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इशरत जहां केस: इंसाफ़ और इज़्ज़त के लिए एक अकेली मां की जंग
- Author, चिंकी सिन्हा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कावशा क़ब्रिस्तान में उसकी क़ब्र पर हमेशा फूल बिखरे रहते हैं. मुंबरा के राशिद कंपाउंड के उसके घर से यह क़ब्रिस्तान बमुश्किल आधा किलोमीटर दूर होगा. मुंबरा मुंबई से सटे ठाणे इलाक़े की एक मुस्लिम बस्ती है.
कोई उसकी क़ब्र पर पानी छिड़क कर साफ़ कर देता है तो कोई उस पर फूल बिखेर देता है. यही बातें इशरत जहां की मां शमीमा कौसर को यक़ीन दिलाती हैं कि उसे लोग अब भी याद रखे हुए हैं. क़ब्र पर फूल चढ़ा कर और उसे साफ़-सुथरा कर वो इशरत को मानों अपनी यादों में बनाए रखना चाहते हैं. पानी छिड़क कर क़ब्र को साफ़ करना, फूल चढ़ाना- सब उसके चाहने वालों का काम है.
सत्रह साल हो गए. तमाम एजेंसियों ने जाँच कर ली. कई चार्जशीट दाख़िल हो गईं. कई लोगों की गिरफ्तारियां हुईं. लेकिन इशरत जहां मुठभेड़ कांड में गिरफ़्तार सभी सातों पुलिस अफ़सरों को सीबीआई अदालत ने बरी कर दिया. लेकिन इशरत जहां की मां नहीं चाहतीं कि उनकी बेटी की कहानी यहीं ख़त्म हो जाए. वह इस अंत को बदलने के लिए तैयारी कर रही हैं.
कौन हैं शमीमा कौसर?
इशरत को मुठभेड़ में मार दिए जाने के बाद से अब तक उनका परिवार कई घर बदल चुका है. लेकिन इशरत वहीं मुंबरा की उस क़ब्रिस्तान में सोई हुई हैं और फूल भी उनकी क़ब्र पर वैसे ही सजे हैं.
शमीमा कौसर बेटी की क़ब्र पर नहीं जातीं. उनको लगता है कि उनका धर्म उन्हें इसकी इजाज़त नहीं देता है. लेकिन उन्हें अपने बेटों से पता चलता है कि इशरत की क़ब्र को किसी ने लावारिस नहीं छोड़ा है. यह दूसरी क़ब्रों की तरह यूं ही नहीं छोड़ दी गई है. कोई इसकी देखभाल करता है.
वहां रखे जाने वाले फूलों की बात करते हुए शमीमा कहती हैं कि उन्हें नहीं मालूम इन्हें वहां कौन लाता है. इससे फ़र्क़ भी नहीं पड़ता कि ये फूल वहां कौन रख जाता है लेकिन इससे उन्हें एक उम्मीद बंधती है.
क्या आपको इशरत की मिट्टी-मंज़िल की बात याद है? शमीमा कहती हैं, ''हां, अच्छी तरह याद है. जनाज़े में हज़ारों लोग शामिल हुए थे. इशरत जहां 2004 में एक पुलिस मुठभेड़ में मारी गई थीं. हर साल इशरत के जन्मदिन पर उनकी मां फ़ातिहा पढ़ती हैं. अगर आज इशरत जीवित होतीं तो 36 साल की होतीं."
अपनी शादी के बाद शमीमा पटना से मुंबई चली आई थीं. इशरत के पिता मोहम्मद शमीम रज़ा का इंतक़ाल 2002 में ही हो गया था. पति की मौत के बाद शमीमा पर आठ लोगों के परिवार को पालने की ज़िम्मेदारी आ गई.
शमीमा और उनकी बड़ी बेटी दवा बनाने की एक फ़ैक्टरी में काम करने लगीं. 12 घंटे की ड्यूटी के बाद महीने में 3000 रुपये मिलते थे. मकान का किराया ही 1200 रुपये था. बड़ी मुश्किल से गुज़र हो रही थी. वह कहती हैं, "परिवार चलाने के लिए बहुत कुछ झेलना पड़ा."
