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जब सड़क पर चाकू घोंपकर पति ने की पत्नी की हत्या, किसी ने क्यों नहीं रोका? ब्लॉग
- Author, दिव्या आर्य
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कभी वो प्रेमी होता है और कभी पति. पर जब वो उसके प्यार को मना करती है और उसकी बात नहीं मानती तो वो 'ना' नहीं सुनता.
कुछ तो उसे जान से मारना अपना हक़ समझते हैं. और बाक़ी सब? उनका क्या?
दिल्ली की एक मार्केट में दिन दहाड़े एक पति ने अपनी पत्नी को दर्जनों बार चाक़ू से घोंपा और मार दिया. बाज़ार की दुकानें खुली थीं.
पहली मंज़िल पर तीन आदमी दरवाज़ा खोल बाहर आकर झांके भी, पर कुछ नहीं कहा. आवाज़ लगाकर उस आदमी को रोका नहीं.
नीचे सड़क पर मोटरबाइक सवार उस आदमी को भी मदद करने के लिए नहीं कहा जो अचानक हुए हमले की वजह से ठिठक कर रुक गया था.
उसने दो तीन बार किक लगाई, मोटरबाइक पीछे की और चला गया. पहली मंज़िल वाले भी दरवाज़ा बंद कर अंदर हो लिए.
व्हॉट्सऐप के ज़रिए
दोपहर का वक़्त था. दो मज़दूर शायद खाना खाने निकले थे. एक के हाथ में थैला और दूसरे के हाथ में हथौड़ा था.
वो भी कनखियों से झांकते हुए, ठीक बग़ल से चलते चले गए.
वहीं बग़ल से एक कार भी निकली, फिर एक और मोटरबाइक. दोनों ने अपनी गति तक धीमी नहीं की.
बमुश्किल दस क़दम दूर, दो आदमी अपनी मोटरबाइक स्टैंड पर टिकाए उस पर आराम से बैठे रहे. देखते रहे. वहां से सब साफ़ दिख रहा था.
और एक आदमी ने सड़क की दूसरी तरफ़ से मोबाइल पर वीडियो बनाया जिसे उसने व्हॉट्सऐप के ज़रिए दोस्तों में शेयर किया होगा.
शायद वो फ़ॉर्वर्ड होते-होते आपके पास भी आया हो.
मैंने वो देखा है. और सीसीटीवी कैमरा में रिकॉर्ड हुआ वो वीडियो भी देखा है जिसमें वो चंद मिनट क़ैद हैं जब ये एक दर्जन आदमी उस हत्यारे को रोक सकते थे.
एक के पास तो हथौड़ा भी था. वो दूर से ही उससे बहस कर सकते थे, उसका ध्यान बंटा सकते थे. पर ऐसा नहीं हुआ.
"ये मेरी पत्नी है, कोई हमारे बीच में ना आए"
क्या इसलिए क्योंकि ये पति-पत्नी के आपस का मामला था?
उस आदमी ने चिल्ला कर कहा था, "ये मेरी पत्नी है, कोई हमारे बीच में ना आए, मैं इसे मार रहा हूं क्योंकि ये बदचलन है, मेरी नहीं मानती."
घरेलू हिंसा का वो ख़ौफ़नाक चेहरा जो घर के बाहर निकल आया था. और कोई उसे देखना नहीं चाहता था.
नेश्नल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे (4) के मुताबिक़ भारत में 33 प्रतिशत महिलाओं को उनके पति के हाथों हिंसा का सामना करना पड़ा. यानी हर दस में से तीन.
इनमें से क़रीब 80 प्रतिशत ने कभी किसी को कुछ बताया नहीं. शायद इसलिए कि उन्हें मदद मिलने की उम्मीद नहीं थी.
