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पश्चिम बंगाल में ज़रूरत पड़ी तो बीफ़ भी बैन करेंगे और धर्मांतरण भी: दिलीप घोष
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, खड़गपुर से
पश्चिम बंगाल में हो रहे विधानसभा चुनाव पर पूरे देश की नज़र है. ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने राज्य में प्रचार करने में ख़ूब पसीना बहाया है.
चुनावी समर का आलम ये है कि हर चौक-चौराहे पर राजनीतिक परिचर्चा का दौर चल रहा है.
कोलकाता में बुधवार की शाम ऐसे ही कुछ लोगों से मुलाक़ात हुई. बीजेपी के पक्ष वाले लोग भी वहाँ थे, तो तृणमूल का समर्थन करने वाले भी.
इन सबके बीच कुछ लोग पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी के उभार और प्रदेश में ममता बनर्जी को हराकर सरकार बनाने की अटकलों से आशंकित थे.
इन लोगों का कहना था कि बंगालियों को ये बात समझ में नहीं आ रही है कि बीजेपी अगर यहाँ सत्ता में आती है, तो कई चीज़ों को थोपना शुरू करेगी.
इंस्टिट्यूट ऑफ़ डिवेलपमेंट स्टडीज़ कोलकाता में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर अन्वेषा सेनगुप्ता का ये सवाल भी सामने आया- पश्चिम बंगाल में हिंदू दुर्गा पूजा में नवरात्रि के दौरान मटन बिरयानी भी खाते हैं, जबकि उत्तर भारत के हिंदू व्रत रखते हैं. अगर बीजेपी सत्ता में आई, तो क्या हमें अपने हिसाब से दुर्गा पूजा मनाने देगी?
पश्चिम बंगाल बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष दिलीप घोष से जब मेरी मुलाक़ात हुई, तो मैंने उनके सामने ये सवाल रखा.
इस सवाल के जवाब में घोष कहते हैं, ''ये बहुत ही ओछी सोच है. कई राज्यों में हमारी सरकार है और वहाँ बीफ़ अब भी लोग खा रहे हैं. गोवा में लोग खा रहे हैं.''
लेकिन क्या ये बीजेपी का सिलेक्टिव अप्रोच नहीं है?
दिलीप घोष कहते हैं, ''उत्तर प्रदेश का सेंटिमेंट है कि वहाँ गोहत्या नहीं हो, तो हमने वहाँ प्रतिबंधित कर दिया. ज़रूरत पड़ी तो बंगाल में भी बंद कर देंगे. मैं इस बात को खुलकर कह रहा हूँ.''
''यहाँ के लोग जो चाहेंगे वही होगा. हमें लोगों के मन की बात समझनी पड़ेगी. समाज के आवेग के साथ ही हम काम करेंगे. हम 370 हटा सकते हैं, तीन तलाक़ हटा सकते हैं, तो बंगाल के लोग चाहेंगे तो बीफ़ भी बैन होगा.''
'बीजेपी आबादी का प्रतिशत देखकर टिकट नहीं देती'
कोलकाता यूनिवर्सिटी में राजनीतिक विज्ञान के प्रोफ़ेसर हिमाद्री चटर्जी कहते हैं कि बीजेपी के लिए यहाँ खान-पान कंट्रोल करना जोख़िम भरा हो सकता है.
वो कहते हैं, ''एक सर्वे के अनुसार पश्चिम बंगाल में 98 फ़ीसदी लोग मांसाहारी हैं और यह कोई धर्म के आधार पर नहीं है. आप इतनी बड़ी आबदी के फ़ूड को सेंसर नहीं कर सकते. यह एक ग़रीब राज्य है और जो भी सरकार बने उसे ये सोचना चाहिए कि कुपोषण से कैसे निजात मिले, न कि जिनसे पोषण मिल रहा है, उस पर प्रतिबंध लगा दें.''
