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पीएम मोदी का संबोधन, कोविड संकट में कितना मिला संबल?
- Author, विनीत खरे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कोविड महामारी के कारण भारत में एक लाख 82 हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, यह सरकारी आंकड़ा है. स्वास्थ्य व्यवस्था बेबस, धराशायी-सी दिखती है. लोग सड़कों पर अस्पताल के बिस्तर, ऑक्सीजन और दवाइयों के लिए मारे-मारे फिर रहे हैं.
ऐसी भयावह और जटिल परिस्थिति में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 20 अप्रैल की शाम पौने नौ बजे देश को संबोधित करने वाले थे तो कुछ लोगों में उम्मीद जगी थी कि वे ऐसे क़दम उठाएँगे जिससे लोगों का टूटता हौसला बहाल हो सके.
कोरोना की पहली लहर के वक़्त पीएम मोदी के जनता क़र्फ्यू, फिर संपूर्ण लॉकडाउन के ऐलान और उस दौरान ताली-थाली बजाने या दिए जलाने जैसे उनके कार्यक्रमों को लेकर जनता में एक तरह का उत्साह दिखा था, इन ऐलानों में जनता की भागीदारी को मोदी की लोकप्रियता का सबूत माना गया था.
बहरहाल, अपने ताज़ा भाषण में प्रधानमंत्री ने परिवारों से संवेदना जताई, कोरोना के खिलाफ़ लड़ाई में जुटे डॉक्टरों, मेडिकल स्टाफ़ की सराहना की और सरकार के अहम फ़ैसलों को गिनाया.
उन्होंने राज्यों से कहा कि वो लॉकडाउन को अंतिम विकल्प के तौर पर इस्तेमाल करें, उन्होंने ऑक्सीजन सप्लाई बढ़ाने के प्रयासों का ब्योरा भी दिया.
कोविड संक्रमण भारत के लिए एक ऐसा संकट है जिसे देश के नागरिकों ने पहले कभी नहीं देखा और महसूस किया, यह हर तरह से अभूतपूर्व और चुनौतीपुर्ण है.
ऐेसे में लोगों को प्रधानमंत्री के संबोधन से उम्मीद थी कि अभूतपूर्व संकट से निबटने के लिए वे कुछ बड़े और साहसिक क़दम उठाने की घोषणा करेंगे, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी तक़रीबन बीस मिनट तक बहुत ही गंभीरता के साथ बोले लेकिन कोई ठोस घोषणा सुनने को नहीं मिली.
तथ्यों-आंकड़ों और ठोस पहल की कमी
कोई नई घोषणा तो नहीं की गई लेकिन साथ ही मौजूदा संकट से निबटने के लिए उठाए जा रहे क़दमों के बारे में भी तथ्यात्मक जानकारी पीएम से सुनने को नहीं मिली.
माइकल कूगलमैन अमरीका के विल्सन सेंटर में दक्षिण एशियाई मामलों के जानकार हैं.
भाषण के कुछ ही देर बाद उन्होंने ट्वीट किया कि एक देश जो ग्लोबल पैंडेमिक का केंद्र है, उसे नरेंद्र मोदी ने संबोधित किया और उसे ज़रूरी सुविधाओं को पहुँचाने का भरोसा तो दिलाया लेकिन उससे ज़्यादा उन्होंने अपने मंसूबों के बारे में ब्योरा नहीं दिया.
ये भाषण बहुत सारे लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा.
स्वास्थ्य विषयों पर काम करने वाले सुनील नंदराज ने मुंबई से बताया कि प्रधानमंत्री के भाषण का अर्थ था, "अपना-अपना देख लो, सरकार कुछ नहीं कर सकती है."
वो पूछते हैं, "क्या था उस भाषण में? उन्हें लोगों को बताना चाहिए था कि लोगों के दर्द को दूर करने के लिए क्या क़दम उठाए जा रहे हैं, चाहे वो ऑक्सीजन की कमी हो या फिर वैक्सीन की. उन्होंने वैक्सीन को प्राइवेट सेक्टर के लिए खोल दिया है. एक डोज़ के लिए 1,000 रुपए देने होंगे? हम कहां हैं?"
महाराष्ट्र में कोविड से 61 हज़ार से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है और वहां भी लोग वैक्सीन, ऑक्सीजन, अस्पताल बेड की कमी से परेशान हैं.
नरेंद्र मोदी के भाषण पर सुनील नंदराज कहते हैं, "जब उन्हें कोविड का ख्याल रखना चाहिए था तब तो वो चुनाव प्रचार और दूसरी चीज़ें कर रहे थे. हमने हालात को गंभीरता से नहीं लिया और हमारा बुरा हाल है."
श्रीनगर से कश्मीर डॉक्टर्स एसोसिएशन के डॉक्टर निसार-उल-हसन ने बताया कि कश्मीर में कोविड संक्रमित लोगों की दैनिक संख्या 100 से बढ़कर 2000 हो गई है.
वो कहते हैं, "यहां अस्पताल भरे हुए हैं. यहां आईसीयू बेड नहीं हैं. लोगों की घरों में मौत हो रही है."