घर का ख़र्चा चलाने में मदद करने के लिए इशरत जहां हाईस्कूल से ही ट्यूशन पढ़ाने लगी थीं. 2004 में जब वह मारी गई थीं. उस समय वह गुरुनानक ख़ालसा कॉलेज में बीएससी कर रही थीं.
शमीमा कहती हैं, "लोग इशरत को जानते थे. उसके बारे में जो कहा गया, उस पर लोगों को कभी विश्वास नहीं हुआ.''
फ़ोन पर बात करते हुए शमीमा का गला भर आता है. वह रो पड़ती हैं. थोड़ी देर बाद ख़ुद को संभालती हैं और फिर बात करती हैं.
वह कहती हैं, "मैं तो चाहती थी कि मेरे बच्चे पढ़-लिख जाएं. मुझे क्या पता था कि हमारे साथ यह सब होगा. मैं कहां तक लड़ूं?
शमीमा अब काम नहीं करतीं. अपने दो बेटों, एक बेटी और बहू के साथ वन बीएचके अपार्टमेंट में रहती हैं.
क्या थी 'नक़ली' मुठभेड़?
आज से सत्रह साल पहले का वाक़या है. अमजद अली राणा, ज़ीशान जौहर, जावेद ग़ुलाम शेख़ उर्फ़ प्रणेश पिल्लई और इशरत एक नीली इंडिका कार से अहमदाबाद की ओर जा रहे थे. ठीक उसी वक़्त उप पुलिस महानिदेशक की अगुआई में एक पुलिस टीम ने उनका पीछा करना शुरू किया. आख़िरकार 15 जून, 2004 को तड़के पाँच बजे एक सुनसान सड़क पर चारों को मार दिया गया.
पुलिस ने उस वक़्त दावा किया कि चारों का संबंध पाकिस्तान स्थित चरमपंथी समूह लश्कर-ए-तैयबा से था.
मुठभेड़ के बाद पुलिस ने अहमदाबाद में पत्रकारों को बताया कि उन्हें कश्मीर से दो पाकिस्तानी फ़िदाइनों के अहमदाबाद आने की सूचना मिली थी. उनका इरादा गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी पर हमला करने का था. जौहर और राणा की पहचान पाकिस्तानी नागरिक के तौर पर की गई, जबकि शेख़ को कथित तौर पर उनका 'स्थानीय नेटवर्क' संभालने वाला कहा गया.
पुलिस की ओर से दर्ज शिकायत में इशरत की पहचान उनके नाम से नहीं की गई थी. कहा गया था कि मुठभेड़ में मारा गया चौथा शख्स एक 'महिला चरमपंथी' है.
इस मुठभेड़ के पाँच साल बाद यानी 2009 में अहमदाबाद कोर्ट ने कहा कि मुठभेड़ नक़ली थी.
अहमदाबाद कोर्ट ने यह फ़ैसला मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट एसपी तमांग की रिपोर्ट पर दिया था. 243 पेज की इस रिपोर्ट में तमांग ने पुलिस अधिकारियों को इशरत और तीन अन्य लोगों की दिनदहाड़े हत्या का अभियुक्त क़रार दिया.
रिपोर्ट में कहा गया था कि पुलिस अधिकारियों ने अपने स्वार्थ के लिए इस नक़ली मुठभेड़ को अंजाम दिया. उन्होंने यह सब प्रमोशन और मुख्यमंत्री की शाबाशी पाने के लिए किया था.
लेकिन गुजरात सरकार ने अदालत में इस रिपोर्ट को चुनौती दी. गुजरात हाई कोर्ट ने इस रिपोर्ट को रोक दिया और मुठभेड़ की जाँच के लिए एसआईटी गठित कर दी. 2011 में एसआईटी ने कहा कि यह मुठभेड़ 'नक़ली' थी.
इन ख़ुलासों के बाद 2011 में इस मामले की सीबीआई जाँच के आदेश दिए गए. 3 जुलाई 2013 को सीबीआई ने इस मामले में अहमदाबाद हाई कोर्ट में पहली चार्जशीट दायर की. सीबीआई ने कहा कि चारों की नक़ली पुलिस मुठभेड़ में बेरहमी से हत्या की गई है.
