केजरीवाल सरकार की नई आबकारी नीति: दिल्ली में शराब की सरकारी दुकानें बंद होने से क्या बदलेगा

दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल

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    • Author, कमलेश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दिल्ली सरकार ने नई आबकारी नीति को मंजूरी दे दी है. दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने सोमवार को प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इसकी जानकारी दी.

दिल्ली सरकार के मंत्रियों ने राज्य कैबिनेट को अपनी सिफारिशें दी थीं जिन्हें मंजूर कर लिया गया है.

नई आबकारी नीति के तहत दिल्ली सरकार ने कई बड़े बदलाव करने का फैसला लिया है. जिसमें शराब की सरकारी दुकानें बंद करने से लेकर शराब पीने की न्यूनतम उम्र 21 साल करने तक के फैसले शामिल हैं.

मनीष सिसोदिया ने बताया कि केजरीवाल कैबिनेट ने सोमवार को नई आबकारी नीति पर मुहर लगा दी है.

यह नीति इसी साल लागू कर दी जाएगी. इस नीति से सरकार का 20 फीसदी राजस्व भी बढ़ेगा.

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नई आबकारी नीति में प्रमुख बातें

- दिल्ली में अब शराब की सरकारी दुकानें नहीं होंगी.

- वॉर्ड के अनुसार शराब की दुकानों का समान वितरण होगा.

- शराब की कोई नई दुकान नहीं खोली जाएगी. अभी जितनी मौजूदा दुकानें हैं, उतनी ही दिल्ली में चलेंगी.

- दिल्ली में शराब पीने के लिए क़ानूनी उम्र को 25 साल से घटाकर 21 साल कर दिया गया है.

वीडियो कैप्शन, क्या आप भी शराब पीते हैं?

नई नीति के पीछे वजहें

उपमुख्यमंत्री ने नई अबकारी नीति लाने के पीछे मुख्यत: दो वजह बताईं. पहली शराब माफियाओं पर नियंत्रण पाना और दूसरा सरकार का राजस्व बढ़ाना.

साथ ही उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि शराब की दुकानों का इलाक़े के अनुसार समान वितरण होना चाहिए और ग्राहकों के लिए शराब खरीदना सुविधाजनक होना चाहिए.

उन्होंने कहा कि आबकारी नीति में बदलाव करके उन सारे फैक्टर्स को हटाया जा रहा है जिनकी वजह से शराब माफिया अपना अवैध कारोबार चलाने में कामयाब होता है.

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मनीष सिसोदिया ने बताया, "कुछ महीने पहले आबकारी विभाग में दिल्ली में शराब खरीदने और बेचने के सिस्टम, रिवेन्यू लीकेज को ठीक करने के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाई गई थी. समिति रिपोर्ट में जनता के सुझाव भी मांगे गए थे. करीब 14,700 सुझाव जनता की तरफ से आए."

"मुख्यमंत्री की तरफ से मंत्रियों का एक समूह बनाया गया था जिसे ये तय हुआ था कि विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट और जनता के सुझावों और मौजूदा सिस्टम का गहरा अध्ययन करके अपनी सिफारिशें देनी थीं. मंत्री समूह की सिफारिशों को कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है."

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दुकानों का असमान वितरण

उपमुख्यमंत्री ने शराब की दुकानों के समान वितरण पर जोर दिया.

उन्होंने बताया कि दिल्ली में देखें तो कुछ इलाक़ों में बहुत कम शराब की दुकानें हैं और कुछ में जरूरत से ज़्यादा दुकानें हैं. इसकी वजह से दिल्ली में शराब माफिया जगह बना पाया है.

उपमुख्यमंत्री ने बताया कि दिल्ली में 272 वॉर्ड हैं, उनमें से 79 वॉर्ड में एक भी शराब की दुकान नहीं है. 45 ऐसे वॉर्ड हैं, जहां एक से दो दुकानें हैं. 158 वॉर्ड यानी करीब 58 प्रतिशत ऐसी जगहें हैं, जहां दुकानें नहीं हैं या कम हैं. 8 प्रतिशत नॉर्मल वॉर्ड हैं. 54 वॉर्ड ऐसे हैं जहां 6 से ज़्यादा या 10 से ज़्यादा दुकानें हैं. दिल्ली में करीब 850 दुकानें हैं, जिसमें से 50 प्रतिशत दुकानें 45 वॉर्ड में हैं.

इसका एक नुक़सान ये हो रहा है कि जिन इलाक़ों में दुकान नहीं है वहां अवैध कारोबारी अपना काम चला रहे हैं. घरों, गोडाउन और दुकानों में अवैध शराब बेच रहे हैं.

