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कोरोना: योगी आदित्यनाथ का दावा - "कोई कमी नहीं है", फिर यूपी में क्यों मर रहे हैं मरीज़
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश में प्रयागराज के बेली हॉस्पिटल में भर्ती 39 वर्षीय श्रीनिवास द्विवेदी शुक्रवार को सांस लेने की समस्या से जूझ रहे थे. उनका ऑक्सीजन लेवल 55 के आस-पास था. उनकी आरटीपीसीआर जांच हो चुकी थी लेकिन उसकी रिपोर्ट अब तक नहीं आई थी. उनके परिजन अपने दोस्तों और परिचितों के अलावा सोशल मीडिया पर भी गुहार लगा रहे थे कि 'वेंटिलेटर वाला हॉस्पिटल' मिल जाए. हॉस्पिटल नहीं मिल सका और श्रीनिवास द्विवेदी की अगले दिन मृत्यु हो गई.
शनिवार को लखनऊ के मोहनलाल गंज से बीजेपी सांसद कौशल किशोर ने एक वीडियो संदेश के ज़रिए अस्पतालों में ऑक्सीजन की कमी और लोगों के परेशान होने का ज़िक्र किया. उन्होंने यह भी कहा कि यदि लाइन में लगे लोगों को ऑक्सीजन गैस उपलब्ध नहीं कराई जाती है तो मैं धरने पर बैठ जाऊंगा. कौशल किशोर इससे पहले भी अस्पतालों में बेड की कमी और ऑक्सीजन न मिलने की शिकायत कर चुके थे.
एक दिन बाद कौशल किशोर के बड़े भाई की भी कोरोना संक्रमण की वजह से मृत्यु हो गई.
गोरखपुर के कैंपियरगंज के रहने वाले पटेश्वरी सिंह की पत्नी पिछले तीन से बीमार हैं.
वो बताते हैं, "गोरखपुर के कई अस्पतालों के चक्कर लगा रहे हैं लेकिन कहीं भी जगह नहीं मिल रही है. हम लोग बहुत परेशान हैं, कोई अस्पताल एडमिट नहीं कर रहा है. अस्पताल कह रहे हैं कि हमारे पास बेड नहीं है, ऑक्सीजन नहीं है, वेंटिलेटर नहीं है. हमारी समझ में नहीं आ रहा है कि कहां जाएं. पत्नी बीपी और शुगर की भी मरीज हैं."
यूपी के तमाम शहरों में अस्पताल, ऑक्सीजन और दवाइयों के लिए भटक रहे कोविड मरीजों के परिजनों की ये आवाज़ें लगभग उसी समय की हैं जब यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ शुक्रवार को कुछ मीडिया हाउस के संपादकों के साथ वर्चुअल मीटिंग कर रहे थे और इस दौरान उन्होंने दावा किया कि यूपी में ऑक्सीजन, अस्पताल अथवा दवाइयों की कोई कमी नहीं है.
जबकि पिछले क़रीब तीन हफ़्तों से कोरोना संक्रमण से जूझ रहे उत्तर प्रदेश में हर तरफ़ इन्हीं चीज़ों के अकाल की चर्चा है और कोरोना संक्रमित लोगों के परिजन इनके लिए दर-दर भटक रहे हैं, सोशल मीडिया के ज़रिए एक-दूसरे से मदद मांग रहे हैं और मदद के अभाव में कई मरीज़ दम तोड़ रहे हैं.
मंगलवार को भी सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, राज्य भर में जहां 32,993 नए संक्रमित मिले हैं वहीं 265 लोग संक्रमण की वजह से जान गँवा चुके हैं.
राज्य में पिछले साल महामारी शुरू होने के बाद संक्रमण से मरने वालों की कुल संख्या 11 हज़ार से ऊपर हो चुकी है और तीन लाख से ज़्यादा लोग अभी भी कोरोना संक्रमण से जूझ रहे हैं. हर दिन इस संख्या में हज़ारों का इज़ाफ़ा हो रहा है.