दिलीप घोष कहते हैं, ''यहाँ दुर्गा पूजा और सरस्वती पूजा बंद की जाती है और हम इसे सुधारेंगे. हम लोकतंत्र की बात करेंगे और बहुसंख्यक आबादी की भावनाओं का ख़्याल नहीं रखेंगे, ऐसा नहीं हो सकता है.''
''यहाँ बाक़ी लोगों को समझौता करना चाहिए. उन्हें घुलना मिलना चाहिए. 22 मुस्लिम देशों में गोहत्या बैन है तो यहाँ के मुसलमान प्रतिबंध के साथ नहीं रह सकते हैं?''
हालाँकि दिलीप घोष ने ये नहीं बताया कि वे 22 कौन से इस्लामिक देश हैं और किस आधार पर कह रहे हैं कि वहाँ प्रतिबंध लगा हुआ है.
बीजेपी मुसमलानों को चुनाव में अपना उम्मीदवार बनाने से बचती है, लेकिन पश्चिम बंगाल में इस बार पार्टी ने नौ मुसलमानों को प्रत्याशी बनाया है और इनमें तीन महिलाएँ हैं.
प्रदेश में 30 फ़ीसदी से ज़्यादा मुस्लिम आबादी है. इस हिसाब से देखें तो नौ बहुत ही कम है. दिलीप घोष कहते हैं कि बीजेपी आबादी का प्रतिशत देखकर टिकट नहीं देती है.
पश्चिम बंगाल में बीजेपी सत्ता में आई, तो क्या धर्मांतरण के ख़िलाफ़ भी क़ानून बनाएगी?
दिलीप घोष कहते हैं, ''अगर धर्मांतरण के कारण यहाँ की जनसांख्यिकी बदल जाएगी और देश में फिर से विभाजन की आवाज़ उठेगी, तो हम हाथ पर हाथ रखकर बैठे नहीं रह सकते.''
प्रोफ़ेसर हिमाद्री चटर्जी कहते हैं कि पश्चिम बंगाल में यह बहस पुरानी है कि हिंदू कम हो जाएँगे और मुसलमान बहुसंख्यक हो जाएँगे.
प्रोफ़ेसर हिमाद्री कहते हैं, ''इसका कोई ठोस तथ्य नहीं है कि मुसलमान बढ़ रहे हैं और हिंदू कम हो रहे हैं.''
वो कहते हैं, ''हिंदू को बिना कास्ट और क्लास के रूप में केवल एक धर्म के तौर पर देखेंगे, तो मुसलमानों की आबादी में औसत वृद्धि थोड़ी ज़्यादा है, लेकिन यह भी धर्म के कारण नहीं है बल्कि इसकी वजह सामाजिक-आर्थिक है. लेकिन जब हिंदू को क्लास और कास्ट में देखें, तो पता चलेगा कि दलितों में जनसंख्या वृद्धि दर मुसलमानों से कम नहीं है और इसकी वजह भी सामाजिक-आर्थिक ही है."
'बंगाल में सब कुछ उलट-पुलट होने जा रहा है'
बीजेपी के एक प्रवक्ता ने नाम नहीं लिखने की शर्त पर कहा कि इस बार बंगाल में सब कुछ उलट-पुलट होने जा रहा है. आख़िर ऐसा क्या उलट-पुलट होने जा रहा है?
वो कहते हैं, ''बंगाल को अब तक कोलकाता के अपर कास्ट वाले चलाते थे. लेकिन अब पिछड़ी जाति, एससी और एसटी वाले बंगाल को कोलकाता से नहीं ज़िलों से चलाएँगे. बंगाल में कोई पिछड़ी जाति, अनुसूचित जाति या जनजाति का सीएम बनने जा रहा है.''
''अगर पिछड़ी जाति के व्यक्ति को पार्टी सीएम बनाने का फ़ैसला लेती है, तो दिलीप घोष सबसे आगे हैं. लेकिन मेरा मानना है कि इस बार बंगाल का सीएम कोई एसटी बनेगा और वो होंगे, बालुर्घाट से बीजेपी सांसद सुकांतो मजूमदार.''
