क्या नरेंद्र मोदी स्टेडियम का नाम पहले सरदार पटेल स्टेडियम था?

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- Author, सरोज सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
किसी स्टेडियम में क्रिकेट मैच खेला जा रहा हो और चर्चा स्कोर और जीत-हार की बजाए स्टेडियम के नाम पर हो, ऐसा कम ही होता है. पर भारत में पिछले चौबीस घंटों से यही हो रहा है.
गुजरात के नरेंद्र मोदी स्टेडियम में भारत और इंग्लैंड का टेस्ट मैच चल रहा है और चर्चा स्कोरकार्ड और खिलाड़ियों के प्रदर्शन की नहीं बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम की हो रही है.
दरअसल गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन ने दुनिया के सबसे बड़े क्रिकेट स्टेडियम का नाम बदलकर नरेंद्र मोदी स्टेडियम कर दिया है. बुधवार को इसका ऐलान किया गया.
अब इसी को लेकर सोशल मीडिया से लेकर अख़बार और टीवी चैनल - सब जगह बहस शुरू हो गई है. बहस का मुद्दा क्रिकेटरों ने नहीं, राजनेताओं ने बनाया है. इसलिए ये खेल का मुद्दा कम और राजनीति का मुद्दा ज़्यादा बन गया है.
कांग्रेस का आरोप है कि पहले स्टेडियम का नाम सरदार पटेल स्टेडियम था. उसका नाम बदलकर नरेंद्र मोदी करना, सरदार वल्लभ भाई पटेल का अनादर करना है.
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कांग्रेस ने कहा, "पहले महात्मा गाँधी को खादी कैलेंडर से ग़ायब किया और अब मोटेरा स्टेडियम से सरदार पटेल को. जान लें, 'बापू' और 'सरदार' का नाम भाजपाई कभी नहीं मिटा सकते."
कांग्रेस के इन आरोपों का जवाब केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावडेकर ने दिया.
ट्विटर पर उन्होंने लिखा, "पूरे कॉम्प्लेक्स का नाम सरदार पटेल स्पोर्ट्स एंक्लेव है, केवल क्रिकेट स्टेडियम का नाम पीएम नरेंद्र मोदी के नाम पर रखा गया है. विडम्बना ये है कि जिस 'परिवार' ने सरदार पटेल के निधन के बाद भी उनका सम्मान नहीं किया, वो आज इस बात पर हंगामा मचा रहे हैं."
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स्टेडियम का नाम पहले क्या था?
स्टेडियम के नाम को लेकर जारी बहस के बीच ये जानना ज़रूरी है कि आख़िर वर्तमान में नरेंद्र मोदी स्टेडियम कहे जाने वाले स्टेडियम का असली नाम क्या था.
इसके लिए थोड़ा इतिहास में चलते हैं.
गुजरात के वरिष्ठ खेल पत्रकार तुषार त्रिवेदी से इस बारे में बीबीसी ने बात की. उनके मुताबिक, "1983 में इस स्टेडियम को बनाया गया था. तब इसका नाम 'गुजरात स्टेडियम' हुआ करता था. उस वक़्त ये स्टेडियम रिकॉर्ड 9 महीने में बन कर तैयार हुआ था. तत्कालीन राष्ट्रपति ज्ञानी जै़ल सिंह ने इसका शिलान्यास किया था."
"इस स्टेडियम में पहला मैच भारत और वेस्ट इंडीज़ के बीच खेला गया था."

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साल 2015 में इस स्टेडियम के नवीनीकरण का काम शुरू हुआ इसलिए यहां कोई मैच नहीं खेला गया.
पिछले साल फरवरी में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जब भारत आए थे, तो इसी स्टेडियम में 'नमस्ते ट्रंप' का कार्यक्रम आयोजित किया गया था. उस वक़्त भी ये स्टेडियम सुर्खियों में रहा था.
इसकी ख़ासियत है कि सीटों की क्षमता के लिहाज़ से ये दुनिया का सबसे बड़ा स्टेडियम है.
तुषार त्रिवेदी बताते हैं, "साल 1994-95 में इस स्टेडियम के नाम के आगे सरदार वल्लभ भाई पटेल जोड़ा गया था. उस वक़्त गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष नरहरि अमीन थे."
"स्टेडियम मोटेरा इलाक़े के पास बना है, इसलिए पटेल का नाम जोड़ने के बाद स्टेडियम का नाम 'सरदार पटेल गुजरात स्टेडियम, मोटेरा' हो गया था. अब 2021 में स्टेडियम का नाम तीसरी बार बदला गया है. अब इसका नाम हो गया है नरेंद्र मोदी स्टेडियम."

