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छत्तीसगढ़: माड़वी हिड़मा, वो नक्सल नेता जिसकी तलाश में निकले थे जवान
- Author, बल्ला सतीश
- पदनाम, बीबीसी तेलुगू संवाददाता
छत्तीसगढ़ के बीजापुर में सुरक्षाबलों की माओवादियों के साथ हुई मुठभेड़ की घटना में नक्सली नेता माड़वी हिड़मा का नाम ख़ासतौर से चर्चा में रहा.
तीन अप्रैल को सुरक्षाबल पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी की बटालियन नंबर-1 के कमांडर माड़वी हिड़मा को ही पकड़ने निकले थे. पुलिस को ये जानकारी मिली थी कि हिड़मा और उसके साथी इस इलाक़े में मौजूद हैं.
लेकिन, मौके पर नक्सलियों ने जवानों पर हमला बोल दिया और इस मुठभेड़ में 22 जवानों की मौत हो गई.
40 साल के इस माओवादी विद्रोही नेता को पिछले एक दशक में दंडकारण्य में कई मौतों के लिए ज़िम्मेदार बताया जाता है.
माड़वी हिड़मा को जानने वाले और उनसे मिलने वाले लोग अक्सर इस बात से हैरान हो जाते हैं कि 'अकेले हिड़मा एकसाथ कई रणनीतियाँ कैसे बना सकता है?'
बीबीसी ने उन लोगों से बात की जो माओवादी संगठन में काम कर चुके हैं और अब उससे अलग हो गए हैं. इनमें में कुछ लोगों की हिड़मा के साथ एक या दो बार मुलाक़ात भी हुई है.
ये लोग बताते हैं कि माड़वी हिड़मा बहुत मृदुभाषी हैं और आदर के साथ बात करते हैं. उनसे मिल चुके व्यक्ति ये देखकर हैरान रह जाते हैं कि वो इतनी बड़ी तबाही भी मचा सकते हैं.
लेकिन, हिड़मा ने सुरक्षाबलों पर लगभग दस बार हमला बोला है और सैकड़ों जवानों की मौत के लिए वे ज़िम्मेदार हैं.
कैसे हुई शुरुआत
माओवादी पार्टी में माड़वी हिड़मा का आगे बढ़ना हैरान करने वाला रहा. हिड़मा 1996-97 में माओवादी संगठन से जुड़े थे. तब उनकी उम्र महज 17 साल थी. हिड़मा के दो और नाम भी हैं हिदमाल्लु और संतोष.
वे दक्षिण बस्तर इलाक़े में सुकमा ज़िले के पुवर्ती गाँव के रहने वाले हैं. बताया जाता है कि इस गाँव से 40-50 माओवादी निकले हैं. नक्सलियों से जुड़ने से पहले हिड़मा खेती किया करते थे.
हिड़मा बहुत ज़्यादा बात नहीं करते. उन्हें नई चीज़ें सीखने में दिलचस्पी रहती है. उन्होंने माओवादी संगठन के लिए काम करने वाले एक लेक्चरर से अंग्रेज़ी भाषा भी सीखी थी.
दक्षिण बस्तर से होने के चलते हिड़मा को हिंदी नहीं आती थी क्योंकि इस इलाक़े के लोगों की मातृभाषा हिंदी नहीं है. लेकिन, उन्होंने बड़े उत्साह से हिंदी सिखी ली है. हिड़मा ने सातवीं कक्षा तक ही पढ़ाई की है.
माओवादी संगठन के एक पूर्व सदस्य ने बीबीसी को बताया, "हिड़मा को साल 2000 के आसपास संगठन की उस शाखा में भेजा गया जो माओवादियों के लिए हथियार तैयार करती है. लोग बताते हैं कि हिड़मा ने वहाँ हथियार बनाने के लिए नई तकनीकें विकसित करके अपनी प्रतिभा दिखाई थी."
"वह हथियार तैयार करते थे, उनकी मरम्मत करते थे और स्थानीय स्तर पर ही ग्रेनेड व लॉन्चर्स का इंतज़ाम करते थे."
2001-2002 के क़रीब हिड़मा को दक्षिण बस्तर ज़िला प्लाटून में भेजा गया. बाद में वो माओवादी हथियारबंद दस्ते पीएलजीए (पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी) में शामिल हो गए.
कदम दर कदम बढ़त
माओवादी गतिविधियों का अध्ययन करने वाले लोग बताते हैं कि 2001 और 2007 के बीच हिड़मा एक सामान्य सदस्य थे. लेकिन, बस्तर इलाक़े में चले सलवा जुडूम ने उन्हें सक्रिय करने में अहम भूमिका निभाई.