सीबीआई ने सात पुलिस अफ़सरों- पीपी पांडे, डीजी बंजारा, एनके अमीन, जीएल सिंघल, तरुण बरोट, जे जी परमार और अनाजु चौधरी को अभियुक्त बनाया.
लेकिन गुजरात सरकार ने सीबीआई को अपने इन अधिकारियों के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने की इजाज़त नहीं दी. इस वजह से ये सभी अभियुक्त इस केस से बरी हो गए. 31 मार्च, 2021 को सीबीआई की विशेष अदालत ने पुलिस महानिरीक्षक जीएल सिंघल समेत आख़िरी तीन पुलिस अधिकारियों को भी बरी कर दिया.
गुजरात सरकार और सीबीआई की भूमिका
2002 से लेकर 2006 के बीच गुजरात पुलिस पर 31 हत्याओं के आरोप लगे. इनमें से आधे कुछ पुलिस अधिकारियों ने किए. कहा गया कि पुलिस मुठभेड़ में लगभग आधे लोग चरमपंथी थे, जो मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी और दूसरे राजनीतिक नेताओं की हत्या करना चाहते थे.
हालांकि, आलोचकों का आरोप है कि गुजरात सरकार ने इन मुठभेड़ों को अंजाम देने वाले पुलिस अफ़सरों का न सिर्फ़ बचाव किया बल्कि उन्हें प्रमोशन भी दिए.
शमीमा की वकील वृंदा ग्रोवर कहती हैं कि इशरत जहां की एक्स्ट्रा ज्यूडीशियल किलिंग के अभियुक्त पुलिस अफ़सरों को बरी करना सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेशों की अवहेलना है.
वह कहती हैं, "सीबीआई कोर्ट ने रिकॉर्ड पर मौजूद सभी सबूतों को दरकिनार कर सिर्फ़ गुजरात सरकार ने जो कहा उसे मान लिया. जबकि इशरत का किसी चरमपंथी गतिवधि में शामिल होने का कोई सबूत नहीं है."
ग्रोवर ने कहा कि मारे गए लोगों की आपराधिक पृष्ठभूमि का हवाला देकर सभी पुलिस अफ़सरों को बरी कर देने का मतलब इन मुठभेड़ों को सही ठहराना है. इस मामले में पुलिसवालों को दंड न देकर एक तरह से पुरस्कृत किया गया है.
उन्होंने बीबीसी न्यूज़ से कहा, "इसका मतलब यह है कि राज्य जिन लोगों को दुश्मन और अपराधी समझता है उन्हें इस तरह ख़त्म किया जा सकता है. यह हम सबके लिए चिंता की बात होनी चाहिए."
ग्रोवर का मानना है कि अगर शमीमा ने इंसाफ़ की जंग नहीं लड़ी होती तो इस केस के कई पहलू कभी सामने नहीं आते.
वृंदा ग्रोवर कहती हैं, "2004 से लेकर 2019 तक शमीमा अपनी बेटी के लिए इंसाफ़ की जंग लड़ती रहीं. 2013 और फिर 2014 की शुरुआत में जब इस मामले में आरोप पत्र दाख़िल किए गए तो शमीमा को उम्मीद बंधी थी कि शायद अभियुक्त पुलिस वालों को सज़ा मिलेगी.
लेकिन 2019 में पुलिस अफ़सरों ने बरी होने के लिए इस आधार पर याचिका दायर की कि उनके ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाने के लिए पहले से इजाज़त नहीं ली गई थी. इस आधार पर अभियुक्त सभी पुलिस अधिकारियों को छोड़ दिया गया.
ग्रोवर ने इन अफ़सरों को बरी करने किए जाने को चुनौती दी है. वह कहती हैं, "किसी लोक सेवक के ख़िलाफ़ मुक़दमा चलाए जाने से पहले अनुमति लेने की जो क़ानूनी सुरक्षा दी गई है, वह इस केस में लागू नहीं होती क्योंकि सीबीआई ने बड़ी मेहनत से जाँच के बाद यह कहा था कि पुलिस मुठभेड़ नक़ली थी. इशरत जहां का पहले अपहरण किया गया और फिर दो दिनों तक ग़ैरक़ानूनी क़ैद में रखा गया. और फिर उन्हें बड़ी बेरहमी से गोली मार दी गई."
