कर्नाटक: 'शौचालय से ज़्यादा शराब की दुकानें' पर महिलाओं के आंदोलन से बेख़बर सरकार

    • Author, मैत्रेयी बरूआ
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

कर्नाटक के रायचूर ज़िले का गणजली गाँव. इसी गाँव में 58 साल की सबम्मा (उपनाम नहीं लगातीं) अपने मायके का आंगन बुहार रही हैं.

लेकिन झाड़ू है कि बार-बार उनके हाथ से फिसल कर गिर जाती है. हर बार जब भी वह झाड़ू उठाती हैं, उनकी नज़र अपने हाथ की कट चुकी बीच की उंगली पर चली जाती है. वह कुछ देर के लिए इसे देखती हैं और फिर झाड़ू लगाने लगती हैं.

सबम्मा इस कटी उंगली को देख कर अपनी ज़िंदगी के बीते दिनों में चली जाती हैं. अपना दाहिना हाथ दिखाते हुए वह कहती हैं, "लगभग 30 साल हो गए. मेरे पति ग़ुस्से से पागल हो उठे थे और जैसे मुर्गे को काटते हैं वैसे ही उन्होंने मेरी उंगली एक ही झटके में काट दी थी."

उंगली का घाव भर चुका है. उस जगह पर अब ठूंठ रह गया है. यह अब उनके पति की प्रताड़नाओं की याद दिलाता है, जिन्हें सहते हुए सबम्मा ने वर्षों गुज़ार दिए. उनके पति हनुमंता की मौत तीन दशक पहले हो गई थी, सबम्मा की इकलौती संतान के तौर पर पैदा हुई बेटी भी नहीं रही. पैदा होते ही मर गई.

खेत में मज़दूरी करने वाली सबम्मा कहती हैं, "मेरे पति शराबी थे. हर दिन शराब पीकर मुझे पीटते थे. हमारे पास तीन एकड़ जमीन थी लेकिन शराब की वजह से सारी बिक गई. उनकी मौत के बाद मेरे सास-ससुर ने मुझे मायके भेज दिया."

शराब ने मायके में भी उनका पीछा नहीं छोड़ा. यहाँ भी उन्हें यह परेशान कर रही है. वह कहती हैं, "मेरा भाई भी शराबी है. उसे अपनी पत्नी और बच्चों से कोई मतलब नहीं है. पिछले कई साल से हम क़र्ज़ लेकर काम चला रहे है. अब यह लगभग तीन लाख रुपये हो चुका है. शराब ने हमारा सब कुछ बर्बाद कर दिया है."

विरोध ही रास्ता है

सबम्मा की ज़िंदगी को शराब ने जिस क़दर तहस-नहस कर डाला, उसने उन्हें कर्नाटक में चल रहे शराब विरोधी आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया. राज्य में छह साल पहले महिलाओं की अगुआई में शराबबंदी का यह आंदोलन शुरू हुआ था.

शराब के ख़िलाफ़ महिलाओं के इस आंदोलन की तुलना अब दिल्ली बॉर्डर पर केंद्र के तीन कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ चल रहे किसानों के आंदोलन से की जा रही है. किसानों के आंदोलन ने 100 दिन पूरे कर लिए हैं. लगभग सात महीने पहले इसकी शुरुआत हुई थी.

वहीं शराब के ख़िलाफ़ महिलाओं के इस आंदोलन को वर्षों हो चुके हैं. यहाँ की महिलाएं भी अब इस आंदोलन को आगे कई और वर्षों तक चलाने के लिए कमर कस चुकी हैं. वह सरकार को अपनी बात सुना कर ही दम लेना चाहती हैं.

आशा और निराशा

छह साल काफ़ी लंबा अर्सा होता है. लेकिन सबम्मा के अंदर उम्मीद बरकरार है. उन्हें लगता है कि चीज़ें बदलेंगी क्योंकि शराबबंदी आंदोलन ने फिर ज़ोर पकड़ना शुरू कर दिया है.