एक विश्लेषण के मुताबिक सलवा जुडूम के ख़िलाफ़ लोगों में पनपी बदले की भावना ने ही बस्तर में माओवादी संगठन को फिर से ज़िंदा कर दिया जबकि 1990 के मध्य में वहाँ बहुत अच्छी स्थिति नहीं थी.
लोग कहते हैं कि यही वो समय हो सकता है जब हिड़मा को भी माओवादी संगठन में आगे बढ़ने का मौका मिला हो.
एक पूर्व माओवादी का कहना है, "उनके अपने लोगों के ख़िलाफ़ किए गए अत्याचार ने ही उन्हें भड़का दिया."
मार्च 2007 में उरपल मेट्टा इलाक़े में पुलिस पर हुए एक हमले में सीआरपीएफ़ के 24 जवान मारे गए थे. कहा जाता है कि ये हमला हिड़मा के नेतृत्व में ही हुआ था.
माओवादी संगठन के एक पूर्व सदस्य बताते हैं, "सीआरपीएफ़ के जवानों ने पूरा गाँव जला दिया. जब हिड़मा और उनके साथियों को इसका पता चला तो वो पुलिस को रोकने पहुँचे और उन्होंने सीआरपीएफ़ पर हमला कर दिया."
हालाँकि, बीबीसी इस बात की पुष्टि नहीं करता है कि सीआरपीएफ़ के जवानों ने गाँवों को जलाया था.
ये घटना महत्वपूर्ण है क्योंकि इससे पहले तक माओवादी अधिकतर लैंड माइंस पर ही निर्भर रहते थे. ऐसा पहली बार था जब उन्होंने पुलिस से आमने-सामने मुठभेड़ की थी.
लोग कहते हैं कि हिड़मा ने ही माओवादियों को लैंडमाइंस से बंदूकों की तरफ़ लाने में अहम भूमिका निभाई थी.
एक पूर्व महिला माओवादी बताती हैं, "संगठन के नेता भी हिड़मा की आक्रामकता को देखकर हैरान रह गए थे. बाद में भी उन्होंने ऐसी ही आक्रामकता दिखाई. इसलिए ही उन्हें संगठन में बड़ी ज़िम्मेदारियां सौंपी गई थीं."
2008-09 के क़रीब हिड़मा पहली बटालियन के कमांडर बने थे जो हाल ही में बनाई गई थी. ये बटालियन बस्तर के इलाक़े में सक्रिय रूप से काम करती रही है.
बाद में साल 2011 में हिड़मा दंडकारण्य स्पेशल ज़ोन कमिटी के सदस्य बन गए. अप्रैल 2010 में ताड़मेटला में हुई एक घटना में पुलिस के 76 जवान मारे गए थे.
वहीं, मार्च 2017 में सीआरपीएफ़ के 12 जवानों की जान चली गई थी. कहा जाता है कि इन दोनों हमलों में हिड़मा का हाथ था.
बंदूक का बहुत कम इस्तेमाल
माड़वी हिड़मा के बारे में एक बात और कही जाती है कि वो मुठभेड़ के दौरान माओवादियों का नेतृत्व तो करते हैं लेकिन खुद बंदूक बहुत कम चलाते हैं.
माओवादी संगठन छोड़ चुके एक शख़्स ने बताया कि 2011 में संगठन के भीतर हिड़मा के बारे में एक दिलचस्प चर्चा होती थी. हिड़मा का लड़ाई का तरीक़ा आक्रामक था. उन्होंने कई ज़मीनी लड़ाइयों में हिस्सा भी लिया लेकिन वो खुद बंदूक बहुत कम चलाते हैं. वो उनका नेतृत्व करते हैं. जब तक मजबूरी न हो हिड़मा बंदूक नहीं उठाते. उनके नेतृत्व में टीम बहुत सक्रियता के साथ काम करती है. लेकिन, वो लड़ाई के मैदान से दूर नहीं रहते बल्कि अपने साथियों का नेतृत्व करते हैं.
एक पूर्व माओवादी बताते हैं, "हैरानी वाली बात ये भी है कि कई लड़ाइयों में शामिल होने के बाद भी उन्हें छोटी-सी चोट भी नहीं आई. मुझे नहीं पता कि वो 2012 के बाद कभी घायल हुए भी हैं या नहीं."