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस, सीपीएम और टीएमसी का नेतृत्व अपर कास्ट के लोगों के हाथ में रहा. लेकिन क्या बीजेपी इसे बदलने जा रही है?
दिलीप घोष कहते हैं, ''पश्चिम बंगाल में अनुसूचित जनजातियों के लिए दो सीट रिज़र्व है, लेकिन हमने ऐसे तीन लोगों को सांसद बनाया. एक को सामान्य सीट से भी उतारा और जीत दिलाई. ये हिम्मत बीजेपी ही कर सकती है और किसी के पास नहीं है. पंचायत से संसद तक दलितों और आदिवासियों के इलाक़ों में बीजेपी को जीत मिली है.''
लोकसभा चुनाव में पश्चिम बंगाल में अनुसूचित जाति के लिए 10 सीटें रिज़र्व हैं, जिनमें से पाँच पर बीजेपी को 2019 में जीत मिली थी.
कहा जा रहा है कि बीजेपी ने पश्चिम बंगाल में भी दलितों, जनजातियों और पिछड़ी जातियों की गोलबंदी तैयार कर ली है और ये गोलबंदी ममता, सीपीएम के भद्रलोक की राजनीति पर भारी पड़ने वाली है.
दिलीप घोष को बीजेपी में मुख्यमंत्री के उम्मीदवार की रेस में सबसे आगे बताया जा रहा है, लेकिन स्वपन दासगुप्ता और अनिर्बान गांगुली का नाम भी ख़ूब लिया जा रहा है.
नरेंद्र मोदी और अमित शाह की बीजेपी में जितने मुख्यमंत्री बनाए गए हैं, सब संगठन में लंबे समय से जुड़े रहे हैं और इस कसौटी पर दिलीप घोष सबसे फ़िट बैठते हैं.
संघ के प्रचारक भी रहे हैं घोष
दिलीप घोष पश्चिम बंगाल बीजेपी के नौंवे प्रदेश अध्यक्ष हैं. वे अभी मेदिनीपुर से लोकसभा सांसद हैं.
दिलीप घोष ने 20 की उम्र ही घर छोड़ दिया था और आरएसएस के पूर्णकालिक सदस्य बन गए थे. घोष 1984 में आरएसएस में प्रचारक बन गए. इन्होंने पूर्व आरएसएस प्रमुख केएस सुदर्शन के सहायक के रूप में भी काम किया और 1999 से 2007 तक आरएसएस के अंडमान निकोबार यूनिट के प्रमुख रहे.
2014 में दिलीप घोष आरएसएस से बीजेपी में लाए गए और बंगाल बीजेपी में महासचिव बनाए गए. 2015 में घोष को पश्चिम बंगाल बीजेपी की कमान सौंप दी गई.
दिलीप घोष ने चुनावी करियर की शुरुआत 2016 में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव से की. इन्होंने कांग्रेस नेता ज्ञान सिंह सोहनलाल को खड़गपुर सदर से हरा दिया. सोहनलाल 1982 से 2011 तक इस सीट से लगातार विधायक बनते आ रहे थे.
दिलीप घोष के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल बीजेपी ने 2019 के लोकसभा चुनाव में इतिहास रच दिया, जब 42 में से 18 सीटों पर जीत मिली. बीजेपी के खाते में 40 फ़ीसदी वोट आए.
इसी चुनाव में घोष भी मेदिनीपुर लोकसभा सीट से सांसद चुने गए. हालाँकि इसका अहसास 2018 के पंचायत चुनाव में ही हो गया था. पंचायत चुनाव में बीजेपी को 35 फ़ीसदी से ज़्यादा वोट मिले थे.
कहा जा रहा है कि दिलीप घोष के नेतृत्व में पश्चिम बंगाल बीजेपी एक बार फिर इतिहास रच सकती है क्योंकि राज्य में एक-एक सीट के लिए तरसने वाली बीजेपी सत्ताधारी टीएमसी को कड़ी चुनौती दे रही है. आख़िर दिलीप घोष ने ऐसा क्या कर दिया कि बीजेपी पश्चिम बंगाल में थमने का नाम नहीं ले रही है?
