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दिल्ली दंगाः एक साल पहले सबकुछ खो चुके भूरे ख़ान की अब कैसी है ज़िंदगी
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
बीबीसी से मिलते ही जैसे 24 फ़रवरी, 2020 का दिन एक बार फिर भूरे ख़ान की आँखों के सामने घूम गया, भूरे ख़ान के लब थरथराने लगे, आँसू आँखों की दहलीज़ पर आकर ढलकने को ही थे, कि उन्होंने ख़ुद को संभाल लिया, बमुश्किल.
24 फ़रवरी, 2020, जब दंगाइयों ने भूरे ख़ान की दुकान के सामने खड़ी कार, दुकान और घर में आग लगा दी थी, तो उन्हें और उनके परिवार को जान बचाने के लिए जलते घर की छत से कूदकर जान बचानी पड़ी थी.
साल भर पहले उनकी ज़िंदगी के उस 'दर्दनाक दिन' के ठीक दूसरे रोज़ ही हमारी मुलाक़ात हुई थी, जब मैं चाँद पीर की फूँक दी गई मज़ार, सड़क पर कारों के बिखरे शीशों, जले हुए रिक्शों, स्कूटरों को पार करते, लोगों से बात करते-करते उन तक पहुँचा था और उन्होंने हादसे को भावनाओं की हिचकियों के बीच बयाँ किया था.
साल भर बाद हम फिर पहुँचे थे भूरे ख़ान से मिलने, और हमारा आमना-सामना हुआ और उनका दर्द एक बार फिर छलक आया.
"आपके जाने के बाद घर को देखकर रोते रहते थे, परिवार को तो कहीं किराये के एक कमरे में शिफ़्ट कर दिया था." भूरे ख़ान हादसे के बाद के दिनों को याद करते हुए हमें बताने लगे कि 'कई दिनों तक तो सकते के आलम में रहे कि ये क्या हो गया.'
बरक़रार हैं दंगों के निशान
''कुछ दिनों में संभले, तो फिर लॉकडाउन लग गया''. फिर भूरे ख़ान रुक जाते हैं - आँखों से निकलने की ज़िद कर रहे आँसुओं को थामने की जद्दोजहद में.
उनकी ख़ामोशी के बीच उनके घर के अब और पास से गुज़रनेवाली सड़क पर वाहनों का शोर और तेज़ सुनाई देने लगता है.
इलाक़े में मेट्रो का काम चल रहा है, राजधानी दिल्ली और देश के दूसरे हिस्सों में विकास की नई निशानी.
मनुष्य के सभ्य होने के दावों के हज़ारों साल बाद भी जब इंसान-इंसान को मार, काट, लूट रहा है, महिलाओं के शरीर नोचे जा रहे हैं, तो ईंट-गारे-सीमेंट-स्टील के इन स्तंभों को खड़ा कर मनुष्य ख़ुद को सांत्वना देता है कि नहीं, हम आगे बढ़ रहे हैं, तरक्क़ी कर रहे हैं.
चंद सड़कों से लगी गलियों-दर-गलियों और बड़े खुले नालों के किनारे बसे उत्तर-पूर्व दिल्ली में भी विकास पहुँच गया है, उसी इलाक़े में जहाँ साल भर पहले दंगाइयों की भीड़ ने 53 लोगों को मार डाला था. मरनेवालों में मुसलमान-हिंदू सभी थे. 85 साल की एक बुज़ुर्ग औरत भी, जिन्हें ज़िंदा जला दिया गया था.
हम उनके (भूरे ख़ान) घर पहली मंज़िल पर मौजूद घर के बरामदे में आमने-सामने रखी दो कुर्सियों पर बैठे हैं. पीछे ही वो सीढ़ी है, जिसके नीचे खड़े होकर उन्होंने साल भर पहले 25 फरवरी को हमें दंगों के बारे में बताया था. साथ ही उनकी पत्नी, बेटियाँ और ख़ालाज़ाद भाई भी खड़े थे. सब डरे सहमे से.
जहाँ हम बैठे हैं, उसके पास दंगों के निशान हर तरफ़ मौजूद हैं. दरवाज़े के पीछे कील पर लटकी हुई अधजली शर्ट, जले हुए सोफ़े, जिसके स्प्रिंग गद्दे जल जाने के बाद भीतर से सिर निकालकर झाँक रहे हैं, आगज़नी के बाद दीवार पर चिपके धुँओं के निशान.