राज्य सरकार की तमाम कोशिशों के बावजूद कोरोना संक्रमितों को इलाज, ऑक्सीजन और दवाओं के लिए इधर-उधर भटकना पड़ रहा है. राजधानी लखनऊ का हाल ऐसा है कि यदि किसी अस्पताल से एक मरीज डिस्चार्ज होता है तो 100 मरीज भर्ती के लिए कतार में खड़े मिलते हैं.
हालांकि राजधानी लखनऊ में ऑक्सीजन एक्सप्रेस के आने से सरकारी और निजी अस्पतालों को राहत ज़रूर मिली है लेकिन संक्रमण की तेज़ रफ़्तार के कारण अभी भी ऑक्सीजन के लिए लंबी लाइनें लग रही हैं.
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जब राज्य में 'किसी चीज़ की कोई कमी'जैसी घोषणा जिस वक़्त की, उसके बाद भी यानी सोमवार को बीजेपी के मेरठ से सांसद राजेंद्र अग्रवाल ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पत्र लिखकर अपने संसदीय क्षेत्र में स्वास्थ्य के क्षेत्र में व्याप्त अव्यवस्थाओं और कमियों की ओर ध्यान दिलाया.
राजेंद्र अग्रवाल ने पत्र में लिखा है, "मेरठ के सभी सरकारी और ग़ैर सरकारी अस्पताल ऑक्सीजन की अपर्याप्त आपूर्ति के संकट से जूझ रहे हैं. इस समय मेरठ में लगभग 35 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की आवश्यकता है लेकिन उसके सापेक्ष 10 मीट्रिक टन ऑक्सीजन की ही आपूर्ति हो पा रही है."
राजेंद्र अग्रवाल कहते हैं कि यह कमी पिछले कई दिनों से बनी हुई है और लोग संकट से जूझ रहे हैं. हालांकि उनका यह भी कहना है कि सरकार की कोशिशों में कोई कमी नहीं है.
बीबीसी से बातचीत में राजेंद्र अग्रवाल कहते हैं, "वास्तव में संक्रमण की रफ़्तार ही इतनी तेज़ है कि चीज़ों की कमी पड़ जा रही है. माननीय योगी जी की सरकार बहुत अच्छा प्रबंधन कर रही है लेकिन संक्रमण इतना ज़्यादा है कि अस्पताल में एक मरीज डिस्चार्ज होता है तो 100 लोग लाइन में लगे रहते हैं. दवाइयों की कमी नहीं है, ऑक्सीजन की कमी अभी भी है लेकिन धीरे-धीरे उसे दूर किया जा रहा है."
पिछले कुछ दिनों से ऑक्सीजन की कमी को दूर करने की तमाम कोशिशों के बावजूद, अस्पतालों और होम आइसोलेशन में रह रहे मरीजों के लिए ऑक्सीजन की कमी अभी भी बनी हुई है और रीफ़िल सेंटरों के बाहर सिलिंडर लिए लोगों की क़तार अभी भी देखी जा सकती है. बावजूद इसके, मुख्यमंत्री का यह दावा करना कि 'ऑक्सीजन की कोई कमी नहीं है', समझ से परे है.
मुख्यमंत्री के साथ वर्चुअल मीटिंग में शामिल हुए एक अख़बार के संपादक ने नाम न छापने की शर्त पर कहा कि इस बारे में संपादकों ने भी उन्हें वास्तविक स्थिति की जानकारी देने की कोशिश की और बताया कि चारों ओर ऑक्सीजन, दवाइयों और अस्पताल में बेड के लिए हाहाकार मचा हुआ है लेकिन सबको सुनने के बाद मुख्यमंत्री का जवाब था- "राज्य के किसी भी सरकारी या ग़ैर सरकारी अस्पताल में ऑक्सीजन या बेड की कोई कमी नहीं है. कुछ लोग कालाबाज़ारी कर रहे हैं, उनके ख़िलाफ़ सख़्त कार्रवाई की जा रही है."
मुख्यमंत्री के इस दावे पर बात करने के लिए राज्य सरकार के कई अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई लेकिन किसी से भी बात नहीं हो सकी.