दिलीप घोष कहते हैं, ''हमारी पार्टी देश भर में आगे बढ़ रही है और हमारे नेता नरेंद्र मोदी विश्व स्तरीय हैं. उनका विज़न ही अलग है. बंगाल को जीतना था, इसलिए हमने उसी स्तर का काम करना शुरू किया. संगठन को मज़बूत किया.''
''इनमें कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण और आंदोलन, दोनों का सहारा लिया गया. जब अमित भाई पार्टी अध्यक्ष बने, तो इन्होंने पश्चिम बंगाल में जाना शुरू किया और बड़ी संख्या में कार्यकर्ताओं को तैयार किया. पहले तो कोई भाजपा को पूछता भी नहीं था, क्योंकि हम उस तरह से एक्शन में रहे ही नहीं.''
'हमने अपनी ताक़त का अहसास करा दिया'
दिलीप घोष कहते हैं कि बंगाल की राजनीति में आपको छिप कर वार करने से कुछ नहीं मिलेगा, बल्कि इसके लिए मोर्चे पर सीधे डटकर आना होगा.
घोष कहते हैं, ''लोगों को भरोसा होने लगा कि बीजेपी डरने वाली नहीं है. मुझसे पहले भी अध्यक्ष रहे यहाँ, लेकिन पश्चिम बंगाल की राजनीति की जो धारा है, उसमें ईंट का जवाब पत्थर से देना होता है.''
''यहाँ भय और हिंसा की राजनीति होती है और उसमें सामने बढ़ने के लिए थोड़ा दम चाहिए और मुझे लगा कि हमको जीतना है तो इसी रास्ते पर आगे बढ़ना होगा. हमने अपनी ताक़त का अहसास करा दिया. 2019 में तो दो करोड़ 30 लाख वोट मिला और 18 सांसद जीतकर आए.''
बीजेपी ने इस चुनाव में कई सांसदों को चुनावी मैदान में उतार दिया है. बाबुल सुप्रियो तो केंद्र में मंत्री भी हैं और विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं.
इसके अलावा हुगली से लोकसभा सांसद लॉकेट चटर्जी, कूचबिहार के सांसद निशिथ प्रमाणिक और राज्यसभा सांसद स्वपन दासगुप्ता भी विधानसभा चुनाव लड़ रहे हैं. लेकिन बीजेपी ने दिलीप घोष को विधानसभा चुनाव में क्यों नहीं उतारा?
दिलीप घोष कहते हैं, ''यह पार्टी का फ़ैसला है. दो मई तक इंतज़ार कीजिए सब पता चल जाएगा.''
आरएसएस से बीजेपी में आकर इतना सफल होना सबके साथ नहीं होता, लेकिन दिलीप घोष इस मामले में बिल्कुल अलग हैं. राम माधव भी आरएसएस से बीजेपी में आए थे, लेकिन उन्हें फिर से आरएसस में भेज दिया गया.
दिलीप घोष बीजेपी के हिंदुवादी एजेंडे को लेकर बहुत ही आक्रामक रहते हैं. दिलीप घोष कहते हैं कि ममता बनर्जी से कोई आँख से आँख मिलाकर बात नहीं करता था.
वो कहते हैं, ''ममता को उसी भाषा में जवाब देने की ज़रूरत थी. मैंने यही किया. ममता से डरकर बीजेपी यहाँ नहीं आ सकती थी. अगर हमें कोई डराएगा, तो हमारी रणनीति यह रही कि हम डरेंगे नहीं. दिलीप घोष बंगाल में ममता से डरता नहीं है, बल्कि डटकर खड़ा रहता है.''
दो दिन पहले ही पुरुलिया में दिलीप घोष एक रैली को संबोधित कर रहे थे. इस संबोधन में उन्होंने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पर एक विवादित टिप्पणी की.
