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बंगाल चुनाव: बीजेपी की पूरी ताक़त के बावजूद चल गया ममता का जादू
- Author, प्रभाकर मणि तिवारी
- पदनाम, कोलकाता से, बीबीसी हिंदी के लिए
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष ममता बनर्जी ने इस बार विधानसभा चुनाव में पार्टी की ओर से एक नारा दिया था - 'खेला होबे' यानी 'खेल होगा'.
और अब चुनाव के नतीजों ने साफ़ कर दिया है कि आठ चरणों में महीने भर से ज़्यादा चले चुनावी खेल में ममता और टीएमसी भारी जीत की ओर बढ़ रहे हैं.
दूसरी ओर, अबकी बार दो सौ पार के नारे के साथ अपनी पूरी ताक़त और संसाधनों के साथ सत्ता हासिल करने के लक्ष्य के साथ मैदान में उतरी बीजेपी अपनी मंज़िल की आधी दूरी भी नहीं तय कर सकी है.
सत्ता की हैट्रिक बनाने के बाद टीएमसी और उसके समर्थकों में जहां जश्न का माहौल है, वहीं बीजेपी में अब इस हार का ठीकरा केंद्रीय नेतृत्व पर फोड़ा जाने लगा है.
पश्चिम बंगाल में इस साल की शुरुआत से ही बीजेपी ने जिस आक्रामक तरीक़े से टीएमसी सरकार पर हमले के साथ बड़े पैमाने पर चुनाव अभियान छेड़ा था उससे कई बार राजनीतिक हलक़ों में भी भगवा पार्टी के सत्ता में आने या टीएमसी को कांटे की टक्कर देने जैसी संभावनाएं जताई जाने लगी थीं.
'आशोल परिवर्तन' का नारा
कुछ राजनीतिक विश्लेषक तो पार्टी के 'आशोल परिवर्तन' के नारे के सच होने की भी भविष्यवाणी करने लगे थे. लेकिन नतीजों ने साफ़ कर दिया है कि बीजेपी के हिंदुत्ववाद पर ममता का बांग्ला उप-राष्ट्रवाद भारी रहा है.
हालांकि यही टीएमसी की जीत की अकेली वजह नहीं है.
क़रीब तीन महीने पूरी केंद्र सरकार के अलावा तमाम मंत्री और नेता और कई राज्यों के मुख्यमंत्री लगातार बंगाल में चुनाव प्रचार में जुटे रहे. इस दौरान शायद ही ऐसा कोई दिन बीता हो जब कोई केंद्रीय मंत्री या नेता यहां रोड शो या रैली नहीं कर रहा हो.
ख़ुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने क़रीब डेढ़ दर्जन रैलियां की थी. केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और दूसरे नेताओं की रैलियों और रोड शो की सूची तो काफ़ी लंबी है.
अपने पूरे ताम-झाम, संसाधनों और हेलीकॉप्टर के ज़रिए चुनाव अभियान चलाने वाली बीजेपी एक समय यह माहौल बनाने में कामयाब रही थी कि वह हर सीट पर टीएमसी को कांटे की टक्कर देगी. लेकिन चुनावी नतीजों ने उसे करारा झटका दिया है.
साल 2019 के लोकसभा चुनाव
हालांकि वर्ष 2016 की तीन सीटों के मुक़ाबले पार्टी के इस प्रदर्शन को बेहतरीन कहा जा सकता है.
और कोई एक दशक के बाद किसी अकेली पार्टी को इतनी ज़्यादा सीटें मिली हैं. लेकिन अगर इसकी तुलना वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव के नतीजों से करें तो पार्टी के लिए यह एक बड़ा झटका है.
दरअसल, बीजेपी की पूरी रणनीति ही लोकसभा चुनाव में 21 सीटों पर मिली बढ़त के इर्द-गिर्द ही बुनी गई थी.
बंगाल में पार्टी की ओर से चुनाव प्रचार भले दर्जनों केंद्रीय नेताओं ने किया हो लेकिन इस चुनाव की पूरी रणनीति शाह ने ही तैयार की थी.