स्वास्थ्य मामलों पर काम करने वाले रवि दुग्गल के मुताबिक़ प्रधानमंत्री को "उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए कंपल्सरी लाइसेंसिंग का ज़िक्र करना चाहिए था. उन्हें वैक्सीन ख़रीदने और बांटने के लिए विकेंद्रीकरण के बारे में बात करनी चाहिए थी, कि इसमें संचालन कैसे होगा, संसाधन कहां से आएंगे, राज्य संसाधन कैसे जुटाएंगे."
इसके बरअक्स पब्लिक हेल्थ फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया के प्रमुख श्रीनाथ रेड्डी के मुताबिक़ एक प्रधानमंत्री का भाषण ऑपरेशनल डीटेल्स की बात नहीं करता.
वो कहते हैं कि प्रधानमंत्री का भाषण दिशा देता है और प्रतिबद्धता व्यक्त करता है, यानी कितना ऑक्सीजन लाना है, बांटना है, ये सभी काम एजेंसियों पर छोड़ दिए जाते हैं.
इस भाषण के बाद कई लोग नरेंद्र मोदी का आठ मार्च 2013 का एक ट्वीट शेयर कर रहे हैं, जिसमें उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के भाषण के बारे में लिखा था, "कल मैंने प्रधानमंत्री का भाषण सुना और तब मुझे याद आया कि ख़ाली बर्तन सबसे ज़्यादा शोर मचाते हैं."
भाषण से उम्मीद
जन स्वास्थ्य अभियान से जुड़े अमूल्य निधि के मुताबिक़ प्रधानमंत्री के भाषण से लोगों में ये विश्वास पैदा नहीं हुआ कि वो इस बीमारी से लड़ सकते हैं. निधि का कहना है कि अपने भाषण में उन्होंने लोगों से यह नहीं कहा कि वे रैली या किसी आयोजन में न जाएं.
पैंडेमिक के दौरान राजनितिक रैलियों को लेकर प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा के अलावा टीएमसी जैसी पार्टियों की आलोचना होती रही है.
थिंक टैंक ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन (ओआरएफ़) में सेंटर फ़ॉर इकॉनमी एंड ग्रोथ के डायरेक्टर मिहिर शर्मा के मुताबिक़ "भाषण का क्या फ़ायदा जब प्रधानमंत्री का रैलियों को संबोधित करना उनके शब्दों के महत्व को कम कर रहा है."
इंदैर से अमूल्य निधि पूछते हैं, "क्या उन्होंने (प्रधानमंत्री ने) ये बोला कि हमारे पास पीएम केयर फ़ंड में इतना पैसा है, और उससे राज्यों को आर्थिक मदद दी जा रही है?"
मध्य प्रदेश में कोविड से चार हज़ार 700 से ज़्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, और वहां ऑक्सीजन की कमी से लोगों के मरने की ख़बरें हैं लेकिन अधिकारी इससे इनकार कर रहे हैं.
अमूल्य निधि का कहना है कि उन्हें लगा था कि मोदी कहेंगे कि स्वास्थ सुविधाएं ख़राब हो चुकी हैं, हर जगह अस्पताल बनाए जाएंगे.
निधि पूछते हैं, "स्वास्थ्य कर्मचारी, डॉक्टर, सरकारी और निजी सेक्टर के लोग इस पैंडेमिक में सबसे आगे काम कर रहे हैं. उनके विश्वास को बढ़ाने, उनके और उनके परिवार की सुरक्षा को बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री ने कुछ कहा? इस पैंडेमिक में कितने ही डॉक्टरों की मौत हो गई है."
उन्होंने आरोप लगाया कि मध्य प्रदेश की सरकार कोरोना से मौत के आंकड़े को छिपा रही है. राज्य सरकार इन आरोपों से इनकार करती है.
राज्यों की ज़िम्मेदारी
प्रधानंत्री मोदी ने अपने भाषण में राज्यों से अनुरोध किया कि वो लॉकडाउन को अंतिम विकल्प के तौर पर ही इस्तेमाल करें. साथ ही उन्होंने राज्य सरकारों से आग्रह किया कि वो श्रमिकों को भरोसा दिलाएं कि वो जहां हैं, वहीं पर रहें.
पूर्व सांसद सदस्य पवन वर्मा के मुताबिक़ कोशिश हो रही है कि केंद्र सरकार सारी ज़िम्मेदारी प्रदेश सरकारों पर डाल दे, ये उचित नहीं है.
वो कहते हैं, "डिज़ास्टर मैनेजमेंट ऐक्ट के तहत मुख्य ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार पर है."
पवन वर्मा कहते हैं कि जिस तरह से प्रधानमंत्री मोदी ने अपने भाषण में सरकार की उपलब्धियों पर फ़ोकस किया, "उससे लगा कि प्रधानमंत्री ज़मीनी हक़ीक़त को समझ नहीं सके हैं."
पवन वर्मा के मुताबिक़ भाषण में प्रधानमंत्री मोदी को एक रोडमैप देने की ज़रूरत थी कि वो इन चुनौतियों से कैसे निबटेंगे.
थिंक टैंक ओआरएफ़ में सेंटर फ़ॉर इकॉनमी एंड ग्रोथ के डायरेक्टर मिहिर शर्मा के मुताबिक़ इस भाषण का मक़सद था कि अगर स्थिति और बिगड़े तो राज्यों के मुख्यमंत्रियों को राजनीतिक ख़मियाज़ा भुगतना पड़े, न कि प्रधानमंत्री को.
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