You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
सुप्रीम कोर्ट: लॉकडाउन की वजह से लोन चुकाने पर मिली छह माह की छूट नहीं बढ़ेगी
सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल लगे लॉकडाउन के चलते लोन की मासिक किस्त चुकाने से दी गई राहत (मोरेटोरियम की अवधि) को छह महीने से ज़्यादा बढ़ाने से इनकार कर दिया है. अदालत ने हालांकि यह ज़रूर कहा है कि इस दौरान लोगों को उनके लोन पर कोई चक्रवृद्धि ब्याज नहीं देना होगा.
इसके साथ ही कोर्ट ने मंगलवार को दिए अपने फ़ैसले में लोन लेने वालों को किसी और तरह की वित्तीय राहत देने से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि लॉकडाउन के दौरान लोन पर ब्याज़ की पूरी छूट की मॉंग मानना संभव नहीं है.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आर्थिक मसलों पर लिए गए नीतिगत निर्णयों पर न्यायिक समीक्षा का दायरा सीमित है. उसने कहा कि यह तय करना अदालत का काम नहीं है कि सार्वजनिक नीति और बेहतर हो सकती थी. ऐसे में बेहतरी की मॉंग के आधार पर किसी नीति को रद्द नहीं कर सकते.
अदालत के अनुसार, केंद्र सरकार और आरबीआई जानकारों की राय पर विचार करके अपनी आर्थिक नीति तय करते हैं, जबकि अदालत से आर्थिक मामलों में विशेषज्ञता की उम्मीद नहीं की जा सकती. सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आर्थिक नीति पर वह केंद्र सरकार के सलाहकार नहीं हैं.
कोरोना महामारी के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इससे पूरा देश प्रभावित हुआ. आर्थिक तंगी और लॉकडाउन से करों में कमी आने के बीच अर्थव्यवस्था को मज़बूत बनाने के लिए केंद्र सरकार को आर्थिक पैकेज़ की घोषणा करनी पड़ी. और ऐसा करने से पहले केंद्र सरकार को आरबीआई से पूछने के लिए बाध्य नहीं कर सकते.
क्या है मामला
कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप के चलते पिछले साल 25 मार्च से अनिश्चित काल के लिए लॉकडाउन लगा दिया गया था. इस चलते अर्थव्यवस्था का ज्यादातर हिस्सा बुरी तरह ठप हो गया था.
ऐसे में लोन लेने वालों को राहत देने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक ने एलान किया था कि कर्ज देने वाली संस्थाएं एक मार्च, 2020 से 31 अगस्त 2020 के बीच दो करोड़ तक का लोन लेने वालों को किस्त चुकाने से छूट दें. आरबीआई ने बाद में सभी बैंकों को लोन को बिना एनपीए खाते में डाले एक बार लोन रीस्ट्रक्चर करने की इजाजत दे दी थी.
बाद में मोराटोरियम अवधि के दौरान ब्याज पर ब्याज यानी चक्रवृद्धि ब्याज चुकाने का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया. सरकार ने वहॉं कहा कि कर्ज़दारों को चक्रवृद्धि की बजाय साधारण ब्याज देना होगा. इससे सरकारी खजाने पर लगभग सात हजार करोड़ रुपये का बोझ पड़ने का अनुमान है.
बाद में सरकार ने साफ किया कि अगर किसी कर्ज़दार ने मोराटोरियम मिलने के बावज़ूद किस्त का भुगतान समय पर कर दिया तो उन्हें बैंक से कैशबैक दिया जाएगा. इसके तहत ऐसे कर्ज़दारों को छह महीने के साधारण और चक्रवृद्धि ब्याज में अंतर का लाभ दिया जाएगा.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)