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आम आदमी को मौत के बाद भी इंतज़ार करना पड़ रहा है- तस्वीरों में देखें दर्द
- Author, अनंत झणाणे
- पदनाम, लखनऊ से बीबीसी हिंदी के लिए
31 साल के सुमित कुमार आठ साल से लखनऊ में प्रेस फ़ोटोग्राफ़र हैं. अपने करियर में उन्होंने कभी ऐसा ख़ौफ़नाक मंज़र नहीं देखा था जैसा कि वे इन दिनों देख रहे हैं.
पिछले पाँच-छह दिनों से वे लगातार लखनऊ की तमाम मौर्चरी और श्मशान घाटों पर जा रहे हैं.
सुमित कुमार लखनऊ में अपने रिश्तेदारों के साथ रहते हैं, लेकिन घर में एक अलग कमरे में अपने आप को और अपने कैमरे को मानो क़ैद कर रखा है. घर के लोगों से मिलना-जुलना बंद हैं.
सुमित कहते हैं कि घर से निकलते हुए झूठ बोलते हैं कि दफ़्तर जा रहे हैं. शहर का सच देखने के लिए उन्हें रोज़ झूठ का सहारा लेना पड़ता है.
घर वालों को यह तक नहीं बताया कि लखनऊ में जहां रोज़ दर्जनों लोग कोरोना से मर रहे हैं, वहां वे रोज़ श्मशान घाट और अस्पतालों के मोर्चरी के चक्कर काट रहे हैं.
सुमित कहते हैं कि लखनऊ के भैंसा कुंड में काम करने वाले मुन्ना अगर लगातार दस दिन से बिना घर गए सैकड़ों लोगों के दाह-संस्कार कर सकते हैं, तो उनका काम तो मुन्ना से आसान है. सुमित का कहना है कि मुन्ना आने वाली लाशों की गिनती भूल चुके हैं. उन्हें याद नहीं है कि उन्होंने कितनी चिताएं बिछाई हैं. शव आया और उसे राख कर दिया.
रोज़-रोज़ मिलने से सुमित और मुन्ना में दोस्ती सी हो गयी है. भैंसा कुंड में लाशों के अंतिम संस्कार में जुटे मुन्ना कहते हैं, "मुझे तो मालूम भी नहीं है कि मैंने एक सप्ताह में कितने लोगों को फूंका है."
सुमित कुमार की एक तस्वीर वायरल भी हो गई है. यह तस्वीर उन्होंने 14 अप्रैल को तब ली थी जब 70 साल के सुशील कुमार श्रीवास्तव को उन्होंने तालकटोरा इलाक़े के एक ऑक्सीजन गोदाम के बाहर अपनी गाड़ी में बैठे गहरी सांस लेते हुए पाया.
सुशील कुमार के बेटे उन्हें गाड़ी में लेकर भर्ती कराने निकले और रास्ते में ऑक्सीजन के थोक व्यापारी के यहाँ रुक कर बाबूजी को ऑक्सीजन चढ़वाया. दर-दर भटकने के बाद दूसरे दिन जाकर उन्हें अस्पताल में बिस्तर मिला. लेकिन बीपी और शुगर के मरीज़ सुशील कुमार श्रीवास्तव ने, अस्पताल में भर्ती होने के बावजूद 16 अप्रैल की सुबह दम तोड़ दिया.
सुमित कहते है कि उन्हें सुशील कुमार श्रीवास्तव की मौत का बड़ा सदमा लगा और अपने अंदर एक कमी सी महसूस हुई कि "मैं उनकी कोई मदद नहीं कर पाया. आप किसी की मदद नहीं कर पा रहे हैं. बस आप खड़े होकर तमाशबीन बने हुए हैं. ये सब बातें आप अपने घर पर भी शेयर नहीं कर सकते, क्योंकि घर पर तो कुछ और बताकर निकले हैं. आपके पास इसे दिल में दबाने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है."
सुमित कुमार इन तस्वीरों को कैप्चर करते हुए भावनात्मक रूप से बहुत टूटे हैं.
वे कहते हैं, "आदमी की इच्छा रहती है कि मैं यदि मरूं तो मुझे चार लोग कंधा देने वाले हों. लेकिन यहाँ पर तो सिर्फ़ दो लोग कंधा देते हैं और वे भी आपके घर के नहीं होते." वे कहते हैं कि मुझे सिस्टम को बताना है कि वह फ़ेल हो चुका है. हालांकि इससे किसी की मदद हो जाती तो अच्छा लगता.
सुमित कुमार बताते हैं कि उन्होंने गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल कॉलेज को भी कवर किया था, जहाँ उन्होंने इंसेफ़ेलाइटिस से बच्चों को दम तोड़ते देखा था. हालांकि मौजूदा हालात को वे बिल्कुल अलग मानते हैं.
उन्होंने बताया, "आप यहाँ लाचार हैं. आप यहां ज़्यादा कुछ नहीं कर सकते. इसके बाद भी इस महामारी को कवर करना है और लोगों को बताना है कि हक़ीक़त क्या है."
उनकी तस्वीरों को लेकर प्रतिक्रियाएं भी हो रही हैं. सुमित कुमार बताते हैं, "लोग मुझे मैसेज करते हैं कि "भाई! इतना निगेटिव क्यों दिखा रहे हो? थोड़ा पॉज़िटिव दिखाओ. लेकिन मेरा मानना है कि दब तो निगेटिव चीज़ें ही रही हैं."
सुमित दार्शनिक अंदाज़ में कहते हैं कि आम आदमी को हर जगह धक्का खाना पड़ता है. यही सच है.
अपनी तस्वीरों को दिखाते हुए उन्होंने कहा, "आम आदमी ज़िंदगी के धक्के खाता है और वेटिंग लिस्ट में अपनी ज़िंदगी गुज़ार देता है. लेकिन मैंने श्मशान में पहली बार वेटिंग लिस्ट देखी है. मौत के बाद भी इंसान को इंतज़ार करना पड़ रहा है."
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