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निर्भया फंड के करोड़ों रुपए आख़िर कहाँ गए?
- Author, अपर्णा अल्लूरी और शादाब नज़्मी
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, दिल्ली
दिल्ली में 16 दिसंबर 2012 को चलती बस में बहुचर्चित गैंग रेप हुआ. देश और विदेश में इसे लेकर बहुत विरोध प्रदर्शन आयोजित किए गए. इसके बाद 2013 में महिलाओं के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा को कम करने, बलात्कार पीड़ितों की सहायता और उनके पुनर्वास को सुनिश्चित करने के उद्देश्य से भारत सरकार ने निर्भया फंड स्थापित किया.
लेकिन चैरिटी ऑक्सफैम इंडिया ने अपनी एक रिपोर्ट में पाया कि निर्भया फंड उन महिलाओं तक नहीं पहुँचा, जिनके लिए इसे बनाया गया था.
2017 में कविता (उनका और इस रिपोर्ट में लिए गए पीड़ितों के नाम बदल दिए गए हैं) ने ओडिशा के एक पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज़ करवाई कि उनके ससुर ने उनका रेप किया है. लेकिन उनके मुताबिक, पुलिस ने उनके ससुर को समन किया, फटकारा और उन्हें (कविता को) उनके माता-पिता के पास भेज दिया.
कोई केस दर्ज़ नहीं किया गया. पुलिस का कहना है कि यह "पारिवारिक मसला" था.
2019 में, उत्तर प्रदेश के एक थाने में पिंकी (42) देर रात पुलिस थाने पहुँचीं. पति की पिटाई से वो प्रत्यक्ष रूप से घायल दिख रही थीं. इसके बावजूद पुलिस ने उनकी शिकायत को दर्ज करने में घंटों लिए.
अपनी ज़िंदगी पर ख़तरे को भाँपते हुए जब वे अपने गृह नगर लखनऊ भाग गईं, तो वहाँ भी वो पुलिस के पास गईं. लेकिन वहाँ के अधिकारी ने उन्हें "ऊपर से नीचे तक देखा" और उनकी शिकायत दर्ज़ करने से पहले कहा कि वो ग़लत कर रही हैं.
बीते वर्ष 18 वर्षीय प्रिया ओडिशा के एक पुलिस थाने में गईं, जहाँ उन्होंने उस व्यक्ति पर, जिसके साथ वो घर से भागी थीं, रेप का आरोप लगाया.
वहाँ उन्हें पुलिस अधिकारी ने कहा, "आपने उसके साथ प्रेम में पड़ने से पहले हमसे नहीं पूछा. अब हमसे मदद के लिए आई हैं." उन्होंने दावा कि उनसे ज़बरन शिकायत को बदलवाया गया, जिसमें लिखा गया कि वो उस व्यक्ति के साथ विवाहित थीं और उसने उन्हें छोड़ दिया है- जो एक अन्य तरह का अपराध है, जिसमें कम समय के लिए जेल की सज़ा होती है.
समाज सेवक, वकील या पुलिस, वो कोई भी, जो घरेलू या यौन हिंसा के पीड़ितों के लिए काम करते हैं, आपको बताएँगे कि ये उदाहरण भारत में निराशाजनक रूप से आम हैं.
और इस तरह के अपराधों को कम करने की दिशा में सरकार की ओर से लगाए जा रहे करोड़ों रुपए अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर सके हैं.
2012 में दिल्ली गैंग रेप में मारी गईं युवा महिला को मीडिया में दिए गए नाम पर निर्भया फंड का नाम रखा गया है. भारतीय क़ानून के मुताबिक़ रेप पीड़िता की पहचान उजागर नहीं कर सकते, लिहाजा मीडिया में उन्हें "निर्भया" या "निडर" के नाम से पहचाना जाता है.
उनके मामले को लेकर दुनिया भर में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए, इसने सुर्ख़ियाँ बटोरीं. यह एक ऐतिहासिक पल था, जिसके बाद भारत में रेप क़ानूनों के तहत चिकित्सकीय परीक्षण और पीड़िता की काउंसलिंग को लेकर कड़े दिशा-निर्देश जारी किए गए. यह फंड लंबित पड़े बदलावों को शुरू करने के लिए था.
लेकिन ऑक्सफैम इंडिया की एक रिपोर्ट में पाया गया है कि लालफीताशाही, आबंटन से कम खर्च, अस्पष्ट आबंटन और राजनीतिक कर्मठता के अभाव ने इस फंड को खोखला कर दिया है, जो पहले से ही 'पुरुष प्रधानता' से जूझ रहा है.
जो कुछ हुआ उसकी क्या हैं वजहें?
निर्भया फंड का अहम हिस्सा गृह मंत्रालय के पास जाता है. ऑक्सफ़ैम इंडिया की अमिता पितरे का कहना है कि इस फंड का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल आपातकालीन प्रतिक्रिया सेवाओं में सुधार, फॉरेंसिक लैब को अपग्रेड करने या साइबर अपराधों से लड़ने वाली इकाइयों के लिए भुगतान में किया जाता है, जो सीधे-सीधे केवल महिलाओं के लाभार्थ नहीं होते.
रेलवे से लेकर सड़क तक, इस फंड की राशि को बेहतर बिजली व्यवस्था, और अधिक सीसीटीवी कैमरों, सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन और यहाँ तक कि वाहनों में पैनिक बटन लगाने के लिए एक शोध अनुसंधान में भी ख़र्च किया गया.