11 फ़रवरी से ही कर्नाटक के 21 ज़िलों की सैकड़ों महिलाओं ने अब रायचूर में हर रोज धरना देना शुरू कर दिया है. ये महिलाएं राज्य में शराब की ग़ैरक़ानूनी बिक्री पर रोक लगाने की मांग कर रही हैं. 58 साल की सबम्मा आंदोलन के सिलसिले में रायचूर में ही थीं लेकिन फ़िलहाल अपने घर लौट आई हैं.

30 साल की राधा ( ये भी अपना उपनाम नहीं लिखतीं) रायचूर में महात्मा गांधी की मूर्ति के सामने धरने पर बैठी महिलाओं की ओर अपना हाथ दिखाती हुई कहती हैं, "यह हमारे लिए करो या मरो की स्थिति है. यहाँ जितनी भी महिलाएं बैठी हैं, सब शराब की मारी हुई हैं. शराब की लत ने किसी से उनका पति छीन लिया तो किसी ने अपने बच्चों को खोया है."

वह कहती हैं, "बीजेपी सरकार को हमारी मांगें सुननी ही होंगी. वरना हमारा यह आंदोलन जारी रहेगा." रायचूर ज़िले के जागीर वेंकटपुर गाँव की रहने वाली राधा लगभग हर दिन इस आंदोलन शामिल होने के लिए यहां आती हैं. वह पिछले चार साल से इस मद्ध निषेध आंदोलन से जुड़ी हैं.

राधा सबम्मा की बेटी की तरह हैं और शराब के दुष्प्रभावों के बारे में दोनों का अनुभव लगभग एक जैसा है. राधा भी घरेलू हिंसा की शिकार रही हैं. वर्षों तक उन्होंने इसका दर्द झेला है.

वह बताती हैं, "हमने प्रेम विवाह किया था. मेरे पति भीमारैया एक प्राइवेट कंपनी में 15 रुपये के वेतन पर नौकरी करते थे. हमारे गाँव में आसानी से शराब मिल जाती थी. मेरे पति को इसकी लत लग गई. उन्होंने नौकरी छोड़ दी. उनको लकवा मार गया. रोते हुए राधा कहती हैं, "अगर मैं शराब के लिए पैसे न दूं तो वह मुझे पीटते हैं."

राधा अब महिलाओं के एक को-ऑपरेटिव बैंक में काम करती हैं. हर महीने उन्हें 4000 रुपये वेतन मिलता है. राधा के दोनों बेटे स्कूल जाते हैं. बड़ा बेटा अब अपनी पढ़ाई का खर्च निकालने के लिए छोटा-मोटा काम करने लगा है.

रायचूर के धरने में शामिल होने आईं 40 साल की येलम्मा कहती हैं, "सरकार अपनी कमाई के लिए बड़े पैमाने पर शराब की बिक्री को बढ़ावा दे रही है. शराब की दुकानें कुकुरमुत्ते की तरह हर जगह खुल गई हैं. शराब लोगों को मार रही है और परिवारों को तहस-नहस कर रही है. क्या सरकार अंधी है? उसे ये त्रासदियां नहीं दिखतीं?''

अमीनगाड़ा गाँव की येलम्मा देवदासी हैं. उन्होंने अब तक की ज़िंदगी में संघर्ष ही देखा है. देवदासी एक धार्मिक परंपरा है, जिसके तहत लड़कियां या तो भगवान को समर्पित कर दी जाती हैं या उनसे ब्याह दी जाती हैं."

कर्नाटक ने 1982 में देवदासी (समर्पण निषेध) क़ानून लाकर इस चलन पर प्रतिबंध लगा दिया था. इसके बावजूद राज्य के कुछ हिस्सों में अब भी यह परंपरा बरकरार है.

