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बीजेपी की बढ़त से क्या राज्यसभा में क्षेत्रीय दलों की भूमिका बेअसर हो जाएगी?
- Author, अनिल जैन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
संसद के निचले सदन लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) को अपने दम पर बहुमत हासिल है लेकिन ऊपरी सदन में बीजेपी की स्थिति ऐसी नही रही है. बात बीजेपी की ही नहीं है, पिछले तीस सालों से किसी भी दल का राज्यसभा मे बहुमत नहीं रहा है.
बीजेपी के लिए यह स्थिति अड़चनें पैदा करती हैं, क्योंकि किसी भी विवादास्पद कानून को पारित कराने के लिए उसकी दूसरे दलों पर निर्भरता बनी रहती है. इस स्थिति से उबरने के लिए पार्टी जल्द से जल्द दूर करके ऊपरी सदन में भी बहुमत हासिल करना चाहती है और इस दिशा में वह तेज़ी से आगे भी बढ़ रही है.
इस समय उसके पास 245 के सदस्यों वाले इस सदन में बहुमत के आंकडे से 29 सीटें कम हैं. उसके गठबंधन के घटक दलों में ऑल इंडिया अन्ना द्रमुक के 9, जनता दल यू के 5 और असम गण परिषद तथा रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया की 1-1 सदस्य हैं. इस प्रकार उसका गठबंधन यानी एनडीए भी बहुमत के आंकड़े से 13 सीटें दूर है.
इस सदन की 7 सीटें अलग-अलग वजहों से फिलहाल रिक्त हैं. आने वाले महीनों में कुछ हद तक, और उसके बाद अगले साल उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य के विधानसभा चुनाव के बाद तस्वीर और साफ़ होगी कि बीजेपी अपने दम पर राज्यसभा में भी बहुमत हासिल कर सकेगी या नहीं.
फिलहाल संसद के ऊपरी सदन में बीजेपी की ताकत लगातार बढ़ रही है. पिछले तीन महीने में उसके संख्या बल मे दो सीटों का इजाफा हुआ है, जिससे राज्यसभा में उसके सदस्यों की संख्या 92 से बढ़कर 95 हो गई है. दूसरी ओर इस सदन में करीब चार दशक तक लगातार बहुमत में रही कांग्रेस की सदस्य संख्या लगातार घटते-घटते अब महज 36 रह गई है.
भाजपा सांसदों की संख्या
तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, जम्मू-कश्मीर और दिल्ली के साथ ही अरुणाचल प्रदेश मणिपुर, नगालैंड, मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा, सिक्किम, गोवा आदि एक-एक सीटों वाले राज्यों से तो राज्यसभा में अब उसकी नुमाइंदगी ही खत्म हो गई है.
245 सदस्यों के ऊपरी सदन में बीजेपी और कांग्रेस के अलावा सिर्फ तृणमूल कांग्रेस ही एकमात्र ऐसी पार्टी है, जिसकी सदस्य संख्या इस सदन में दहाई के अंकों में है. तृणमूल कांग्रेस के 12 सदस्य हैं. हालांकि बीजेपी ही नहीं, उसके नेतृत्व वाला एनडीए गठबंधन भी अभी बहुमत से बहुत दूर है.
लेकिन संभावना है कि भाजपा के अपने सांसदों की संख्या जल्द ही 100 तक पहुंच जाएगी. उसका 100 के आंकड़े को छूना उसके खुद के लिए तो एक बडी उपलब्धि होगी ही, देश की संसदीय राजनीति की भी यह एक बड़ी घटना होगी क्योंकि हाल के वर्षों में किसी भी पार्टी के पास राज्यसभा में 100 सांसद नहीं रहे हैं.
यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि कई विवादास्पद क़ानूनों को पास कराने में बीजेपी को उस तरह के अवरोधों का सामना नहीं करना पड़ेगा? जैसा अभी करना पड़ता है. कुछ मामलों में तो एनडीए के घटक दलों के समर्थन को लेकर भी संदेह की स्थिति बन जाती है. असल में भाजपा पिछले दो साल से राज्यसभा में अपना संख्या बल बढ़ाने में जुटी है.
