वसीम जाफ़र पर सांप्रदायिकता के आरोप और क्रिकेट स्टारों की चुप्पी के मायने - नज़रिया

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- Author, विजय लोकापल्ली
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
वसीम जाफ़र पर सांप्रदायिकता के आरोपों पर क्रिकेट जगत में नाममात्र की प्रतिक्रिया पर हम सब हैरान क्यों हैं?
पहली बात तो यही है कि भारत के पूर्व सलामी बल्लेबाज़ वसीम जाफ़र पर ड्रेसिंग रूम के अंदर सांप्रदायिक भेदभाव करने का आरोप किसने लगाया है?
उत्तराखंड क्रिकेट एसोसिएशन ने अब तक इस मामले में एक दूसरे को खारिज करने वाले दलीलें दी हैं हालांकि एक अधिकारी ने मुझे बताया कि ये मामला कुछ भी हो सकता है लेकिन सांप्रदायिक नहीं है.
दरअसल, खेल की दुनिया में धर्म कभी बहस का मुद्दा नहीं रहा. कभी नहीं.
1967 में भी भारत क्रिकेट टीम के कप्तान मंसूर अली ख़ान पटौदी अपने साथ वैसी संस्कृति लेकर आए जिसमें खिलाड़ियों के बीच मज़बूत बॉन्डिंग हुआ करती थी.
भारत के पूर्व कप्तान और स्पिनर बिशन सिंह बेदी ने पटौदी के दौर को याद करते हुए कहा, "उन्होंने हमें भारतीयता का पाठ पढ़ाया था. उन्होंने हमें बताया था कि बतौर टीम हम सब एक हैं."
ऐसे में वह घटना जिसके चलते वसीम जाफ़र को अपना बचाव करना पड़ा, किसी सदमे से कम नहीं है.
उन पर टीम चयन में कथित सांप्रदायिक भेदभाव और शुक्रवार की नमाज़ के लिए ड्रेसिंग रूम में मौलवी साहब को बुलाने के आरोप लगाए गए.
हालांकि उत्तराखंड क्रिकेट एसोसिएशन के सचिव माहिम वर्मा ने सांप्रदायिकता के आरोपों को खारिज़ करते हुए इसे क्रिकेट से जुड़ा मसला बताया है.
अचरज की बात नहीं है कि आरोपों से आहत हुए जाफ़र ने उत्तराखंड टीम के मुख्य कोच के पद से इस्तीफ़ा दे दिया. इस टीम का प्रदर्शन मुश्ताक़ अली टूर्नामेंट में अच्छा नहीं रहा है.
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वसीम जाफ़र पर लगे आरोप और चुप्पी?
जाफ़र के इस्तीफ़े के बाद जब मामला ने तूल पकड़ा तो क्रिकेट की दुनिया में किस तरह की प्रतिक्रिया देखने को मिली? कह सकते हैं कि नाम मात्र की प्रतिक्रियाएं सामने आयीं.
ठीक यही स्थिति तब देखने को मिली थी जब भारतीय टीम के कोच पद से अनिल कुंबले को हटा दिया गया था. तब भी क्रिकेट के नामचीन सितारों ने चुप्पी साध ली थी.
जाफ़र के पक्ष में सबसे पहले खड़े होने वालों में अनिल कुंबले थे. भारत के सबसे कामयाब लेग स्पिनर अनिल कुंबले वह दर्द जानते थे जो वसीम जाफ़र ने महसूस किया होगा- अकेले होने का और ड्रेसिंग रूम शेयर कर चुके साथियों की ओर से निराशा मिलने का.
उन्होंने वसीम जाफ़र के लिए एक बड़े दिल वाले खिलाड़ी का स्पिरिट दिखाते हुए ट्वीट किया, "वसीम तुम्हारे साथ हूं. तुमने सही किया. दुर्भाग्य यह कि खिलाड़ी तुम्हारे मेंटॉरशिप को मिस करेंगे."
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यह एक वरिष्ठ से किसी खिलाड़ी को मिले ज़रूरी समर्थन की तरह था. हम लोग देख रहे हैं कि किस तरह के खेल के बड़े सितारों ने सोशल मीडिया पर जाफ़र का समर्थन करने से परहेज किया है, लेकिन जिन लोगों ने जाफ़र का समर्थन किया है, उनकी प्रशंसा भी हो रही है.
विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन ने जाफ़र का समर्थन किया है. इसके अलावा मुंबई की टीम में उनके साथ खेल चुके चंद्रकांत पंडित, अमोल मजूमदार, शिशिर हट्टंगड़ी, आविष्कार साल्वी, शेल्डन जैक्सन, फ़ैज़ फ़ज़ल, मोहम्मद कैफ़, नयन दोषी, निशित शेट्टी ने जाफ़र का साथ दिया है.
जाफ़र के पास एक संदेश बहुत दूर से जिंबाब्वे के पूर्व कप्तान एंडी फ्लावर ने भी भेजा, जिसने उनका काफ़ी उत्साह बढ़ाया.
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चुप्पी की क्या हो सकती है वजह?
बड़े क्रिकेट स्टारों के इस मुद्दे पर सोशल मीडिया पर चुप्पी की एक वजह ट्रोल फैक्टरी हो सकती है.
लेकिन टीम के ड्रेसिंग रूम के बायो बबल वातावरण का उल्लंघन करते हुए मौलवी को बुलाने की बात पर टीम के खिलाड़ी इक़बाल अब्दुल्ला की बात को भी सुना जाना चाहिए.
अब्दुल्ला ने जो बताया है वह उत्तराखंड क्रिकेट एसोसिएशन ने नहीं बताया था.
अब्दुल्ला ने द इंडियन एक्सप्रेस से कहा, "हम लोग शुक्रवार की नमाज़ मौलवी के बिना नहीं पढ़ते है. दोपहर तीन बजकर 40 मिनट में हमारा अभ्यास पूरा होने वाला था और उसके बाद ही हम नमाज़ पढ़ते. मैंने सबसे पहले वसीम भाई से पूछा कि क्या मौलवी को बुला सकते हैं? उन्होंने मुझे टीम मैनेजर से अनुमति लेने के लिए कहा. मैंने टीम मैनेजर नवनीत मिश्रा से बात की, उन्होंने कहा, 'कोई नहीं इक़बाल. प्रार्थना-धर्म पहले होना चाहिए.' उन्होंने मुझे अनुमति दी और इसके बाद ही मैंने नमाज़ पढ़ने के लिए मौलवी को बुलाया."
इक़बाल अबदुल्ला की बातें भी तस्दीक करती हैं कि खेल सांप्रदायिकता से कहीं ऊपर की चीज़ है. हालांकि ये बात भी सही है कि खेल में भेदभाव दूसरे तौर तरीकों से जाहिर होता है लेकिन वह अहम कारक नहीं होता.
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सांप्रदायिकता की परिधि से ऊपर खेल की दुनिया
खेल में सांप्रदायिकता की कोई भी जगह नहीं है. हमें याद रखना चाहिए कि 1993 के दंगों में सुनील गावस्कर ने हिंसा पर उतारू भीड़ के बीच जाकर वहां फंसे एक परिवार को बचाया था.
खेल की दुनिया में ज़फ़र इक़बाल जैसे प्रतिष्ठित हॉकी ओलंपियन खिलाड़ी भी हैं, किसी भी त्योहार पर सबसे पहला संदेश ना केवल उनका होता है बल्कि मोहम्मद अज़हरूद्दीन, वसीम जाफ़र, फ़ैज फ़ज़ल, ओबेद कमाल और मोहम्दद कैफ़ के भी संदेश आते हैं.
ज़फ़र इक़बाल तो भगवद गीता और ऋगवेद के भी ज्ञाता हैं. उसी तरह से बिशन सिंह बेदी भी सभी धर्मों के ग्रंथों की समझ रखते हैं.
कोई वाराणसी से निकले मोहम्मद शाहिद जैसे हॉकी के जादूगर को कैसे भूल सकता है? खेल और चरित्र में जो भी कुछ भी अच्छा हो सकता है वह सब मोहम्मद शाहिद में मौजूद था.
हमने देखा है किस तरह से वे पाकिस्तान के लिए अपना सर्वश्रेष्ठ हुनर बचाकर रखा करते थे? वे ऐसा किसी ख़ास वजह से नहीं करते ते बल्कि वे पाकिस्तानी टीम को टक्कर का मानते थे और अपने स्किल से उन्हें छकाने में आनंद महसूस करते थे. वे अपनी ड्रिबलिंग से पाकिस्तानी खिलाड़ियों को शर्मिंदा महसूस कराते थे. या फिर जैसा कि मोहम्मद कैफ़ कहते हैं, "क्रिकेट खेलते वक्त कभी मुझे मेरी धार्मिक आस्था की याद नहीं दिलाई गई." सच्चाई यही है.

