किसान आंदोलन के ढाई महीने बाद क्या अब थकने लगे हैं किसान

    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, नई दिल्ली

धूप में गर्मी बढ़ रही है और अब आहिस्ता-आहिस्ता सूरज के तेवर और भी ज़्यादा तल्ख़ होते चले जायेंगे.

कड़कड़ाती ठंड से चिलचिलाती धूप तक दिल्ली की सीमाओं पर जारी किसानों के आंदोलन को लेकर कहा जा रहा है कि अब यहां मौजूद किसानों की तादात कम होती जा रही है.

यह भी दावे हैं कि सरकार और किसान संगठनों के बीच गतिरोध की वजह से ना वार्ता हो रही है और ना ही ऐसा होने के कोई आसार ही नज़र आ रहे हैं.

ऐसे में ये सवाल भी लाज़मी है कि क्या ढाई महीनों से भी ज़्यादा समय से दिल्ली की सीमाओं पर तीन नए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ आन्दोलन कर रहे किसान अब थक गए हैं?

"बिलकुल नहीं," ये कहना है सिंघु बॉर्डर पर मौजूद वयोवृद्ध सुरेंदर चौधरी का जो हरियाणा के रोहतक से आए किसान हैं. सुरेन्द्र पहले दिन से धरने पर बैठे हैं. वैसे शारीरिक रूप से उन्हें कई परेशानियां भी हैं जैसे टांगों में दर्द. मगर फिर भी वो घर वापस जाने की बात नहीं करते हैं.

बीबीसी से बात करते हुए वो कहते हैं, "ना जी. हम कहीं ना जाने वाले. जब तक क़ानून वापसी नहीं, घर वापसी भी नहीं. हम यहीं जमे रहेंगे. हम मानकर चल रहे हैं कि हमें 2024 तक इसी तरह आन्दोलन करना होगा. अगर ऐसा है तो हम इसके लिए तैयार हैं."

आंदोलन स्थल पर कम हो रहे किसान

हालांकि ग़ाज़ीपुर और सिंघु बोर्डर पर चलने वाले लंगर में किसानों की मौजूदगी से भी अंदाजा लगाया जा सकता है कि आंदोलन स्थलों पर इनकी संख्या कम हो रही है.

सुरेंदर चौधरी की बात पर बीबीसी से चर्चा करते हुए अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के संगठन सचिव अवीक साहा ने कहा कि साल 2024 तक आंदोलन की बात जो किसान कह रहे हैं वो असल में अलंकार है. वो ये बताना चाह रहे हैं कि किसान झुकेगा नहीं और हर तरह के संघर्ष के लिए तैयार है.

साहा का कहना है कि लंबे चलने वाले आंदोलनों में आप ये अपेक्षा नहीं कर सकते कि आन्दोलनकारियों की एक बड़ी तादाद हमेशा धरने पर बनी नहीं रह सकती है.

उनका कहना है कि आंदोलन स्थल पर लोगों की संख्या घटती बढ़ती रहती है.

उनका कहना था, "सब किसान हैं. खेत में काम भी है और आंदोलन भी करना है. ये वक़्त है जब फसल काटना भी है और नयी फसल बोना भी है. इसलिए संख्या कभी ज़्यादा नज़र आएगी तो कभी कम. मगर इसका मतलब ये नहीं है कि आंदोलन ख़त्म हो रहा है या किसान थक गए हैं या उनका अब मन अलग हो रहा है."

वो कहते हैं कि एक बार सबने देखा कि एक आह्वान पर किस तरह फिर से किसान दिल्ली की सीमाओं पर जुट गए. वो कहते हैं कि इनकी संख्या कभी भी बढ़ सकती है. खासतौर पर सप्ताहांत पर.

आंदोलन में शामिल किसानों की संख्या में निरंतर कमी की ख़बरों के बीच ये भी दिखता है कि जहां ग़ाज़ीपुर में दो किलोमीटर तक रास्ते पर आंदोलन कर रहे किसानों के टेंट और ट्रैक्टर मौजूद हैं, सिंघु बोर्डर पर 22 किलोमीटर तक आंदोलन कर रहे किसानों की ट्रालियां और टेंट मौजूद हैं, वहीं टीकरी बॉर्डर पर भी 14 किलोमीटर के दायरे में सड़क पर किसान डटे हुए हैं.

ग़ाज़ीपुर और सिंघु बॉर्डर पर धरना स्थल के आसपास हमारी मुलाक़ात ऐसे किसानों से हुई जो पहले से धरने पर नहीं बैठे हैं बल्कि दिन के कार्यक्रम में शामिल होने सीधे अपने गावों से आकर जमा हुए हैं.

दिल्ली की सीमाओं से बाहर निकल गया है आंदोलन

पूर्वी उत्तर प्रदेश से आये अश्विनी कुमार भी अपने इलाक़े के किसानों के एक बड़े जत्थे के साथ गाज़ीपुर बॉर्डर पहुंचे हुए हैं. उनका कहना है कि वो रात में लौट जायेंगे जबकि उनके साथ आए कई किसान दो तीन दिनों तक ग़ाज़ीपुर पर ही बने रहेंगे. अश्विनी कहते हैं कि उनके इलाक़े से और भी किसान ग़ाज़ीपुर आ रहे हैं.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश से भी आए बहुत सारे गन्ना किसान ग़ाज़ीपुर बॉर्डर पर मौजूद हैं जो न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर किसानों के बीच अपनी मांग बताते सुनाई दिए.

अखिल भारतीय किसान मज़दूर सभा के महासचिव आशीष मित्तल ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि अब आंदोलन को सिर्फ़ दिल्ली की सीमाओं पर नहीं देखा जाना चाहिए.

उनका कहना है कि शुरुआत में ये आंदोलन बेशक दिल्ली की सीमाओं पर ही केंद्रित रहा था और इसमें हरियाणा और पंजाब के किसान ज्यादा संख्या में शामिल थे, मगर अब ये देश भर में फैल चुका है.

मित्तल का कहना था, "पहले पंजाब के किसान थे. फिर पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान जुड़े. फिर हरियाणा के. अब माहौल कुछ ऐसा है कि नए कृषि क़ानूनों के ख़िलाफ़ पूरे भारत में किसान गोलबंद हो रहे हैं. अब आंदोलन महापंचायतों से होता हुआ गाँव की पंचायतों में फैल चुका है. पहले सिर्फ़ दिल्ली की सीमाओं पर आंदोलन करने वाले किसान नज़र आ रहे थे. अब हर गाँव में नज़र आ रहे हैं."

भारतीय किसान यूनियन के किसान नेता राकेश टिकैत अब दूसरे राज्यों में जाकर पंचायतों के माध्यम से किसानों को संबोधित कर रहे हैं. वहीं संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल 40 किसान संगठनों के प्रतिनिधियों ने दिल्ली की सीमाओं के साथ साथ अन्य राज्यों में भी आंदोलन को और सघन करने के लिए ज़ोर लगाया है.

मित्तल कहते हैं कि पहले तेलंगाना के किसानों को नए कृषि क़ानूनों के बारे में उतने जानकारी नहीं थी लकिन अब तेलंगाना सहित दक्षिण भारत के अन्य राज्यों में भी किसानों के ज़ोरदार आंदोलन देखने को मिल रहे हैं.

ग़ाज़ीपुर और सिंघु बॉर्डर पर मौजूद आंदोलन कर रहे किसानों का बातचीत के दौरान इतना ज़रूर कहना था कि जैसे जैसे गतिरोध बढ़ रहा है, किसानों का आन्दोलन और भी ज़्यादा फैल रहा है.

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