कई विपक्षी दलों के राज्यसभा सदस्यों ने पाला बदलते हुए इस्तीफ़े दिए और वे बीजेपी की तरफ से राज्यसभा में भेजे गए. इसके अलावा राज्यसभा चुनाव के मौके पर कई राज्यों में विपक्षी दलों के विधायकों ने विधानसभा से इस्तीफ़े दिए, जिसकी वजह से बीजेपी अपने ज्यादा-से-ज्यादा उम्मीदवारों की जीत सुनिश्चित कर सकी.
अहमद पटेल और रामविलास पासवान की सीटें
अभी दो सीटों का फायदा उसे संयोग से हो गया है. कांग्रेस के दिग्गज नेता अहमद पटेल और भाजपा की सहयोगी लोक जनशक्ति पार्टी के संस्थापक रामविलास पासवान के निधन से खाली हुई सीटें भाजपा को मिल गई हैं. गौरतलब है कि चार साल पहले 2017 में अहमद पटेल ने बेहद कश्मकश भरे मुकाबले में राज्यसभा का चुनाव जीता था.
गुजरात में कांग्रेस के कई विधायकों के टूटने के बाद पार्टी के बाकी विधायकों को कर्नाटक मे रखा गया था और उसके बाद किसी तरह अहमद पटेल जीत पाए थे. गुजरात से ही भाजपा के एक सांसद अभय भारद्बाज का भी कुछ समय पहले कोरोना से निधन हो गया था.
इन दोनों सीटों के लिए हुए उपचुनाव मे भाजपा के दो नेता- दिवेशचंद्र जेमलभाई अननवाडिया और रामभाई हरिजीभाई मोकारिया निर्विरोध जीत गए. यहां भाजपा को एक सीट का फायदा हुआ. बीजेपी को दूसरी सीट का फायदा बिहार में हुआ.
चूंकि रामविलास पासवान भाजपा के कोटे से ही राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए थे, लिहाजा उनके निधन से खाली हुई सीट भाजपा को ही मिलना थी. पासवान के निधन से खाली हुई सीट पर हुए उपचुनाव में पार्टी ने बिहार के अपने वरिष्ठ नेता सुशील कुमार मोदी को राज्यसभा मे भेजा.
यहाँ एक बारीक़ लेकिन ज़रूरी अंतर है. रामविलास पासवान बीजेपी के नेतृत्व वाले गठबंधन के सांसद थे लेकिन अब यह सीट गठबंधन के घटक दल की नहीं रही, बल्कि बीजेपी की हो गई है.
इस्तीफ़ा और दोबारा चुने जाने की रणनीति
इससे पहले बीजेपी के संख्या बल को मज़बूत करने की रणनीति के तहत कांग्रेस और समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सदस्यों ने इस्तीफ़े दिए और फिर बीजेपी के टिकट पर उन्हें ऊपरी सदन में भेजा गया. असम में भुवनेश्वर कलिता से लेकर उत्तर प्रदेश में नीरज शेखर तक कई सांसदों के मामले में यह रास्ता अपनाया गया.
मध्य प्रदेश और गुजरात में बड़ी संख्या में कांग्रेस विधायकों के विधानसभा से इस्तीफा दे देने के कारण दोनों राज्यों में भाजपा को राज्यसभा की एक-एक अतिरिक्त सीट मिली. इस सिलसिले मे उस पर विधायको की खरीद-फरोख्त का आरोप भी लगा था.
इस्तीफा देने वाले कांग्रेस के ज्यादातर विधायक बाद मे बीजेपी के टिकट पर उपचुनाव लड़े और जीतकर फिर से विधानसभा मे पहुंच गए. राजस्थान में भी कांग्रेस के विधायकों को तोड़ने की कोशिशें हुई थीं, लेकिन वे अंजाम तक नहीं पहुंच सकीं.
अन्यथा वहां भी बीजेपी को न सिर्फ राज्यसभा की एक अतिरिक्त सीट मिलती बल्कि वहां मध्य प्रदेश की कांग्रेस की सरकार के गिरने की नौबत भी आ जाती. ऊपरी सदन मे अपनी ताकत बढ़ाने के लिए आंध्र प्रदेश मे बीजेपी ने अपनी पुरानी सहयोगी रही तेलुगू देशम पार्टी में भी तोड़-फोड़ करने से संकोच नही किया.