हालांकि सरकार की ओर से जारी प्रेस विज्ञप्ति में कहा गया है कि एल-1 के 01 लाख 16 हजार बेड्स, एल-2 व एल-3 के 65000 बेड्स उपलब्ध हैं और जल्दी ही इन बेड्स की संख्या को दोगुना किया जाएगा. सरकार की ओर से यह भी दावा किया गया है कि पिछले 4-5 दिनों में कोरोना संक्रमण के मामलों में गिरावट दर्ज की गई जबकि संक्रमित लोगों में रिकवरी दर में बढ़ोत्तरी दर्ज की गई है.
लखनऊ में वरिष्ठ पत्रकार योगेश मिश्र कहते हैं कि मुख्यमंत्री के इस दावे और ज़मीनी सच्चाई में कोई साम्य नहीं है और इसकी वजह नौकरशाही पर उनकी अतिनिर्भरता है.
योगेश मिश्र कहते हैं, "दरअसल, ब्यूरोक्रेसी ने उनको अपने रक्षा कवच में ले लिया है. जनता की बात उन तक जा ही नहीं रही है, जनता दरबार लग नहीं रहा है, पोर्टल पर शिकायतों का रिव्यू नहीं हो रहा है. ऐसे में उनके विश्वस्त अधिकारी उन्हें जो सूचना दे रहे हैं उसी को वो अंतिम मान ले रहे हैं. उसकी जाँच करने का कोई माध्यम नहीं है. यही नहीं, बीजेपी संगठन और सरकार के बीच भी कोई तालमेल नहीं है. जो ज़मीनी हक़ीक़त यहां हर व्यक्ति को दिख रही है, वह मुख्यमंत्री को न दिख सके, इससे साफ़ है कि सरकार और संगठन का सिस्टम भी ध्वस्त हो चुका है."
दरअसल, अस्पतालों, दवाइयों और ऑक्सीजन के अभाव संबंधी शिकायतें इससे पहले भी राज्य के कैबिनेट मंत्रियों से लेकर सांसद, विधायक और पार्टी के पदाधिकारी तक सार्वजनिक रूप से कर चुके हैं. कैबिनेट मंत्री ब्रजेश पाठक का इस संबंध में पत्र काफ़ी चर्चा में रहा और उन्होंने साफ़तौर पर लिखा था कि लखनऊ में इतिहासकार योगेश प्रवीन का निधन महज़ इसलिए हो गया क्योंकि उन्हें समय पर एंबुलेंस नहीं मिल सकी. बावजूद इसके मुख्यमंत्री का 'सब कुछ होने' का दावा लोगों को हैरान करने वाला है.
वरिष्ठ पत्रकार सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं, "जब सब कुछ उपलब्ध है तो उनकी पार्टी के लोग और उनकी सरकार में बैठे लोग क्यों ट्वीट करके मदद मांग रहे हैं. क्या मुख्यमंत्री को यह नहीं सोचना चाहिए. दरअसल, उनके ख़ास लोगों ने उनकी महानायक की जो छवि जो गढ़ दी है, अब उसे ही बचाने का प्रयास हो रहा है. कोरोना के काल में जो कुछ भी हो रहा है आम आदमी को न सिर्फ़ दिख रहा है, बल्कि हर व्यक्ति उसे प्रत्यक्ष या परोक्ष रबप से महसूस कर रहा है लेकिन उसे भी झुठलाने की कोशिश की जा रही है. कोई और नहीं अपनी ही पार्टी के मंत्री, विधायक, सांसद चेता रहे हैं, आम जनता तो झेल रही है. वो तो शिकायत भी नहीं कर पा रही है."
सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं कि यह छवि को बचाने का 'असफल प्रयास' है. उनके मुताबिक, "हो सकता है कि आप मुख्य धारा की मीडिया को, अख़बारों को, चैनलों को कुछ हद तक रोक लें, लेकिन सोशल मीडिया के प्रवाह को और आम आदमी की पीड़ा को कहां से रोक लेंगे?"
सिद्धार्थ कलहंस कहते हैं कि सरकारी फ़रमानों ने दुश्वारियों को और बढ़ा दिया है. वो कहते हैं, "सरकार को समझना चाहिए कि जनता सब कुछ देख रही है, वो अब सिर्फ़ अख़बार और टीवी के भरोसे नहीं है."
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