर सकती थी."

प्रभाष कहते हैं, "सरकार के कल्याणकारी उपायों- जैसे पेंशन और राशन किट- ने सरकार के लिए एक सकारात्मक छवि बनाई और लोगों ने घोटालों और भ्रष्टाचार से संबंधित आरोपों की परवाह नहीं की."

वरिष्ठ पत्रकार इमरान क़ुरैशी के अनुसार आपदा प्रबंधन में विजयन सरकार के प्रदर्शन की तारीफ़ हुई.

वे कहते हैं, "जब कभी भी केरल में कोई संकट आया, तो एक बड़ा मज़बूत संदेश लोगों को दिया गया कि राज्य में एक व्यक्ति नेतृत्व कर रहा है. चाहे दो बार बाढ़ की आपदा हो या नीपा वायरस का संकट हो या कोविड महामारी हो, विजयन सरकार हरकत में दिखी. जबसे कोविड का मामला शुरू हुआ, पिनरई विजयन हर चैनल पर लोगों से बात करते नज़र आए. वह स्थिति को नियंत्रण में लिए हुए थे और लोगों को भरोसा दिला रहे थे."

3. अल्पसंख्यकों का एकीकरण

केरल में अल्पसंख्यक

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प्रमोद कुमार का मानना है कि मुस्लिम वोट एलडीएफ़ को इसलिए मिले, क्योंकि उस समुदाय की मुख्य असुरक्षा भाजपा का उदय है.

वे कहते हैं, "यूडीएफ़ और एलडीएफ़ के बीच मुसलमानों ने सोचा होगा कि एलडीएफ़ भाजपा से टक्कर लेने और उनके हितों की रक्षा करने के लिए एक बेहतर पार्टी है."

कुमार यह भी कहते हैं कि प्रदेश में ईसाई मतों का भी ध्रुवीकरण हुआ है. वे कहते हैं कि केंद्रीय त्रावणकोर क्षेत्र में केरल कांग्रेस जो कई वर्षों से कांग्रेस की मज़बूत सहयोगी रही है और जो उस क्षेत्र में सीटें जीतने में यूडीएफ़ और कांग्रेस की मदद करती थी, वो भी एलडीएफ़ के साथ चली गई जिससे बहुत सारे ईसाई वोट एलडीएफ़ में स्थानांतरित हो गए.

कुमार कहते हैं, "तो यहाँ हुआ ये है कि अल्पसंख्यकों में कांग्रेस और यूडीएफ़ के पारंपरिक वोट बड़े पैमाने पर एलडीएफ़ को मिले हैं. 27 प्रतिशत मुसलमानों के साथ ईसाई कुल आबादी का 17 प्रतिशत हैं और ऐसा लगता है कि इस 44 प्रतिशत अल्पसंख्यक आबादी ने एलडीएफ़ का समर्थन किया है. मुस्लिम और ईसाई यूडीएफ़ की पारंपरिक चुनावी रीढ़ थे, उनके समर्थन के बिना यूडीएफ़ चुनाव नहीं जीत सकता."

कुमार का कहना है कि सीपीएम परंपरागत रूप से केरल में एक हिंदू पार्टी रही है और उसके अधिकांश मतदाता हिंदू ही रहे हैं. वे कहते हैं, "यूडीएफ़ से बड़ी संख्या में उच्च जातियों के लोग भाजपा में चले गए और अल्पसंख्यक एलडीएफ़ में स्थानांतरित हो गए, इसलिए यूडीएफ़ के लिए कुछ भी नहीं बचा है."

4. कांग्रेस की आपसी कलह

केरल में कांग्रेस पार्टी के अंदर गुटबाज़ी

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प्रभाष के अनुसार केरल में ज़्यादातर क्षेत्रों में, विशेषकर गाँवों में कांग्रेस की संगठनात्मक संरचना मौजूद नहीं है और इसका ख़मियाज़ा पार्टी को उठाना पड़ा है.

वे कहते हैं कि, "संसाधनों के मामले में भी कांग्रेस की स्थिति अच्छी नहीं है. केरल में पाँच साल और केंद्र में सात साल से सत्ता से बाहर रहने के बाद कांग्रेस पार्टी निश्चित रूप से चुनावों में लड़ने के लिए आवश्यक संसाधन नहीं जुटा पा रही है."

प्रभाष कहते हैं कि ये बात भी यूडीएफ़ के ख़िलाफ़ गई कि उसके दो सहयोगी दल -एलजेडी और केरल कांग्रेस (एम)- एलडीएफ़ में शामिल हो गए.

वे कहते हैं, "यूडीएफ़ में अब मूल रूप से कांग्रेस और मुस्लिम लीग ही बचे हैं. बाक़ी सब उनसे टूटकर बने समूह हैं. दूसरी तरफ़, एलडीएफ़ ग्यारह पार्टी का गठबंधन है जिसमे तीन से पाँच दलों की केरल में बड़ी मौजूदगी है इसलिए यह मुक़ाबला शुरू से ही एकतरफ़ा दिख रहा था."

इमरान क़ुरैशी कहते हैं कि एलडीएफ़ को कांग्रेस के आपसी कलह का भी लाभ मिला. वे कहते हैं, "कांग्रेस की आपसी कलह इतनी ज़्यादा थी कि वह पंचायत चुनाव हार गए. ओमन चांडी और रमेश चेनिथला के गुटों की गुटबाज़ी के चलते पार्टी पंचायत चुनाव हारी. विधानसभा चुनाव के समय साथ मिलकर काम करने की कोशिश की गई पर वो फिर भी नहीं जीत पाए."

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