उसने राज्यसभा में तेलुगू देशम के पांच में से चार सदस्यों को अपनी पार्टी मे शामिल करा लिया था. इस तरह भाजपा ने ऊपरी सदन में अपनी ताकत लगातार बढ़ाई.
आगे सब कुछ विधानसभा चुनावों पर निर्भर
अब आगे राज्यसभा में बीजेपी की ताकत बढ़ती है या घटनी शुरू हो जाती है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि पाँच राज्यों में हो रहे विधानसभा चुनाव में और अगले साल होने वाले उत्तर प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के विधानसभा चुनावों में भाजपा का प्रदर्शन कैसा रहता है.
गौरतलब है कि बीजेपी को राज्यसभा में सबसे ज्यादा सीटों का फायदा उत्तर प्रदेश से ही हुआ है. जहां तक राज्यसभा में बहुमत का सवाल है, पिछले तीन दशक से इस सदन में यह स्थिति रही है कि सरकार भले ही किसी की भी हो, लेकिन इस सदन में उसका बहुमत नहीं रहा है.
वर्ष 1990 के पहले तक इस सदन में कांग्रेस का बहुमत होता था, क्योंकि अधिकांश राज्यों में उसकी सरकारें थीं. लेकिन 1990 से स्थिति बिल्कुल बदल गई. उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात जैसे बड़े राज्य कांग्रेस के हाथ से निकल गए, जहां वह अभी तक वापसी नहीं कर पाई है.
महाराष्ट्र में भी उसके जनाधार मे लगातार गिरावट आने से विधानसभा में उसके संख्या बल में कमी आती गई है. दक्षिण भारत में आंध्र प्रदेश और तेलंगाना भी कांग्रेस के हाथ से पूरी तरह निकल चुके हैं, जबकि कर्नाटक विधानसभा में भी उसके संख्या बल में लगातार कमी आ रही है.
तमिलनाडु में भी वह पिछले कई दशकों से हाशिए पर है. वहां से कभी-कभार उसका एकाध सदस्य राज्यसभा में पहुंचता भी तो वहां की क्षेत्रीय पार्टियों की मदद से ही. केरल में भी उसकी सीटें घटती-बढ़ती रहती हैं.
आम सहमति की राजनीति
पूर्वोत्तर के राज्यों और ओडिशा में भी कांग्रेस का जनाधार क्षीण हुआ है, जिससे वहां की विधानसभा में उसकी मौजूदगी काफी सिमट गई. इसी वजह से इन राज्यों से भी कांग्रेस का प्रतिनिधित्व राज्यसभा में घटा है.
दूसरी ओर, इन तीन दशकों के दौरान के दौरान बीजेपी भी ज्यादातर राज्यों में अपना जनाधार स्थिर नहीं रख पाई, जिसकी वजह से विधानसभाओं में उसका संख्या बल घटता-बढता रहा है. यही वजह रही कि 1989 से लेकर आज तक सभी सरकारों को राज्यसभा में महत्वपूर्ण विधेयकों को पारित कराने के लिए छोटे-छोटे दलों को साधना पड़ा है या विपक्षी दलों के साथ मिलकर जैसे-तैसे आम सहमति बनानी पड़ी है.
मौजूदा भाजपा सरकार को भी संविधान के अनुच्छेद 370 में संशोधन, जम्मू-कश्मीर का विभाजन, तीन तलाक को दंडनीय अपराध बनाने, नागरिकता कानून में संशोधन, श्रम कानून, कृषि आदि से संबंधित कई विवादास्पद विधेयकों को पारित कराने के लिए बीजू जनता दल, तेलंगाना राष्ट्र समिति और वाईएसआर कांग्रेस जैसे क्षेत्रीय दलों की मदद लेनी पड़ी है.
लेकिन इस स्थिति से अब बीजेपी की सरकार धीरे-धीरे उबर रही है. उसकी इस स्थिति का सकारात्मक पहलू यह है कि अब छोटे-छोटे क्षेत्रीय दलों या निर्दलीय सांसदों की समर्थन के बदले सरकार से मोलभाव करने की स्थिति खत्म हो रही है.
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