You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
सोशल मीडिया पर वायरल '85 साल के बुज़ुर्ग नारायण दाभाडकर के बेड छोड़ने' की कहानी के पीछे का सच क्या है?
- Author, प्रवीण मधोलकर
- पदनाम, बीबीसी मराठी
"नारायण दाभाडकर कोविड के मरीज़ थे लेकिन अस्पताल में इलाज कराने के दौरान उन्होंने अपना ऑक्सीजन बेड एक युवा मरीज़ को दे दिया." नागपुर की यह घटना सोशल मीडिया पर वायरल हो गई और अब इस पर ज़बरदस्त चर्चा छिड़ी हुई है.
दाभाडकर 85 साल के साल थे. नागपुर स्थित सिविल एंड स्टेटिस्टिक्स डिपार्टमेंट से रिटायर हो चुके दाभाडकर पिछले कुछ दिनों से कोविड से संक्रमित थे.
उनकी स्थिति गंभीर थी और उन्हें एक ऑक्सीजन बेड की बेहद ज़रूरत थी. लेकिन कहा जा रहा है कि उन्होंने अपना ऑक्सीजन बेड किसी और मरीज़ को दे दिया. इसके तीन दिन बाद उनकी मौत हो गई.
यह मामला देखते-देखते सोशल मीडिया पर वायरल हो गया.
ट्विटर और फ़ेसबुक पोस्ट पर दाभाडकर की तारीफ़ की झड़ी लग गई. यहां तक कि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान तक ने दाभाडकर की मौत को लेकर ट्वीट किए.
आरएसएस के एक प्रकाशन ने भी दाभाडकर की स्टोरी छापी .
हमने दाभाडकर की मौत और इससे जुड़ी तमाम घटनाओं की सिलेसिलेवार पड़ताल करने की कोशिश की.
इंदिरा गांधी अस्पताल के कोविड विभाग के प्रमुख अजय हरदास उस दिन की घटना याद करते हुए बताते हैं, "22 अप्रैल, 2021 को नारायण दाभाडकर को हमारे कोविड अस्पताल के कैजुअल्टी वार्ड में लाया गया था. वार्ड में लाए जाने के साथ ही हमने तुरंत उनका इलाज शुरू कर दिया था. लेकिन इलाज के दौरान ही उन्होंने कहना शुरू कर दिया कि वह घर जाना चाहते हैं. वह बार-बार कह रहे थे कि मुझे अस्पताल में नहीं रहना है."
हरदास ने इस घटना के बारे में विस्तार से बताते हुए कहा, "हमें पता नहीं कि वे (दाभाडकर के परिजन ) दाभाडकर को घर ले जाने की इजाज़त क्यों माँग रहे थे. 22 अप्रैल को हमारे अस्पताल में बड़ी संख्या में मरीज़ आए थे. चूंकि यह महानगर पालिका का अस्पताल है इसलिए हम किसी को वापस नहीं भेजते. कैजुअल्टी में इलाज के वक़्त नारायण दाभाडकर के शरीर के अंदर ऑक्सीजन का लेवल सुधर रहा था. हम उन्हें कोविड वार्ड में शिफ़्ट करने जा रहे थे लेकिन उनके परिजन हमसे उन्हें घर ले जाने की इजाज़त माँगने लगे. हमने इसकी इजाज़त दे दी."
हरदास ने कहा, "लेकिन घर ले जाने के बाद नारायण दाभाडकर की हालत ख़राब हो गई. उस वक़्त उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट की ज़रूरत थी. लेकिन हमारे अस्पताल में वेंटिलेटर सुविधा नहीं है."
"दाभाडकर के परिवार वालों को उन्हें ऐसे अस्पताल में ले जाना चाहिए था, जहां वेटिंलेटर की सुविधा मौजूद हो. लेकिन अब हमें बड़े दुख के साथ यह कहना पड़ रहा है कि नारायण दाभाडकर हमारे बीच नहीं रहे".
नारायण दाभाडकर की बेटी असावरी कोठीवान ने कहा, "हमारा पूरा परिवार 16 अप्रैल से ही कोविड से संक्रमित था. चूंकि पिता हमारे संपर्क में थे इसलिए वे भी संक्रमित हो गए. उनके कोविड संक्रमित होने की रिपोर्ट 19 अप्रैल को आई. उसके बाद हम घर पर ही उनका इलाज करते रहे. लेकिन जब अचानक उनका ऑक्सीजन लेवल काफ़ी गिर गया तो हम डर गए. उन्हें तुरंत ऑक्सीजन बेड की ज़रूरत थी. काफ़ी कोशिश के बाद हमें गांधीनगर के इंदिरा गांधी अस्पताल में एक ऑक्सीजन बेड मिल गया."