येलम्मा कहती हैं, "मैं अनुसूचित जाति की महिला हूँ. सामाजिक परंपरा की वजह से मुझे देवदासी बनने के लिए मजबूर किया गया. मेरी ज़िंदगी बर्बाद हो गई. मेरे दो बच्चे हैं. छोटे बेटे को शराब की लत लग गई है. मैं सरकार से इंसाफ़ मांगती हूँ. 2015 में शराब विरोधी आंदोलन की शुरुआत के साथ ही येलम्मा इससे जुड़ गई थीं. इस आंदोलन में शामिल होने वाली शुरुआती महिलाओं में वह भी थीं.

इस आंदोलन ने अक्टूबर,2015 को शराबबंदी के ख़िलाफ़ महिलाओं का पहला बड़ा जुटान देखा. रायचूर में 30 अक्टूबर (2015) को इस आंदोलन में शामिल होने के लिए लगभग 46 हज़ार महिलाएं मैदान में उतर पड़ीं.

इस तरह ज़ोर पकड़ने लगा महिलाओं का यह आंदोलन

पिछले छह साल के दौरान शराबबंदी की मांग कर रही महिलाओं ने शासन को अपनी आवाज़ सुनाने के लिए सब कुछ किया. उन्होंने एक लंबी और कठिन पदयात्रा की ( लगभग 4000 महिलाओं ने 2019 में चित्रदुर्ग से बेंगलुरू तक की यात्रा की.

इस दौरान उन्होंने 12 दिनों में लगभग 210 किलोमीटर की दूरी नापी.) . 2018 में रायचूर में 20 फ़रवरी से एक मई तक 71 दिनों का लंबा विरोध प्रदर्शन किया. पिछले साल ( 2020) जल आंदोलन के तहत कृष्णा नदी में गले तक पानी में खड़े होकर विरोध जताया.

पिछले साल कर्नाटक हाई कोर्ट ने कहा कि सरकार राज्य में अवैध शराब के माफिया के ख़िलाफ़ कड़ी कार्रवाई करे. कोर्ट ने यह निर्देश शराब विरोधी आंदोलन की ओर से दायर एक जनहित याचिका पर फ़ैसला सुनाते हुए दिया था.

छह साल, तीन सरकारें, एक मांग

पिछले छह वर्षों के दौरान कर्नाटक में तीनों प्रमुख राजनीतिक दलों यानी कांग्रेस, जनता दल (सेक्युलर) और मौजूदा बीजेपी सरकारें चला चुकी हैं. इस दौरान महिलाओं का शराबबंदी आंदोलन चलता रहा. उनकी एक ही मांग है- शराब बंद करो, परिवारों को बचाओ.

ज़मीनी हक़ीक़त

महिलाओं के इस आंदोलन को राह दिखा रहे ग्रामीण कामगारों के संगठन ग्रामीण कुली कर्मीकारा संघटने के स्टेट को-ऑर्डिनेटर अभय कुमार कहते हैं, "कुछ भी नहीं बदला है. उल्टे हालात और ख़राब हुए हैं. शराब की बिक्री पिछले कुछ वर्षों में कई गुना बढ़ी है. अंधाधुंध बिकने वाली शराब में ज़्यादातर अवैध है.

सरकार के लिए मोटे मुनाफ़े का धंधा?

कर्नाटक के लोगों के लिए अवैध शराब कोई नई आफ़त नहीं है. लेकिन 2008 से 2013 के बीच बीजेपी सरकार के दौरान हालात बदतर हो गए. राज्य के उत्पाद शुल्क मंत्रालय ने शराब दुकानों को बिक्री बढ़ाने के लिए कहा ताकि राज्य के रेवेन्यू में इजाफा हो.

शराबबंदी आंदोलन चला रहे कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस नए निर्देश से शराब के ठेकों को अपना लाइसेंस रद्द होने का डर सताने लगा. अब वे परचून की छोटी दुकानों और पान गुमटियों को अपनी शराब देने लगे. गाँव-शहर, हर जगह इन ठिकानों पर आसानी से शराब उपलब्ध है.

कुमार कहते हैं, "सरकार के समर्थन और सरपरस्ती से इन छोटी दुकानों पर बगैर किसी लाइसेंस के शराब बिकने लगी. शराब की इस तरह खुली बिक्री से ये आसानी से हर जगह उपलब्ध हो गई. यहाँ तक कि बच्चों तक भी इनकी पहुँच हो गई."