दिलीप घोष ने कहा था, ''ममता का प्लास्टर हटा दिया गया है और कपड़े का बैंडेज लगा है. लेकिन वो अपना पैर सबको दिखा रही हैं. वे साड़ी पहनती हैं, पर एक पैर सबको दिखा रही हैं. मैंने किसी को इस तरह से साड़ी पहनते नहीं देखा. अगर आप अपना पैर ही दिखाना चाहती हैं तो साड़ी क्यों पहन रही हैं, बल्कि बरमूडा पहन लेना चाहिए, ताकि हर कोई ठीक से देख सके."
'ममता आज की तारीख़ में मिमिया रहीं'
दिलीप घोष को आरएसएस की परवरिश एक महिला पर ऐसी टिप्पणी करने की इजाज़त देती है?
इस सवाल के जवाब में घोष कहते हैं, ''मैंने कुछ भी ग़लत नहीं कहा है. समाज में जो लोग सोचते हैं मैंने वही बात कही. ये कोई भव्यता नहीं है. एक महिला पैर उठाकर दिखाएगी सबको?''
''वो हमारी मुख्यमंत्री हैं. ये बंगाल की संस्कृति नहीं है. कोई भी बोलेगा. बात ये है कि ममता बनर्जी कुछ भी करती थीं, तो किसी को बोलने की हिम्मत नहीं होती थी. लेकिन दिलीप घोष ने प्रतिवाद करना शुरू किया और आँख से आँख मिलाकर कहा कि ये जो कर रही हैं, वो ठीक नहीं है.''
घोष कहते हैं, ''ममता आज की तारीख़ में मिमिया रही हैं. टूटा हुआ पैर दिखाकर वोट मांग रही हैं. उन्हें सहानुभूति चाहिए, लेकिन हम स्वाभिमान के साथ चुनाव लड़ने वाले लोग हैं. हमारे समाज में घाव छिपाने की परंपरा है न कि दिखाने की.''
दिलीप घोष पर विवादित बयानों को लेकर अदालत में कम से कम 45 मामले दर्ज हैं, लेकिन वो ऊपरी अदालतों में जाते हैं और बेल कर आ जाते हैं. ज़मानत मिलने के बाद वो और आक्रामक हो जाते हैं.
दिलीप घोष गाँवों में अपने कार्यकर्ताओं से खुलेआम कहते हैं कि पुलिस वालों से डरो मत. बल्कि ये कहते हैं कि पुलिसवाले झूठे मुक़दमा दर्ज करें, तो उन्हें छोड़ो मत पकड़कर मारो और बीजेपी मई में जब सरकार बनाएगी, तो उन सभी पुलिस वालों का हिसाब किताब लेगी.
राज्य के पत्रकारों का कहना है कि दिलीप घोष की यह आक्रामकता ग्रामीण इलाक़ों में ख़ूब पसंद की जाती है, इसलिए घोष अभी बीजेपी में सबसे लोकप्रिय नेता हैं.
दिलीप घोष ख़ुद भी कहते हैं कि वो वही बात करते हैं जो जनता पसंद करती है. घोष ने कहा, ''ममता को बरमूडा पहने वाली बात मैंने इसलिए कही, क्योंकि मुझे पता था कि लोग पसंद करेंगे.''
दिलीप घोष कहते हैं, ''हम किसी को छोड़ने नहीं जा रहे हैं. सत्ता में आने पर सबका हिसाब-किताब होगा. हम कई जाँच बैठाएँगे.''
दिलीप घोष सुबह पाँच बजे घर छोड़ देते हैं और नौ बजे अपने कार्यकर्ताओं के साथ लौटते हैं. तब तक उनके घर पर आम लोगों की भीड़ लगी रहती है और सबसे मिलते जुलते हैं. अविवाहित दिलीप घोष कहते हैं कि उनके जीवन में राजनीति के सिवा कुछ नहीं है.