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खेत्र पत्रकारिता के अपने करियर के दौरान मुझे कई शानदार खिलाड़ियों से मिलने का मौका मिला, जो क्षुद्र राजनीति और सांप्रदायिकता से ऊपर उठे हुए थे.
रमज़ान के महीनों में हम लोग मुसलमान दोस्तों की मौजूदगी में पानी तक नहीं पिया करते हैं. खेल के मैदान में भाईचारा की मिसाल के तौर पर कई किशोरों और कई साजिदों को एक दूसरे का बखूबी साथ देते हम लोगों ने देखा है.
मौजूदा दौर में लोग सोशल मीडिया पर जल्दबाज़ी में निष्कर्ष निकालते हैं और यह हमेशा सही नहीं होता है. ऐसे समाज को प्रभावित करने वाले, जागरूक करने वाले कद के खिलाड़ियों के लिए अपनी बात रखना ज़रूरी हो जाता है.
हालांकि सार्वजनिक तौर पर अपने विचार व्यक्त करना किसी का निजी मसला हो सकता है. किसी का पक्ष लेने के लिए किसी दूसरे को मजबूर भी नहीं किया जा सकता.
लेकिन अगर आपने एक दूसरे के साथ समय बिताया हो तो एक दूसरे के साथ खड़े होने से बड़ी मदद मिलती है. दुखद यह है कि सबसे ज़रूरी वक्त में वसीम जाफ़र को वह मदद नहीं मिली.

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