महिला अधिकार आंदोलनकारी स्वर्णा भट्ट कहती हैं, "शराब अब कर्नाटक का नया पानी है. अवैध शराब की जबर्दस्त बिक्री हो रही है और इस पर लगाम लगने की कोई सूरत नहीं दिख रही है. "

रायचूर में चल रहे आंदोलन में शामिल होने आईं दुर्गाम्मा अपना रोष जाहिर करते हुए कहती हैं, " हर गांव में अब शराब की दुकान हैं. अब तो स्थिति यह हो गई है कि गाँवों में शौचालय से ज्यादा शराब की दुकानें खुल गई हैं. खुलेआम शराब की बिक्री से लोग इसकी लत के शिकार होते जा रहे हैं. यहाँ तक कि आठ-आठ साल के छोटे बच्चे भी बीयर पीने के आदी हो गए हैं."

सरकार का नज़रअंदाज करने का रवैया

सरकार इस आरोप से इनकार करती रही है कि कर्नाटक में अवैध शराब बिक रही है. कर्नाटक के एडिशनल एक्साइज कमिश्नर एसएल राजेंद्र प्रसाद ने बीबीसी से कहा, "शराब की अवैध दुकानें आपको कहां दिख रही हैं? राज्य में बिकने वाली एक-एक बूंद शराब का हिसाब रखा जाता है. इसकी बिक्री यहां पूरी तरह क़ानूनी तरीक़े से हो रही है."

प्रसाद कहते हैं, "हम शराब बेचने वाले अवैध ठेकों पर छापे मारते हैं और जो लोग इस धंधे में लगे होते हैं उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाता है."

अधिकारियों के मुताबिक़ राज्य के आबकारी विभाग ने जुलाई से दिसंबर, 2020 के बीच इस तरह के 37,950 छापे मारे थे. इनके तहत 19,406 लोगों के ख़िलाफ़ केस दर्ज किए गए हैं. कुल 12,239 लोगों को गिरफ्तार किए गए. अवैध शराब ले जाने वाली 928 गाड़ियों को ज़ब्त किया गया.

जब उनसे शराब की अवैध दुकानों के ख़िलाफ़ हज़ारों महिलाओं के आंदोलन के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि वे इन महिलाओं से नहीं मिले हैं और इस बारे में कुछ नहीं बता सकते.

लेकिन राज्य के आबकारी विभाग के पूर्व अधिकारी और अब शराबबंदी कार्यकर्ता और राजनीतिक नेता एस एच लिंगेगौड़ा ने प्रसाद की बात का खंडन करते हुए कहा, "आप किसी भी गाँव, शहर या नगर में चले जाइए, आपको शराब की अवैध दुकानें हर जगह दिख जाएंगीं. रेवेन्यू बढ़ाने के चक्कर कर्नाटक में एक के बाद एक सभी सरकारों ने शराब को पानी की तरह आसानी से उपलब्ध करा दिया."

एक पूर्व नौकरशाह होने के नाते लिंगगौड़ा जानते हैं कि शराब की यह पूरी सप्लाई किस तरह राजनीतिक दलों के नियंत्रण में है.

वह कहते हैं, "अगर सरकार चाहे तो आसानी से शराब पर बैन लगा कर लोगों की ज़िंदगी और उनके परिवारों को बचा सकती है."

अपनी बढ़िया नौकरी छोड़ने से पहले लिंगेगौड़ा शराब के ख़िलाफ़ जागरूकता फैलाने के लिए 2016 में बीदर जिले के बासवाकल्याण से बेंगलुरु तक की यात्रा कर चुके थे.