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नहीं खुलेंगी नई दुकानें

मनीष सिसोदिया ने बताया कि 2016 के बाद से दिल्ली में शराब की नई दुकान नहीं खुली है और आगे भी नहीं खोली जाएगी. साथ ही दुकानों का आकार भी बढ़ाया जाएगा जिससे ग्राहक को सुविधा हो.

उपमुख्यमंत्री ने कहा कि सरकारी दुकानें 150 वर्ग फीट में बनी हुईं छोटी दुकानें हैं और उनके बाहर जेल जैसा दृश्य रहता है. उनका काउंटर सड़क पर होता है और वहां पर शराब खरीदने वालों की लंबी लाइन लगी होती है. अब किसी भी शराब की दुकाने के लिए कम से कम 500 वर्ग फीट की दुकान होना ज़रूरी होगा. साथ ही उसका कोई काउंटर सड़क की तरफ नहीं खुलेगा.

साथ ही दिल्ली में शराब की गुणवत्ता की जांच के लिए सरकार अपना एक सिस्टम बनाएगी. शराब की गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय स्तर की होनी चाहिए.

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कितना सुधार, कितना राजस्व

दिल्ली सरकार के मुताबिक नई नीति से शराब कारोबार के सिस्टम में बढ़ा बदलाव आएगा. लेकिन, ये देखना भी महत्वपूर्ण होगा कि इन बदलावों को लागू करा पाना कितना मुश्किल होगा.

नियम तो एक साल में लागू हो जाएंगे लेकिन व्यवस्था बदलते-बदलते समय लग सकता है. वहीं, जिस तरह के बड़े सुधारों की बात कही गई है तो नई नीति कितना सुधार और कितना राजस्व ला पाएगी?

इस संबंध में दिल्ली सरकार में पूर्व मुख्य सचिव ओमेश सहगल कहते हैं कि उन्हें इससे बहुत ज़्यादा राजस्व आता नहीं दिखता. वहीं, इसमें बहुत अधिक निगरानी की भी ज़रूरत पड़ने वाली है.

ओमेश सहगल बताते हैं, "जब सरकारी दुकानें नहीं थीं तो बहुत ज़्यादा अवैध शराब का काम चलता था. इसी को रोकने के लिए सरकारी दुकानें खोली गईं. लेकिन, अब उन्हें बंद किया जा रहा है. मुझे नहीं समझ आ रहा कि सरकारी दुकानें बंद करने से सरकार को क्या फायदा होगा."

"राजस्व बढ़ाने की बात तो कही गई लेकिन वो होगा कैसे ये साफ नहीं है. राजस्व या तो टैक्स की दर बढ़ाने से आता है या मांग बढ़ने से आता है. अगर आप टैक्स बढ़ाते हैं तो शराब की कीमत बढ़ जाती है लेकिन, शराब की कीमत पड़ोसी राज्यों को देखते हुए ही तय करनी होती है. वहीं, दुकान प्राइवेट हो सरकारी दिल्ली में जितने ग्राहक हैं आगे भी उतने ही रहेंगे."

शराब

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दिल्ली सरकार के पास शराब बिकने से आने वाले राजस्व के तरीके की बात करें तो सरकारी दुकानों में शराब बिक्री से मिलने वाला लाभ सरकार के पास जाता है और प्राइवेट दुकानों से उसे टैक्स के ज़रिए राजस्व मिलता है.

मनीष सिसोदिया ने बताया कि सरकार को सरकारी दुकानों के मुक़ाबले प्राइवेट दुकानों से ज़्यादा राजस्व आता है. अभी करीब 60 पर्सेंट दुकानें सरकारी हैं लेकिन यहां पर टैक्स की बहुत चोरी होती है. यहां ब्रांड पुशिंग भी बहुत होती है. वहीं, 40 फीसदी प्राइवेट दुकानों से ज्यादा रेवेन्यू आ रहा है.

ऐसे में अगर सभी दुकानें प्राइवेट होती हैं तो सरकार को पहले से ज़्यादा टैक्स मिल सकता है जो सरकारी दुकानों के लाभ से अधिक भी हो सकता है.

शराब दिल्ली में राजस्व का सबसे बड़ा स्रोत है. 2019-20 में शराब से 5,400 करोड़ रुपये का राजस्व मिला था.

उपमुख्यमंत्री ने बताया कि नई नीति से सरकार का लगभग 20 फीसदी राजस्व एकसाथ बढ़ेगा. पिछले कुछ सालों का ट्रेंड है कि 5 प्रतिशत राजस्व में बढ़ोतरी होती है, लेकिन नई पॉलिसी से एक साल में 1500 से 2000 करोड़ तक का राजस्व बढ़ सकता है.