सिर्फ़ 14 प्रतिशत ने कभी इसके लिए मदद माँगी. वो मदद भी ज़्यादातर महिला के अपने परिवार, पति के परिवार या दोस्तों से माँगी गई. महज़ तीन प्रतिशत महिलाएं पुलिस के पास गईं. ये तब जब भारत में घरेलू हिंसा से बचाव और रोकथाम के लिए दो क़ानून हैं - भारतीय दंड संहिता की धारा 498 (ए) और घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005.
और शायद इसलिए भी कि समाज की व्यापक सोच से प्रभावित, वो ख़ुद घरेलू हिंसा को जायज़ मानती हैं. मर्दों से भी ज़्यादा.
सर्वे में शामिल क़रीब 40 प्रतिशत मर्द और 50 प्रतिशत महिलाओं ने माना कि पत्नी के पति की बात ना मानने, उसे बिना बताए घर से बाहर जाने, ठीक से खाना ना बनाने, यौन संबंध बनाने से इनकार करने, दूसरे मर्द से संबंध होने का शक होने इत्यादि पर उनका पति द्वारा पीटा जाना जायज़ है.
जब लगभग आधी आबादी घरेलू हिंसा को सही माने तो वो सच घर से बाहर निकल आ भी जाए, तो उसे रोकने की ज़रूरत शायद नहीं महसूस होगी.
शादी के लिए मना करने पर हत्या
कंधे पर बस्ता लिए, पैरों में जूते, कुर्ता-स्लैक्स और दुपट्टा ओढ़े अस्पताल में अपनी शिफ़्ट पूरी कर घर लौट रही दिल्ली की उस महिला ने पहले अपने पति को रोकने की कोशिश भी की पर वार लगातार होते रहे.
वो तब भी उन्हें मारता रहा जब शायद उनकी मौत हो चुकी थी. उसे तब भी किसी ने नहीं रोका. उस विभत्स वीडियो की छवि दिमाग़ से हटाना मुश्किल है.
ठीक वैसे ही जैसे पाँच साल पहले एक प्रेमी के 21 साल की छात्रा की कैंची घोंपकर हत्या करने का वीडियो सीसीटीवी में क़ैद हो गया था. दिल्ली की ही एक और सड़क और उसपर चल रहे कई मूक लोग चश्मदीद थे. जिन्होंने देखा पर कुछ किया नहीं.
करुणा के परिवार के मुताबिक़ उसने उस लड़के से शादी करने से इनकार कर दिया था. वो फिर भी पीछा करता रहा. करुणा ने तो पुलिस में शिकायत भी की, वो फिर भी बाज़ नहीं आया.
राष्ट्रीय अपराध सांख्यिकी ब्यूरो के साल 2019 के आंकड़ों के मुताबिक़ हर घंटे भारत में 'स्टॉकिंग' यानी पीछा करने का एक मामला पुलिस में दर्ज होता है. हर 'स्टॉकिंग' के मामले का अंत हत्या नहीं होता और ना ही बार-बार मना किए जाने पर हर मर्द हिंसा का रास्ता अपनाता है.
लेकिन लड़की का पीछा करना या जबरन दोस्ती की कोशिश के बर्ताव को आम समझ में 'प्यार' की संज्ञा दिए जाने से इस बर्ताव को बढ़ावा मिलता है.
बॉलीवुड फ़िल्मों में अक्सर हिरोईन की 'ना में हां होने' या ज़बरदस्ती उनसे प्यार का इज़हार करने का चित्रण छेड़छाड़ को 'ग्लोरिफ़ाई' करता है और लड़की की सहमति को बेमानी दिखाता है.
किसी के हाथ में चाक़ू हो, वो तैश में हो और किसी का ख़ून तक करने पर आमादा तो उसे रोकना मुश्किल है, नामुमकिन नहीं.
उसकी पहल तभी हो सकती है जब उस हिंसा को सही या जायज़ ठहराने वाली सोच बदले. अपराध करनेवाले के मन में और उसको तमाशे की तरह देखनेवालों के मन में भी.
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