सीबीआई ने अपनी चार्जशीट में भी कहा था कि पहले इशरत का अपहरण किया गया और फिर उन्हें 12 जून 2004 से ग़ैरक़ानूनी ढंग से क़ैद रखा गया.
वृंदा ग्रोवर कहती हैं, "इस तरह के केस में मुक़दमा चलाने के लिए पहले से इजाज़त लेने का सवाल ही पैदा नहीं होता क्योंकि कोई भी पुलिस अफ़सर अपनी ऑफिशियल ड्यूटी के तहत कस्टडी में रखे शख्स की हत्या नहीं कर सकता. ख़ुद सीबीआई ने कोर्ट के सामने कहा था कि इस केस में मुक़दमा चलाने के लिए राज्य की इजाज़त की ज़रूरत नहीं है."
ग्रोवर का कहना है कि कोर्ट ने पाकिस्तानी डबल एजेंट डेविड हेडली के कथित बयान पर तो भरोसा किया लेकिन सीबीआई चार्जशीट में पेश किए गए सबूतों को नज़रअंदाज़ कर दिया.
ग्रोवर कहती हैं, "इस मामले में पुलिस अफ़सरों को बरी करने के आदेश का सबसे ख़तरनाक पहलू यही है कि अगर वे किसी को अपराधी या चरमपंथी समझते हैं, तो उन्हें सीधे जान से मार सकते हैं."
बीबीसी न्यूज़ ने इशरत जहां केस में इन पुलिस अफ़सरों को बरी करने के मामले पर गुजरात सरकार से उनका पक्ष जानना चाहा लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.
इंसाफ़ के लिए एक मां की जंग
इशरत की मां शमीमा ने सीबीआई को लिखा, "मुझे नहीं मालूम था कि सच और इंसाफ़ की लड़ाई इतनी मुश्किल, विकट, ज़िंदगी को निचोड़ लेने वाली और लगभग असंभव काम साबित होगी."
अपनी बेटी की हत्या के अभियुक्त पुलिस अफ़सरों को बरी करने के बाद यही उनकी फ़ौरी प्रतिक्रिया थी.
शमीमा ने इस मुठभेड़ में हुई हत्या की सीबीआई जाँच की मांग करते हुए 2004 में हलफ़नामा दायर किया था. आख़िरकार 2019 में उन्होंने सुनवाई में जाने से यह कहते हुए इनकार कर दिया कि वर्षों चले इस केस ने उन्हें थका दिया है .
उन्होंने कहा, "इंसाफ़ की इस लंबी जंग में अदालती प्रक्रिया ने उनके जज़्बे को तोड़ दिया है. अब आगे की सुनवाइयों में वह हिस्सा नहीं ले पाएंगीं."
शमीमा ने 2019 में सीबीआई से कहा था, "अब यह सीबीआई की ज़िम्मेदारी है कि दोषियों के ख़िलाफ़ मुक़दमा चले और उन्हें सज़ा मिले.
वह कहती हैं, "मुझसे कहा जाता है कि भारत की न्याय व्यवस्था सभी को इंसाफ़ देती है. इस देश की अदालतें इंसाफ़ करते वक़्त नहीं देखतीं कि अभियुक्त का ओहदा या क़द क्या है. लेकिन मेरे साथ अभी तक इंसाफ़ नहीं हुआ. मैं आज भी न्याय मांग रही हूं. "
पिछले कुछ वर्षों के दौरान इशरत के परिवार से मुलाक़ात करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता और लेखक हर्ष मंदर कहते हैं, "यह बात ही बड़ी दुखदायी है कि उनकी बेटी को चरमपंथी क़रार दिया जाए और इसका मुक़ाबला करने के लिए उनके रास्ते बंद हो जाएं. एक विधवा की सरपरस्ती वाले इस मुस्लिम परिवार की दिल खोल कर तारीफ़ होनी चाहिए."