माओवादी के तौर पर लंबा सफ़र
पहले भी कई बड़े नक्सली नेताओं के नाम सामने आए हैं. लेकिन, उन सभी ने बहुत जल्दबाजी में पुलिस पर हमला कर दिया. उन सबके मुक़ाबले हिड़मा कहीं लंबे समय से सक्रिय हैं. कहा जाता है कि जो माओवादी नेता जल्दबाज़ी करते हुए ग़लत कर बैठते हैं वो मारे जाते हैं या आत्मसमर्पण कर देते हैं. लेकिन, हिड़मा को अलग बताया जाता है.
कई पुलिसकर्मियों ने इस बात की पुष्टि की कि इस मुठभेड़ के वक़्त हिड़मा मौके पर मौजूद थे. कुछ पुलिस अधिकारियों ने बीबीसी को बताया है कि हिड़मा के अलावा सेंट्रल मिलिट्री कमिशन चीफ़ देव जी और तेलंगाना कमिटी के सचिव हरिभूषण भी वहाँ आए हुए थे.
स्थानीय स्तर पर मेलजोल
हिड़मा को बस्तर का हीरो मान जाता है. वो एक स्थानीय जनजाति से आते हैं. वो स्थानीय लोगों से घुलमिल जाते हैं और उनसे अच्छे संबंध बनाए हुए हैं. स्थानीय युवाओं में हिड़मा को लेकर दीवानगी है.
दंडकारण्य में रिपोर्टिंग करने वाले एक स्थानीय पत्रकार ने बताया, "स्थानीय लोग उन्हें देवता की तरह मानते हैं. वह सभी को ध्यान से सुनते हैं और नोट्स बनाते हैं. ये उनकी आदत है."
वे कहते हैं, "ये बात ग़लत है कि हिड़मा ने विदेशों में प्रशिक्षण प्राप्त किया है. जितना मुझे पता है उन्होंने कोई बड़ा शहर भी नहीं देखा होगा. वो दंडकारण्य या बस्तर से आगे भी नहीं गए होंगे. हिड़मा के मुख्य सड़कों पर यात्रा करने का कोई सबूत नहीं है."
हाल ही में हिड़मा पर लाखों का इनाम रखा गया था. 'द हिंदू' अख़बार ने सितंबर 2010 में लिखा था कि हिड़मा माओवादी संगठन का सर्वोच्च निकाय मानी जाने वाली केंद्रीय समिति के सदस्य बन गए हैं.
लेकिन, एक पुलिस ख़ुफ़िया अधिकारी ने बीबीसी को बताया कि हिड़मा अभी केंद्रीय समिति के सदस्य नहीं बने हैं. ऐसे में ये साफ़ नहीं है कि हिड़मा केंद्रीय समिति में हैं या नहीं.
माओवादी संगठन का ढांचा
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की मुख्य तीन शाखाएँ हैं- पहली: पार्टी, दूसरी: सशस्त्र बल और तीसरी: जनता सरकार
पार्टी: संगठनात्मक विकास, पार्टी समिति निर्देशित करती है. पार्टी उनके लिए सर्वोच्च निकाय है.
इसमें केंद्रीय समिति, राज्य समिति और ज़ोन के आधार पर समिति बनी होती है. पार्टी की केंद्रीय समिति का फ़ैसला अंतिम होता है.
सशस्त्र बल और जनता सरकार भी इसके तहत काम करते हैं.
सशस्त्र बल: इनका काम पुलिस से लड़ना है. हालाँकि, सभी माओवादी बंदूक उठाते हैं लेकिन इस शाखा में शामिल लोग मुख्यतौर पर लड़ाई लड़ते हैं. इसे पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी कहा जाता है.
ये बटालियनों, क्षेत्रीय युद्ध समूहों में काम करते हैं और कमांडरों व पार्टी के निर्देशन में चलते हैं.
जनता सरकार: इसे ही क्रांतिकारी जनता समिति के तौर पर जाना जाता है. इसके नियंत्रण वाले इलाक़ों को 'आज़ाद इलाक़े' कहा जाता है. इन इलाक़ों में ये एक तरह से सरकार चलाते हैं और पूरी व्यवस्था करते हैं.
इन इलाक़ों में रहने वाले लोगों को न्यूनतम स्वास्थ्य सुविधा, कुछ शिक्षा और कृषि में सलाह मिलती है. वो ख़ासतौर पर आदिवासियों को मलेरिया और डायरिया जैसी बीमारियों में इलाज मुहैया कराते हैं.
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