रोज़गार के सवाल पर घोष कुछ नहीं बोले
बीजेपी की टैगलाइन है- पहले राष्ट्र, फिर पार्टी और अंत में ख़ुद. दूसरी तरफ़ रबींद्रनाथ टैगोर, जिनसे बंगाल दुनिया भर में जाना जाता है, उनका राष्ट्रवाद को लेकर कहना था- राष्ट्रवाद हमारा अंतिम आध्यात्मिक मंज़िल नहीं हो सकता. मेरी शरणस्थली तो मानवता ही है. हीरों की क़ीमत पर मैं शीशा नहीं ख़रीदूँगा. जब तक मैं जीवित हूँ, तब तक देशभक्ति को मानवता पर विजयी नहीं होने दूँगा.''
टैगोर ने आपके राष्ट्रवाद को एक तरह से शीशा कहा है और आप उसी शीशे का महल बनाना चाहते हैं.
इस पर दिलीप घोष कहते हैं कि समय के हिसाब से चीज़ें बदलती हैं और राष्ट्रवाद का तेवर भी बदलता है.
आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने दो महीने पहले ही कहा था कि हिंदू कभी भारत द्रोही नहीं हो सकता. क्या आप भी मानते हैं कि हिंदू होना देशभक्त होने की गारंटी है? इसका संदेश तो यही जाता है कि हिंदू भारत द्रोही नहीं हो सकता है, लेकिन बाक़ी मज़हब वाले हो सकते हैं?
इस पर दिलीप घोष कहते हैं, ''हमारे हिंदुत्व के भीतर सारे मज़हब के लोग हैं और हम हिंदू कहते हैं, तो इसमें सारे मज़हब के लोग शामिल हैं. मुसलमान भी हिंदुत्व में आते हैं. इस देश में जो भी पैदा हुए हैं, मातृभूमि का सम्मान करते हैं और महापुरुषों को मानते हैं, वो हिंदू हैं.''
आपने संकल्प पत्र में ख़ूब लोकलुभावन वादे किए हैं. लोग पूछ रहे हैं कि बीजेपी ने इतने अच्छे संकल्प पत्र को उन राज्यों में क्यों नहीं लागू किया, जहाँ उनकी सरकारें हैं?
अमित शाह ने कहा कि वो बनिया हैं और इसे लागू करने का हिसाब पहले से ही कर चुके हैं. क्या अमित शाह का बनिया होना बंगाल में घोषणापत्र लागू होने की गारंटी है?
इस सवाल के जवाब में दिलीप घोष कहते हैं, ''हम बोलकर मुकरने वाले लोगों में से नहीं हैं. हम जो कहते हैं वो करते हैं.'' 2014 में बीजेपी ने केंद्र में सरकार बनने पर हर साल दो करोड़ लोगों को रोज़गार देने का वादा किया था लेकिन सात सालों बाद भी ऐसा नहीं हुआ. इस सवाल का जवाब दिलीप घोष गोलमोल दे देते हैं.
टीएमसी के बड़े-बड़े नेता बीजेपी में आए हैं. क्या बीजेपी उन्हें भी सीएम बना सकती है?
इसके जवाब में दिलीप घोष कहते हैं, ''असम के मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री किसी और पार्टी के हैं. केंद्र में भी कई वरिष्ठ मंत्री दूसरी पार्टियों के हैं. जो भी अनुभवी लोग हैं, हम उन्हें मौक़ा देते हैं. हमें ये करना पड़ता है, क्योंकि कोई पार्टी रातों-रात नहीं खड़ी हो जाती है.''
क्या दिलीप घोष तो ममता बनर्जी में कुछ ख़ूबियाँ दिखती हैं, भले विपक्षी हैं.
इस पर घोष कहते हैं, ''ममता ने सीपीएम के अत्याचार के ख़िलाफ़ लड़ाई की. एक महिला होने के नाते जिस तरह से उन्होंने लड़ाई की, लोगों का भरोसा जीता. लेकिन प्रशासक के नाते वो फ़ेल हैं. सरकार चलाना उन्हें नहीं आता. वो प्रशासनिक बैठक में प्रधानमंत्री को गाली देने लगती हैं.''
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