असावरी ने कहा, "ख़राब हालत के बावजूद उन्हें कुछ ही घंटों में घर ले आया गया. पिताजी का कहना था कि उन्होंने अस्पताल में एक महिला को रोते हुए देखा था. महिला के पति की उम्र 40 साल के लगभग होगी. उसे ऑक्सीजन बेड नहीं मिल पा रहा था. पिताजी ने डॉक्टर से कहा, मैंने अपनी ज़िंदगी पूरी जी ली है. इस नौजवान को ज़िंदा रहना चाहिए. मेरा ऑक्सीजन बेड इसे दे दो. बाबा की हालत बेहद नाज़ुक थी. वह इस हालत में कुछ घंटे तक घर में ही रहे. उनके नाख़ून काले हो गए थे और हाथ-पैर सुन्न पड़ गए थे. उन्होंने घर में ही आख़िरी सांस ली."
कई लोगों ने की दाभाडकर की तारीफ़ तो कुछ ने कहा महिमामंडन न करें
नारायण दाभाडकर की मौत के बाद उनकी फ़ोटो और यह घटना सोशल मीडिया पर वायरल हो गई. कई लोगों ने उनके इस काम के लिए उनके प्रति आदर प्रकट किया है वहीं कुछ का कहना है कि इसकी तारीफ़ नहीं की जानी चाहिए.
इंदिरा गांधी अस्पताल नागपुर महानगरपालिका के दायरे में आता है. महानगरपालिका के जनसंपर्क अधिकारी मनीष सोनी से बीबीसी मराठी ने इस घटना के सिलसिले में बात की.
उन्होंने कहा, "22 अप्रैल, 2021 को नारायण दाभाडकर को महानगरपालिका के दायरे में आने वाले गांधीनगर के इंदिरा गांधी अस्पताल में भर्ती कराया गया था. लेकिन वहां कुछ घंटों तक इलाज कराने के बाद उनके परिजन उन्हें घर ले जाने की माँग करने लगे. उन्हें डीएएम (डिस्चार्ज अगेंस्ट मेडिकल एडवाइस) यानी चिकित्सकीय सलाह के ख़िलाफ़ अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. नारायण दाभाडकर से जुड़े अस्पताल के रिकार्ड देखने के बाद यही पता चला है."
क्या कोई मरीज़ अपना बेड किसी दूसरे मरीज़ को दे सकता है?
कोविड की दूसरी लहर में कई मरीज़ों को अस्पतालों में बिस्तर नहीं मिल रहे हैं. नारायण डाभाडकर के परिवार वालों का कहना है कि उन्होंने अपना बेड किसी दूसरे मरीज़ को दे दिया था.
लेकिन नागपुर महानगरपालिका का कहना है, "अपना बिस्तर छोड़ने के बाद मरीज़ को यह तय करने का अधिकार नहीं होता कि यह किसे दिया जाए. बेड मरीज़ों की हालत देख कर मुहैया कराए जाते हैं. जो मरीज़ बेड के लिए इंतज़ार कर रहे होते हैं, उन्हें ही प्राथमिकता के आधार पर यह मुहैया कराया जाता है."
क्या उस युवा मरीज़ को अस्पताल में बिस्तर मिला?
दाभाडकर की बेटी ने दावा करते हुए कहा, "पिता ने कहा था कि वह घर जाना चाहते हैं. इसके बदले वह अपना बेड उस 40 साल के युवा मरीज़ को देना चाह रहे थे, जिसे इसकी ज़रूरत थी."
लेकिन दाभाडकर की बेटी ने जिस युवा मरीज़ को बिस्तर देने की बात कही थी, काफ़ी कोशिश के बाद भी उनके बारे में पता नहीं चल सका है.
हालांकि, नागपुर महानगरपालिका के इंदिरा गांधी अस्पताल के डॉक्टरों का कहना है कि दाभाडकर की हालत नाज़ुक हो जाने के बाद उन्हें वेंटिलेटर पर रखे जाने की ज़रूरत थी.
लेकिन इस अस्पताल में वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं था. दाभाडकर अस्पताल के इमरजेंसी विभाग में भर्ती थे. जबकि पाँच अन्य मरीज़ कोविड वार्ड में इमरजेंसी में इलाज का इंतज़ार कर रहे थे."
नारायण दाभाडकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सक्रिय सदस्य थे. उनका ताल्लुक़ नागपुर के पावन भूमि इलाक़े में मौजूद श्रीराम शाखा से था.
आरएसएस के विदर्भ प्रांत प्रचार प्रमुख अनिल सांबरे ने भी दाभाडकर को श्रद्धांजलि दी है.
उन्होंने कहा, "आरएसएस के वरिष्ठ स्वयंसेवक से जुड़ी घटना सच है. उन्होंने अस्पताल को कहा था कि उनका छोड़ा गया बिस्तर दूसरे मरीज़ को दे दिया जाए. लेकिन उनके बारे में सोशल मीडिया में कुछ लोग शरारतपूर्ण तरीक़े से ग़लत सूचनाएं फैला रहे हैं. "
हालांकि आरएसएस ने अभी तक इस पूरी घटना पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)