भूरे ख़ान कहते हैं कि इन्हें साफ़ करवा पाने तक की हिम्मत नहीं है, और 'अब तो बस तमन्ना है किसी तरह से घर बन जाए.'
उनकी पीठ की तरफ़ जो दीवार है, उस पर एक फोटो फ्ऱेम लटक रहा है, बरसों पुरानी तस्वीर रंग बदलकर पीली दिखने लगी है, बताते हैं कि ये उनके दादा बुंदे ख़ान की है, जो फ़ौज में थे.
तालाबंदी के दौरान भूरे ख़ान के शब्दों में उन्होंने सब्ज़ी और फल के ठेले लगाए, इस बीच ईद आई और चली गई, अब ख़ैर लॉकडाउन के बाद फिर से दुकान खुल गई है और वो ज़िंदगी की ईंटों को फिर से जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.
वो कहते हैं, ''हमने कुछ (पैसे) जोड़ भी लिए हैं, कुछ चीज़े थीं मेरे पास सोने की. उनको बैंक में रखकर कुछ लोन लिया है,' भूरे ख़ान बार-बार डबडबा जाती आँखों के बीच रुक-रूक कर कहते हैं.
''सरकार ने जो भी (मुआवज़ा) ऐलान किया, उनका क्या पैमाना था, किस हिसाब से पैसा दिया, समझ में नहीं आया. हमारी दुकान जल गई, घर जल गया, हमें एक लाख 84 हज़ार दिया गया, उसमें से तो काफ़ी तालांबदी के दौरान ही खाने-पीने में निकल गया.''
सड़क के बिल्कुल किनारे चौराहे पर मौजूद दुकान-घर भूरे ख़ान की थी, लेकिन दोनों में आग लगाई गई और वो ख़ाक़ हो गईं. अब वो उसकी रजिस्ट्री की कापियाँ निकालने की कोशिश में हैं. मुआवज़े का पैसा भूरे ख़ान के अकाउंट में आया है.
भूरे ख़ान क़ानूनी कार्रवाईयों को लेकर बताते हैं कि पुलिस आती रहती है, पूछती है कि क्या दंगाइयों को देखा था, मैं कहता हूँ, नहीं. उन्होंने हैलमेट पहन रखी थी, तो कैसे पहचान सकते थे.
वह बताते हैं कि पुलिस ने ख़ुद से ही एफ़आईआर दर्ज कर ली थी, एक स्थानीय पुलिस अधिकारी की ओर से, बाद में उन्होंने जो लिखित ब्यौरा दिया, उसे भी केस में शामिल कर लिया गया है.
'मुझे 1984 भी याद है'
भूरे ख़ान जब काफ़ी छोटे थे, तो उन्होंने 1984 में हुए दंगे भी देखे हैं. वह कहते हैं, ''लगभग 35 सालों में वो वाकया लगभग भूल सा गया है, लेकिन हमने सोचा नहीं था कि दिल्ली में ऐसा हो जाएगा, हमने तो सोचा था दिल्ली में शान से रहते हैं. पुलिस प्रशासन बहुत सख़्त है यहाँ.''
भारत की आज़ादी के बाद राजधानी में हुए दूसरे बड़े हिंदू-मुस्लिम दंगों में भी पुलिस की तरफ़ उसी तरह से उंगलियाँ उठी हैं, जैसी 1984 में उठी थी.
भूरे ख़ान के घर की तरह चाँद पीर के मज़ार में भी आग लगने के निशान यूँ ही मौजूद हैं. वो भी बनने के इंतज़ार में है. हाँ! चंद ईंटें जोड़ने की कोशिश ज़रूर दिखती है, लेकिन फिर लोगों को उसके पुनर्निमाण से रोक दिया गया है, ये कहते हुए कि बाद में होगा.
दिल्ली से 946 किलोमीटर दूर अहमदाबाद में, उर्दू शायर वाली दक्कनी की मज़ार भी गुजरात में हुए दंगो के दौरान तोड़ डाली गई थी और फिर बन न पाई.
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