लेकिन, अब शमीमा पुलिस अफ़सरों को बरी करने के आदेश को फिर चुनौती देने की तैयारी कर रही हैं. बीबीसी न्यूज से वह कहती हैं, "2019 में मैं बहुत बीमार पड़ गई थी. इसलिए केस छोड़ने का फ़ैसला किया था."
एक मां के लिए उनकी बेटी यानी इशरत एक ऐसी लड़की थी जो ख़ुद अपनी मेहनत से कुछ बनना चाहती थी लेकिन उसे मार दिया गया. उसकी गरिमा ख़त्म कर दी गई.
वह कहती हैं, "मैंने इंसाफ़ की इस जंग में बहुत लंबा सफ़र तय किया. मैं लड़ती रही, लड़ती रही और आख़िरकार थक-हार कर बैठ गई. लेकिन मेरी बेटी इंसाफ़ की हक़दार है. मैं डर कर नहीं बैठी हूं. डरूं क्यों. एक न एक दिन सबको मरना है."
बग़ैर तस्वीर की याद
इशरत मुंबरा में पली-बढ़ीं जो मुंबई महानगर क्षेत्र के पास ठाणे ज़िले का एक शहर है. एक ऐसी जगह, जिसे मुंबई का बाहरी इलाक़ा कहा जा सकता है. इस मायने में यह सचमुच बाहरी है क्योंकि 1992-93 में मुंबई दंगों के बाद महानगर से बाहर जाने को मजबूर हज़ारों मुस्लिमों को यहीं पनाह मिली.
उत्तर पूर्वी मुंबई में बसे ठाणे के नज़दीक इस इलाक़े के मकानों की दीवारों पर उदासी की परतें हैं. ये मकान उदास, धूमिल और उपेक्षित दिखते हैं.
यह आप्रवासी मज़दूरों, मुस्लिम श्रमिकों और इस शहर के अदृश्य लोगों की बस्ती है. लेकिन कुछ लोगों के लिए उनकी उड़ानों, उम्मीदों, सपनों और ख्वाहिशों की जगह है.
शमीमा पिछली यादों में खो जाती हैं. कहती हैं, "मुंबरा में हर कोई इशरत को जानता था. आप सिर्फ़ नाम पूछते और बच्चे बता देते कि उसका घर कहां है. आज भी वे इशरत को याद करते हैं."
वह कहते हैं कि इशरत के पढ़ाए सारे बच्चे अब बड़े हो गए हैं. लेकिन इशरत की कोई तस्वीर उसके घर में नहीं है. इशरत अपने परिवारों की यादों में बसी है.
15 जून 2004 को कुछ पत्रकारों ने मुंबरा में इशरत के घर पहुँच कर उसकी फ़ोटो मांगी थी. शमीमा कहती हैं, "पहले तो उन्होंने कहा कि वे उसके कॉलेज से आए हैं और कोई फॉर्म भरना चाहते हैं. इसलिए फ़ोटो चाहिए."
छत वाले मकानों और झरनों के बैकग्राउंड वाली नीली सलवार क़मीज़ पहनी हुई इशरत की यही तस्वीर बाद में मीडिया में इस्तेमाल हुई.
फ़ोटो लेने के बाद पत्रकारों ने शमीमा और उनके घर वालों को बताया कि इशरत पुलिस मुठभेड़ में मारी गई हैं.
शमीमा कहती हैं, ''इशरत की वही एक तस्वीर उनके पास थी. इशरत की यह तस्वीर एक स्टूडियो में ली गई थी. वह जानती हैं कि वह किनके ख़िलाफ़ लड़ने जा रही हैं. लेकिन प्यार सबकुछ करा लेता है."
वह इशरत को प्यार करती हैं.
सत्रह साल हो गए. इशरत की कहानी मिटी नहीं है. इंसाफ़ और गरिमा की उसकी जंग जारी है. इसका सबूत है उनकी वो क़ब्र जहां वह गहरी नींद में सोई हुई हैं, फिर कभी न उठने के लिए. लेकिन फूलों से ढकी वह जगह इंसाफ़ की उनकी जंग की गवाही बन गई है.
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