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लेकिन स्टेडियम का नाम पहले सरदार पटेल स्टेडियम था, इसके उदाहरण कई मीडिया रिपोर्ट में भी मिलते हैं. ऊपर लगी ख़बर सरकारी प्रसारक प्रसार भारती ने ट्वीट की है, जिसमें स्टेडियम के फोटो के साथ कैप्शन में स्टेडियम का नाम सरदार पटेल स्टेडियम मोटेरा लिखा है. ऐसी ही एक रिपोर्ट अख़बार बिजनेस स्टैंडर्ड और हिंदुस्तान टाइम्स की भी है, जिसमें स्टेडियम का नाम सरदार पटेल स्टेडियम लिखा है.
इसके अलावा इंग्लैंड की टीम जब 19 फरवरी 2021 को स्टेडियम में पहुँची थी, तब भी इंग्लैंड क्रिकेट के ट्विटर हैंडल से स्टेडियम का नाम सरदार पटेल स्टेडियम ही ट्वीट किया गया था.

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लेकिन गुजरात के उप मुख्यमंत्री ने इससे इनकार किया है. डीडी न्यूज़ गुजराती द्वारा जारी किए गए बयान में उन्होंने कहा, "मोटेरा स्टेडियम का नाम बदल कर नरेंद्र मोदी स्टेडियम किया गया है."
गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन की आधिकारिक बेवसाइट पर 29 दिसंबर 2020 का एक वीडियो पोस्ट किया हुआ है, जिसमें स्टेडियम का नाम मोटेरा स्टेडियम ही लिखा है.
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इस स्टेडियम में भारतीय क्रिकेटरों ने कई रिकॉर्ड भी बनाए हैं. तुषार त्रिवेदी ऐसे रिकॉर्ड की संख्या 20 से ज़्यादा बताते हैं.
वो कहते हैं, " सुनील गावस्कर ने इसी मैदान में 10 हजार रन बनाया था, कपिल देव ने इसी मैदान में 432 विकेट लिए थे, सचिन तेंदुलकर ने पहला डबल सेंचुरी इसी मैदान में खेलते हुए लगाया था, अनिल कुबंले ने भी अपना 100वां टेस्ट यहीं खेला था."
लेकिन अब रिकॉर्ड जड़ने वाले इन नामों को भुला कर स्टेडियम के नाम पर राजनीति हो रही है.
नाम को लेकर राजनीति क्यों?
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस मामले को लेकर ट्वीट किया "सच कितनी खूबी से सामने आता है, नरेंद्र मोदी स्टेडियम, अडानी एंड - रिलायंस एंड, जय शाह की अध्यक्षता में! " इसके साथ ही उन्होंने हैशटैग भी लगाया हम दो हमारे दो.
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ग़ौर करने वाली बात ये है कि संसद में बजट पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी ने इसी नारे के साथ मोदी सरकार पर तंज कसते हुए कहा था, "आज देश चार लोग चलाते हैं, हम दो हमारे दो"
उन्होंने नाम तो नहीं लिया था, लेकिन संसद में ही उनके भाषण के दौरान पीछे से दो नाम लिए गए, भारत के दो उद्योगपति अडानी और अंबानी के. इसलिए उनके बुधवार के ट्वीट को उनके पुराने बयान से जोड़ा जा रहा है.
दरअसल इस स्टेडियम में दो एंड का नाम - अडानी एंड और रिलायंस एंड रखा गया है. स्टेडियम के नाम बदलने के साथ साथ इन पैवेलियन एंड के नाम को लेकर भी चर्चा ज़ोर पकड़ रही है.
तो क्या ऐसे नाम पहली बार रखे गए हैं?
इस पर तुषार त्रिवेदी कहते हैं, "स्टेडियम में अडानी एंड का नाम पहले से ही था. लेकिन रिलायंस एंड भारत और इंग्लैंड के बीच चल रहे इस मैच से शुरू हुआ है."
लेकिन तुषार कहते हैं कि "कोई स्पॉन्सर अगर स्टेडियम बनाने में कभी कोई खर्च करता है, तो आम तौर पर एसोसिएशन उनके नाम पर किसी एंड का नाम रखते हैं. मुंबई के वानखेड़े स्टेडियम में भी फार एंड को 'टाटा एंड' के नाम से जाना जाता है. कई सरकारें आई और गईं लेकिन उस एंड का नाम आज भी वही है. हो सकता है स्टेडियम बनने के वक़्त टाटा ग्रुप की उसमें कोई भूमिका रही हो."
हालांकि इस स्टेडियम के नवीनीकरण में दोनों उद्योगपतियों ने पैसा ख़र्च किया है या नहीं इसकी आधिकारिक जानकारी नहीं है.