ऐसे में पार्टी का सपना टूटने का ठीकरा भी उनके सिर फूटना तय है. कम से कम प्रदेश बीजेपी नेता तो अभी से उनको कठघरे में खड़ा करने में जुटे हैं.
आख़िर बीजेपी के इस भरी-भरकम अभियान के बावजूद ममता बनर्जी अपना क़िला बचाने में कामयाब कैसे रही हैं?
ममता की जीत की वजहें
इसकी कई वजहें हैं. बीजेपी उनके ख़िलाफ़ भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण के आरोप तो बहुत पहले से लगा रही थीं. साथ ही पार्टी ने जातिगत पहचान का मुद्दा भी बड़े पैमाने पर उठाया था.
मतुआ वोटरों को लुभाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अपनी बांग्लादेश यात्रा के दौरान मतुआ धर्मगुरू हरिचांद ठाकुर के जन्मस्थान पर बने मंदिर में गए थे और वहां से लौट कर मतुआ-बहुल ठाकुरनगर में रैली भी की थी.
अमित शाह ने सीएए के ज़रिए मतुआ समुदाय के लोगों को नागरिकता देने का वादा किया था.
ममता ने बीजेपी के हिंदुत्ववाद की काट के लिए चुनावी मंच से चंडीपाठ तो किया ही, ख़ुद को ब्राह्मण की बेटी भी बताती रहीं. उनको अल्पसंख्यकों का तो भरपूर समर्थन मिला ही, हिंदू वोटरों के बड़े तबक़े ने भी टीएमसी का समर्थन किया.
इसके अलावा उनके पांव में लगी चोट और व्हीलचेयर पर भी पूरा चुनाव अभियाना चलाना भी उनके पक्ष में रहा.
अस्मित का मुद्दा
'कन्याश्री' और 'रूपश्री' जैसी योजनाओं की वजह से बंगाल में महिलाओं ने भी ममता का समर्थन किया. ममता अपने भाषणों के ज़रिए बीजेपी को बाहरी बताते हुए जहां बांग्ला संस्कृति, पहचान और अस्मित का मुद्दा उठाती रहीं.
वहीं, उन्होंने यह माहौल भी बनाया कि देश की अकेली महिला मुख्यमंत्री पर प्रधानमंत्री से लेकर तमाम केंद्रीय नेता और मंत्री किस क़दर हमले कर रहे हैं.
ख़ासकर प्रधानमंत्री जिस तरह दीदी-ओ-दीदी कह कर ममता बनर्जी की खिल्ली उड़ाते रहे, उससे महिलाओं का एक बड़ा तबक़ा ममता के साथ हो गया.
इसके अलावा ममता चुनाव आयोग पर जिस तरह हमले करती रहीं और उस पर बीजेपी के साथ सांठ-गांठ के आरोप लगाती रहीं, उसका भी फ़ायदा टीएमसी को मिला है.
इस चुनाव में कांग्रेस और लेफ्ट वाले संयुक्त मोर्चा की दुर्गति की वजह से इन दोनों दलों के वोटों का बड़ा हिस्सा भी टीएमसी को मिला.
बीजेपी की उम्मीद
पार्टी को कांग्रेस का गढ़ रहे मालदा और मुर्शिदाबाद में जैसी कामयाबी मिली है उससे यह बात साफ़ हो जाती है. बीजेपी को उम्मीद थी कि फुरफुरा शरीफ़ वाली पार्टी इंडियन सेक्यूलर फ्रंट शायद अल्पसंख्यक वोट बैंक में सेंध लगाएगी.
लेकिन न तो वह कोई छाप छोड़ सकी और न ही असदउद्दीन ओवैसी की एआईएमआईएम. ममता ने बीजेपी का मज़बूत गढ़ समझे जाने वाले जंगलमहल इलाक़े में भी ख़ासी सेंध लगाई है और साथ अपने मज़बूत गढ़ को बचाने में काफ़ी हद तक कामयाब रही हैं.
सुबह नतीजे आने से पहले प्रदेश बीजेपी के दफ्तर में भारी भीड़ थी और जश्न जैसा माहौल था. शुरुआती रुझानों में टीएमसी को बढ़त के बावजूद कैलाश विजयवर्गीय का दावा था, 'असली नतीजे आने दीजिए. हम सरकार बनाने जा रहे हैं.'
