बैंकों को प्राइवेट बनाने पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के तर्क

आम बजट में दो बैंकों के निजीकरण की घोषणा के बाद सरकारी बैंकों की दो दिवसीय हड़ताल समाप्त हो चुकी है लेकिन इस पर सियासी बहसबाज़ियां भी ख़ूब हुईं.

इसकी शुरुआत मंगलवार को कांग्रेस नेता राहुल गांधी के ट्वीट के बाद हुई.

कांग्रेस नेता ने ट्वीट करके हड़ताल कर रहे बैंक कर्मचारियों का समर्थन किया था. उन्होंने ट्वीट में लिखा था कि 'भारत सरकार लाभ का निजीकरण और हानि का राष्ट्रीयकरण कर रही है.'

राहुल गांधी ने लिखा, "सरकारी क्षेत्र के बैंकों को 'मोदीक्रोनीज़' को बेचना भारत की वित्तीय सुरक्षा से खिलवाड़ करना है. मैं हड़ताल कर रहे बैंक कर्मचारियों के साथ एकजुटता के साथ खड़ा हूँ.''

वित्त मंत्री ने दिया जवाब

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मंगलवार को मीडिया ब्रीफ़िंग के दौरान इसका जवाब देते हुए कहा कि राहुल गांधी विपक्षी पार्टी के नेता की तरह व्यवहार नहीं करते हैं.

उन्होंने कहा कि यूपीए सरकार ने एक परिवार की भलाई के लिए 'भ्रष्टाचार का राष्ट्रीयकरण' किया और 'करदाताओं के पैसे का निजीकरण' किया.

निर्मला सीतारमण ने कहा, "वो अचानक लाभ और हानि के बारे में क्यों सोचने लगे हैं? दशकों तक उनकी सरकार ने करदाताओं के पैसों के निजीकरण की कोशिश की. आप जानते हैं कि कैसे. यूपीए सरकार एक परिवार की भलाई के लिए करदाताओं के पैसे का निजीकरण करती रही."

उन्होंने कहा, "उनकी दादी ने बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया लेकिन बैंकों में घाटे का राष्ट्रीयकरण यूपीए के समय में हुआ."

बैंकों के निजीकरण पर क्या बोलीं?

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने दो बैंकों के निजीकरण की प्रस्तावित प्रक्रिया पर कहा कि सभी बैंकों का निजीकरण नहीं होगा और यह जब भी होगा तो कर्मचारियों के हितों की रक्षा की जाएगी.

सोमवार और मंगलवार को सरकारी बैंकों ने हड़ताल की थी जिसमें 10 लाख से अधिक कर्मचारी शामिल हुए थे.

निर्मला सीतारमण ने कहा कि 'निजीकरण का फ़ैसला काफ़ी सोच-समझकर लिया गया गया है और हम चाहते हैं कि बैंकों में और अधिक इक्विटी आए. हम बैंकों को देश की आकांक्षाओं को पूरा करने वाला बनाना चाहते हैं.'

उन्होंने कहा, "जिन भी बैंकों का निजीकरण होगा उनके हर स्टाफ़ सदस्यों के हितों को सुरक्षित रखा जाएगा. मौजूदा कर्मचारियों के हितों की हर क़ीमत पर रक्षा होगी."

"सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों की नीति बिल्कुल साफ़ कहती है कि हम सरकारी बैंकों के साथ रहेंगे. कर्मचारियों के हितों को बिलकुल सुरक्षित रखेंगे."

"हमने सार्वजनिक उद्यम नीति की घोषणा की थी जिसमें हमने उन चार क्षेत्रों को चिह्नित किया है जहाँ पर सरकार की मौजूदगी रहेगी. कुछ जगहों पर सरकारी की मौजूदगी कम रहेगी लेकिन वहां भी वित्तीय संस्थान रहेंगे."

निर्मला कहती हैं, "इसका मतलब है कि वित्तीय क्षेत्र में भी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रम रहेंगे. सभी का निजीकरण नहीं होने जा रहा है."

बैंकों के निजीकरण पर क्या कहते हैं अर्थशास्त्री?

देश के केंद्रीय बैंक आरबीआई के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने समाचार एजेंसी पीटीआई को दिए इंटरव्यू में निष्प्रभावी सरकारी बैंकों के सफल निजीकरण पर संदेह जताया है.

साथ ही उन्होंने कहा है कि अगर ये कॉर्पोरेट घरानों को बेच भी दिए जाते हैं तो यह एक 'बहुत बड़ी ग़लती' होगी.

हाल ही में समाचार चैनल एनडीटीवी के टाउन हॉल कार्यक्रम में भी रघुराम राजन ने बैंकों के निजीकरण को ग़लती बताया था.

बैंकों के निजीकरण की क्या प्रक्रिया हो सकती है? इस सवाल के जवाब में राजन ने कहा कि इस समय सरकारी बैंकों के संचालन तंत्र को ठीक करने की ज़रूरत है.

उन्होंने कहा, "पेशेवर लोगों को और लाइये, बोर्ड को सीईओ नियुक्त करने और हटाने का खुला अधिकार दीजिए और फिर सरकार का नियंत्रण हटा लीजिए. इस तरह से यह सरकारी कॉर्पोरेशन, जनता के हित में काम करते हुए जनता के पास होंगे न कि सरकार के पास."

बैंकों के निजीकरण पर आरबीआई के पूर्व डिप्टी गवर्नर एसएस मूंदड़ा ने समाचार चैनल सीएनबीसी-टीवी18 से कहा था कि हर बीमारी का हल निजीकरण ही है यह भी नहीं मान लिया जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, "हम बहुत से उदाहरण देख चुके हैं और मैं मानता हूं कि कोई भी अभी यह निष्कर्ष निकाल पाने में सक्षम नहीं है कि यही एक तरीक़ा है." मूंदड़ा कहते हैं कि ऐसे बहुत से उदाहरण हैं जहां पर कामकाज को स्वामित्व से अलग किया गया है.

"यह एक अच्छा मॉडल हो सकता है. यहाँ दो मुद्दे और हैं, एक है कामकाज की स्वतंत्रता और दूसरा पूंजी. अगर विकास के अवसर हैं और पूंजी बढ़ती है तो वहाँ पर बहुत सी सीमाएं भी होंगी क्योंकि विभिन्न क्षेत्र भी इस पर दावा करेंगे."

"अगर इसे कई चरणों में भी किया जाता है तो यह मददगार साबित होगा क्योंकि आपके पास स्वामित्व का आश्वासन होगा और पूंजी बढ़ाने की स्वतंत्रता होगी."

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