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स्टेडियम के नाम कैसे रखे जाते हैं?
कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने प्रेस कांफ्रेंस कर ये भी आरोप लगाया है कि "इतिहास आपको तब याद रखता है, जब आप ऐतिहासिक काम करते हैं. लेकिन इस सरकार ने ऐसा कोई काम ही नहीं किया, फिर भी चाहते हैं इतिहास में वो याद किए जाए?"
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या स्टेडियम के नाम रखने के कोई नियम कायदे क़ानून हैं?
क्या कभी किसी प्रधानमंत्री के कार्यकाल में ऐसा हुआ है कि किसी स्टेडियम का नाम उनके नाम पर रख दिया गया हो?
इसके जवाब में खेल मंत्री किरेन रिजिजू ने एक पत्रकार के ट्वीट को री-ट्वीट करते हुए लिखा कि इस लिस्ट में परिवारवालों के नाम पर जितने स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, स्टेडियम और खेल पुरस्कार हैं, उसका दशमलव एक फीसदी भी हमने नहीं किया है.
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उस लिस्ट में कांग्रेस नेताओं के नाम पर आज तक देश में जितने स्पोर्ट्स कॉम्प्लेक्स, स्टेडियम और खेल पुरस्कारों की घोषणा की है उसके नाम गिनाए हैं.
स्टेडियम के नामकरण के नियमों के बारे में बात करते हुए खेल पत्रकार तुषार त्रिवेदी कहते हैं, "किसी स्टेडियम या उसमें बने किसी एंड का नाम किया रखना है ये स्थानीय क्रिकेट एसोसिएशन का विशेषाधिकार होता है."
वो याद करते हुए कहते हैं, "वानखेडे स्टेडियम का नाम शेषराव कृष्णराव वानखेड़े के नाम पर जब रखा गया था, तब वो जीवित थे. चेन्नई का एमए चिदाबंरम स्टेडियम जब बना था, तब वो जीवित थे. उसी तरह से भारत में एनकेपी साल्वे चैलेंजर ट्रॉफी खेला जाता है. ये घरेलू क्रिकेट टूर्नामेंट है. एनकेपी साल्वे जीवित रहते हुए ये ट्रॉफी दस साल से ज़्यादा बार खेले थे."
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हांलाकि प्रधानमंत्री रहते ऐसा हुआ हो इस बारे में जानकारी नहीं है.
लेकिन नेताओं के नाम पर स्टेडियम का नाम रखने और स्टेडियम में उनकी प्रतिमा लगाने को लेकर पूर्व क्रिकेटर बिशन सिंह बेदी ने हाल ही में विरोध जताया था.
फ़िरोज शाह कोटला स्टेडियम का नाम बदलकर पूर्व केंद्रीय मंत्री अरुण जेटली के नाम पर करने का विरोध बिशन सिंह बेदी और कीर्ति आज़ाद दोनों ने किया था. हालांकि दोनों की अरुण जेटली से बनती भी नहीं थी.
फ़िरोज शाह कोटला स्टेडियम में उनकी प्रतिमा स्थापित करने को लेकर बिशन सिंह बेदी ने डीडीसीए की अपनी सदस्यता से इस्तीफ़ा तक दे दिया था. अपना इस्तीफ़ा लिखते हुए उन्होंने एक ख़ुला ख़त लिखा था, जिसकी बहुत चर्चा भी हुई थी.
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