लेकिन दिन चढ़ने के साथ टीएमसी के साथ सीटों का फ़ासला बढ़ने के साथ ही मुख्यालय के बाहर सन्नाटा छाने लगा था. जबकि दूसरी ओर कालीघाट स्थित ममता बनर्जी के आवास पर सुबह से ही समर्थकों की भीड़ लगातार बढ़ने लगी थी और जश्न का माहौल था.
ब्रैंड की राजनीति
घर के बाहर जुटे एक टीएमसी समर्थक कृष्ण दास कहते हैं, “दीदी ने बीजेपी को मुंहतोड़ जवाब दिया है. अब शायद उसे समझ में आएगा कि उसकी ब्रैंड की राजनीति बंगाल में नहीं चलेगी.”
ममता बनर्जी ने अब तक चुनावी नतीजों पर कोई टिप्पणी नहीं की है. लेकिन शहरी विकास मंत्री फ़िरहाद हकीम कहते हैं कि हमारी जीत तो पहले से तय थी. नतीजे उम्मीदों के अनुरूप ही रहे हैं. बीजेपी के दावे हवा-हवाई साबित हुए हैं.
उनका कहना था, “हम अपनी जीत पर कोई विजय जुलूस नहीं निकलेंगे. राज्य में संक्रमण लगातार बढ़ रहा है. यह आम लोगों की जीत है. इस समय कोरोना महामारी पर अंकुश लगा कर लोगों के साथ खड़े होना ही हमारी प्राथमिकता है.”
उधर, बीजेपी में अब दोषारोपण का दौर शुरू हो गया है. हालांकि किसी भी स्थानीय नेता ने कोई टिप्पणी नहीं की है.
बंगाल चुनाव
लेकिन प्रदेश के एक बीजेपी नेता नाम नहीं छापने की शर्त पर कहते हैं, "पार्टी को स्थानीय नेताओं और कार्यकर्ताओं पर भरोसा नहीं करने का ख़मियाजा चुकाना पड़ा है. बाहरी राज्यों से आने वाले पर्यवेक्षकों ने स्थानीय नेताओं को भरोसे में नहीं लिया और अपने राज्यों के फ़ॉर्मूले को यहां लागू करने का प्रयास किया था. हमने कई बार इसकी शिकायत की थी. लेकिन कुछ भी नहीं हुआ."
एक अन्य नेता कहते हैं, “उम्मीदवारों के चयन में भी प्रदेश के नेताओं की राय नहीं ली गई और कई उम्मीदवार जबरन थोपे गए. दूसरे दलों से आने वालो को रातों-रात टिकट दे दिए गए. इससे निचले स्तर के कार्यकर्ताओं में असंतोष बढ़ा और नतीजों पर उसका असर साफ़ नज़र आ रहा है.”
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि बीजेपी के केंद्रीय नेताओं ने भले ही बंगाल चुनाव में अपने तमाम संसाधन झोंक दिए हों, वह भी जानते थे कि सत्ता हासिल करने की राह बहुत दुर्गम है.
राजनीति विज्ञान के प्रोफ़ोसर पार्थ प्रतिम चक्रवर्ती कहते हैं, “बीजेपी के केंद्रीय नेताओं को बंगाल की ज़मीनी हक़ीक़त की जानकारी नहीं थी. कई मामलों में स्थानीय नेताओं की राय को भी ख़ास अहमियत नहीं दी गई. इसके अलावा उन्होंने ममता और उनकी पार्टी के ख़िलाफ़ जो मुद्दे उठाए थे उनका आम लोगों पर कोई असर नहीं पड़ा. उल्टे बड़ी तादाद में दलबदलुओं को टिकट देना, ममता बनर्जी की लगातार खिल्ली उड़ाना, उनको चोट लगने पर भी व्यंग्य करना, धार्मिक आधार पर ध्रुवीकरण की कोशिश और हिंदुत्व का मुद्दा उठाना बीजेपी को भारी पड़ा है.”
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