लिंगेगौड़ा ने राज्य में शराब की अंधाधुंध बिक्री की ओर ध्यान दिलाते हुए कहा कि मद्दुर ( लिंगेगौड़ा का गृह शहर) में लगभग 60 फ़ीसदी परिवारों को शराब की लत लग चुकी है. हर महीने इन परिवारों में लोग 3000 से 4000 रुपये तक शराब पर खर्च कर देते हैं. राज्य में लोगों की ग़रीबी की जो हालत है उसे देखते हुए यह बहुत बड़ी रक़म है. कर्नाटक राष्ट्र समिति के उपाध्यक्ष लिंगेगौड़ा कहते हैं, "शराब से मद्दुर में मौतें हो रही हैं. लोग अवसाद और शारीरिक बीमारियों के शिकार हो रहे हैं."

क्या शराब की बिक्री से राजस्व बढ़ा है?

आधिकारिक आँकड़ों के मुताबिक़ कर्नाटक ने शराब की बिक्री पर आबकारी शुल्क से 2018-19 में 19,750 करोड़ रुपये कमाए. 2019-20 में यह कमाई बढ़ कर 20,950 करोड़ रुपये पर पहुंच गई.

फ़रवरी में कर्नाटक के आबकारी शुल्क मंत्री के. गोपालय्या ने कहा कि पिछले साल की तुलना में वित्त वर्ष 2020-21 में शराब की बिक्री में कमी आई है. हालांकि विभाग की कमाई वित्त वर्ष 2019-20 की तुलना में 610 करोड़ रुपए बढ़ गई है. आबकारी शुल्क में इजाफे की वजह से यह कमाई बढ़ी है.

मुनाफ़ा बनाम पाबंदी

कर्नाटक में पूरी तरह शराबबंदी के लिए शराब विरोधी आंदोलन के कार्यकर्ता एक लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं. भट्ट कहती हैं, "सरकार शराबबंदी की शुरुआत इसकी अवैध दुकानों को बंद करके कर सकती है. इससे शराब आसानी से मिलनी बंद हो जाएगी.''

कुमार कहते हैं, "सरकार के अंदर यह ग़लत धारणा है कि शराब रेवेन्यू का मुख्य स्त्रोत है. दरअसल, शराब पर पाबंदी लगा कर सरकार ज़्यादा कमा सकती है. "

कुमार के इस दावे का आधार शराबबंदी के अर्थशास्त्र पर तैयार की गई एक ड्राफ्ट रिपोर्ट है. इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ बेंगलुरु (IIMB) ने 2019 में यह रिपोर्ट तैयार की थी.

इस रिपोर्ट में गुजरात, बिहार और कर्नाटक के जीएसडीपी का तुलनात्मक अध्ययन किया गया है. गुजरात में 1960 के दशक से ही शराबबंदी लागू है. वहीं बिहार में 2016 में शराबबंदी लागू की गई थी. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि 2012 से 2018 के बीच इन तीनों राज्यों की जीएसडीपी बढ़ी है.

गुजरात की जीएसडीपी 2012 में छह लाख करोड़ रुपये थी, जो 2018 में बढ़ कर ग्यारह लाख करोड़ रुपये हो गई. वहीं कर्नाटक का जीएसडीपी भी 2012 में छह लाख करोड़ रुपये थी जो 2018 में बढ़ कर नौ लाख करोड़ रुपये हो गई. बिहार की जीएसडीपी 2012 में ढाई लाख करोड़ रुपये थी जो 2018 में बढ़ कर तीन लाख करोड़ रुपये (अनुमानित) हो गई.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) ने 2006 में शराब के असर पर " Burden and socio-economic impact of alcohol—The Bangalore Study" नाम से एक अध्ययन कराई थी. इसमें कहा गया है " भारत सरकार शराब के इस्तेमाल से होने वाला असर को मिटाने क लिए 244 अरब रुपये खर्च करती है, जबकि उसे शराब पर आबकारी शुल्क से 216 अरब रुपये मिलते हैं. "

कुमार कहते हैं, "दोनों अध्ययनों (आईआईएम और डब्ल्यूएचओ के अध्ययन) ने साबित कर दिया है, किसी राज्य की आर्थिक तरक्की का शराब की बिक्री से होने वाली कमाई से कोई लेनादेना नहीं है. सरकार की शराब की बिक्री से ज्यादा पैसा इससे पैदा होने वाली दिक्कतों खत्म करने पर खर्च हो जाता है. "

फ़ायदे से ज़्यादा घाटा

इन आंकड़ों से यह साफ है कि शराब की राज्य में शराब की आसान उपलब्धता किस तरह लोगों की जिंदगियों और उनके परिवारों को तबाह कर रही है.

नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (NCRB) की भारत में दुर्घटनाओं से मौत और आत्महत्याओं से जुड़ी रिपोर्ट 'Accidental Deaths and Suicides in India 2019' में कहा गया है कि कर्नाटक में शराब पीने से मौतें बढ़ी हैं. 2018 में ऐसी मौतों की संख्या 218 थी वहीं 2019 में ये बढ़ कर 268 हो गईं. शराब पीने से होने वाली मौतों के मामले में कर्नाटक सबसे ऊपर है.

आईआईएम-बी की 2019 की रिपोर्ट में कहा गया है, " कर्नाटक में शराब पीने से होने वाली मौतें घट नहीं रही हैं. राज्य जन-स्वास्थ्य के बड़े संकट और सोशल इमरजेंसी के मुहाने पर खड़ा है." 2006 में डब्ल्यूएचओ ने जो स्टडी कराई थी उसके मुताबिक राज्य में हर दिन 30 फीसदी पुरुष और एक फीसदी महिलाएं शराब पीती हैं.

क्या प्रतिबंध से लत नहीं मिटेगी?

शराबबंदी पर बहस बड़ी पुरानी है. बेंगुलरू में रहने वाले साइकोलॉजिस्ट, रिसर्चर और विहेवियरल एक्सपर्ट श्रीधर का मानना है कि शराबबंदी या प्रतिबंध कारगर नहीं होगा. इससे शराब के आदी लोग ज्यादा खतरनाक नशे की ओर बढ़ेंगे.

वह कहते हैं, " यह राजनीतिक मुद्दा है. अफसोस कि सरकार इस समस्या से बेपरवाह है. हमें अपने नागरिकों को शराब के दुष्प्रभावों के बारे में समझाना होगा. उन्हें जागरुक करना होगा. इसके अलावा और कोई उपाय नहीं है. "

सरकार के बेपरवाह रवैये के खिलाफ खड़ी हैं महिलाएं

पिछले कई सालों से मद्ध निषेध आंदोलन में शामिल महिलाओं को अब तक 40 सिविल सोसाइटी ग्रुप का समर्थन हासिल हो चुका है. इस हौसला अफजाई और एकता ने आंदोलन को इतने लंबे समय तक चलाए रखने में मदद दी है.

स्वराज अभियान के जनरल सेक्रेट्री (कर्नाटक) मनोहर इलावर्ती ने कहा, "कोई भी सामाजिक आंदोलन तभी लंबा चल सकता है जब उसके पास समर्थन का मजबूत आधर हो. वरना यह धीरे-धीरे सिमट जाएगा. ये महिलाएं एक बड़े सवाल को लेकर आंदोलन कर रही हैं. हमारा समर्थन इनके साथ है. "

आंदोलनकारी महिलाएं इस बात से पूरी तरह सहमत हैं. दुर्गाम्मा कहती हैं, "हम ग़रीब हैं लेकिन डटे हुए हैं. जब तक हमारी मांगें पूरी नहीं हो जातीं तब तक हमें समर्थन की ज़रूरत पड़ती रहेगी. "

कर्नाटक के कोने-कोने से हर दिन 500 से 600 महिलाएं बसों और ट्रैक्टर से रायचूर के इस आंदोलन स्थल पर पहुंच रही हैं. हर प्रदर्शनकारी के भीतर एक ही भावना है- हम अंत तक लड़ेंगे. इनमें से अधिकतर ने अपने प्रियजनों की मौत देखी है. टूटते-बिखरते घर देखे हैं और देखे हैं मिटते रोजगार.

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