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अवैध शराब पर रोक

दिल्ली सरकार ने नई नीतियों का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य भ्रष्टाचार और अवैध शराब की बिक्री पर रोक को बताया है.

लेकिन, ओमेश सहगल मानते हैं कि अवैध शराब की बिक्री सरकारी और प्राइवेट किसी भी दुकान में हो सकती है. प्राइवेट दुकानों पर अगर कोई अवैध शराब रखता है और निरीक्षण करने वाले अधिकारी को भी भ्रष्ट कर देता है तो आप क्या करेंगे. अवैध शराब तो प्राइवेट या सरकारी किसी भी दुकान में बेची जा सकती है. ये इस बात पर निर्भर करता है कि क़ानून व्यवस्था कितनी मजबूत है.

हालांकि, लोगों को अपने इलाक़े में शराब की दुकान मिलने से अवैध शराब के कारोबार पर ज़रूर असर पड़ेगा लेकिन जो प्राइवेट दुकानें वहां खुलेंगी उन पर सख़्ती से नज़र रखनी होगी.

शराब की दुकान
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उम्र में बदलाव का असर

दिल्ली में शराब पीने की उम्र नोएडा-गाजियाबाद की तरह 25 से घटकर 21 कर दी जाएगी. अब दिल्ली में 21 साल उम्र तक के लोग भी शराब खरीद सकेंगे. साथ ही एज गेटिंग भी होगी यानी किसी ऐसी जगह पर 21 साल से कम उम्र के बच्चों को प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाएगी जहां शराब सर्व की जाती है.

इससे शराब की बिक्री बढ़ने की बात कही जा रही है. लेकिन, कनफेडरेशन ऑफ इंडियन एल्कॉहलिक बेवरेज कंपनीज़ केडायरेक्टर जनरलविनोद गिरी कहते हैं कि ये फैसला शराब बिक्री से ज़्यादा समाज से जुड़ा है.

वह कहते हैं, "इस नियम के साथ सरकार ने एक सामान्य नागरिक व्यवहार को को अपराध के दायरे से बाहर कर दिया है. 21 साल के लोग शादी कर सकते हैं, वोट दे सकते हैं लेकिन शराब नहीं पी सकते. ये नियम बहुत अटपटा था. जहां तक शराब की बिक्री की बात है तो इसका बहुत ज़्यादा असर नहीं पड़ेगा क्योंकि पहले भी इस उम्र के लोग शराब पी रहे थे. हां, बार-रेस्तरां में ज़रूर बिक्री बढ़ सकती है."

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कुछ हाथों तक ना सिमटें दुकानें

शराब उद्योग से जुड़े लोगों की नई नीतियों से जुड़ी कुछ और चिंताएं भी हैं. इनमें से एक बड़ी चिंता प्राइवेट दुकानें आवंटित करने के सिस्टम को लेकर है.

विनोद गिरि ने बताया कि ये देखना महत्वपूर्ण होगा कि दुकानों का निजीकरण कैसे किया जाएगा. सरकार कोई भी तरीका अपनाए लेकिन ये बात ध्यान रखनी होगी कि कार्टेल ना बनें यानी कुछ ही लोगों तक ये दुकानें सीमित ना रह जाएं. सरकार को इसमें होने वाली धांधली पर खासतौर पर लगाम लगानी होगी वरना दिल्ली में होने वाला शराब कारोबार कुछ ही हाथों में सिमट कर रह जाएगा.

वहीं, ओमेश सहगल बताते हैं कि अगर इसके लिए बोली लगती है तो वहां कड़ी प्रतिस्पर्धा होती है क्योंकि शराब के कारोबार में कमाई बहुत अधिक है. अब अगर कोई कारोबारी महंगी बोली लगाता है तो वो अवैध तरीकों से ज़्यादा कमाई करके कीमत वसूलने की कोशिश भी करेगा. इसे भी ध्यान में रखकर चलना होगा.

जानकार दिल्ली सरकार के कुछ फैसलों को अच्छा बताते हैं जैसे ड्राइ डे घटा देना, लोगों का खरीदारी का अनुभव बेहतर करने की कोशिश करना और सरकारी दुकानों के बाहर लगने वाली भीड़ को कम करना. लेकिन, शराब की दुकानों में काम करने वाले मौजूदा सरकारी कर्मचारियों का भविष्य, दुकानों का आवंटन और पारदर्शिता जैसे मसले चुनौतीपूर्ण हो सकते हैं.

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