पितरे कहती हैं, "लोगों को तकनीक पर आधारित जवाब चाहिए, लेकिन 80 फ़ीसदी मामलों में इसमें मदद नहीं मिलेगी, जहाँ अभियुक्त पीड़ित महिला को पहले से जानते हैं."
ये योजनाएँ भौतिक संसाधनों पर भी बहुत अधिक फ़ोकस करते हैं, कुछ वैसा ही जिसकी निर्भया की माँ आशा देवी ने भी आलोचना की है.
उन्होंने 2017 में कहा था, "निर्भया फंड का इस्तेमाल महिलाओं की सुरक्षा और सशक्तीकरण के लिए किया जाना चाहिए था, लेकिन इसे सड़क बनाने जैसे कामों में लगाया जा रहा है."
इस मामले में अभियान चलाने वाले लोग कहते हैं कि "हादसे से सदमाग्रस्त पीड़ित के साथ बर्ताव को लेकर जाँचकर्ता अधिकारियों के प्रशिक्षण में इसे ख़र्च किया जाता, तो इससे कविता या पिंकी जैसी महिलाओं को कहीं अधिक फ़ायदा पहुँचता.
मिसाल के तौर पर पिंकी का कहना है कि उसने लखनऊ पुलिस स्टेशन में आधे घंटे तक इंतज़ार किया, जबकि इंस्पेक्टर बैडमिंटन खेल रहे थे. जब वह आखिरकार उनसे बात करने के लिए तैयार हुए, तो उन्होंने कहा, "यह आपके और आपके पति के बीच का मामला है. हम इसमें तभी इससे जुड़ सकते हैं, जब यह आपके और किसी अजनबी के बीच का मामला होता."
कविता को अपने ससुर के ख़िलाफ़ मामला दर्ज कराने में तीन साल से अधिक का वक़्त लगा.
उस मामले का अध्ययन (केस वर्कर) कर रहे व्यक्ति को रेप का आरोप दर्ज करने से कविता को हतोत्साहित करने वाले इंस्पेक्टर ने बताया कि चूँकि अभियुक्त ससुर था, लिहाजा वह मामला रेप नहीं, घरेलू हिंसा की धाराओं के तहत दर्ज होना चाहिए था.
केसवर्कर ने कहा, "मैं बेहद हैरान हुआ और पूछा कि क़ानून की जानकारी के बग़ैर वे इंस्पेक्टर कैसे बन गए."
लेकिन रवैए में बदलाव की तुलना में सीसीटीवी कैमरा ख़रीदना ज़्यादा आसान है- और कुछ हद तक यह बताता है कि इतने रुपयों का उपयोग आख़िर किया क्यों नहीं गया.
कम ख़र्च एक बड़ी समस्या
गृह मंत्रालय ने इस फंड के तहत मिली अधिकांश राशि को ख़र्च कर दिया है, अन्य सरकारी विभागों और अधिकतर राज्य सरकारों के पास इस मद के पैसे बिना उपयोग पड़े हुए हैं.
उदाहरण के लिए केंद्रीय महिला एवं बाल विकास मंत्रालय इस मद में 2019 तक मिली केवल 20% राशि ही ख़र्च कर सका है. इस मंत्रालय को 2013 के बाद से निर्भया फंड के कुल ख़र्च का लगभग एक चौथाई हिस्सा मिला है.
इसकी राशि रेप या घरेलू हिंसा से बची, महिलाओं के लिए शेल्टर होम, महिला पुलिस वॉलंटियर और महिला हेल्पलाइन जैसी मदों में ख़र्च की जाती है.
पितरे कहती हैं, "ये इस योजना को शुरू करने का मक़सद नहीं था. ये पर्याप्त नहीं हैं."
वे कहती हैं, "इस मद की राशि को प्रभावी रूप से अमल में लाने के लिए इससे जुड़े अवरोधों को हटाना बेहद ज़रूरी है."
अभियान चलाने वाले कहते हैं, ये वो जगह है, जहाँ यह फंड सबसे अधिक डगमगाता हुआ दिखता है. सेंटर स्थापित करना, टीमें बनाना आसान है और उन्हें बनाए रखना कहीं अधिक मुश्किल.
आपात केंद्र कई जगहों पर हैं और अहम किरदार निभा रहे हैं, लेकिन वहाँ अक्सर स्टाफ के साथ साथ लोगों की सेलरी, ट्रांसपोर्ट और अन्य आकस्मिक ज़रूरतों (जैसे, जब आधी रात को फटे कपड़ों या ख़ून से सने कपड़ों में लिपटी एक महिला आती है और उसके लिए कपड़े चाहिए) के लिए पैसों की कमी पड़ जाती है.
रेप और घरेलू हिंसा में बची महिलाओं को सलाह देने वाली वकील शुभांगी सिंह कहती हैं कि उत्तर प्रदेश के सार्वजनिक अस्पतालों में पर्याप्त रेप किट या स्वाब या चीज़ों को इकट्ठा करके ट्रांसपोर्ट करने के लिए ज़िप लॉक बैग उपलब्ध नहीं हैं.
ऑक्सफैम की गणना के मुताबिक़, निर्भया फंड में पहले ही आबंटन कम है. इसमें लगभग 94.69 अरब रुपए (1.3 बिलियन डॉलर) होने चाहिए ताकि किसी भी प्रकार की हिंसा से जूझ रही कम से कम 60% महिलाओं तक इसकी सेवाएँ पहुँच सकें.
तो इस फंड की राशि का इस्तेमाल क्यों नहीं किया जा रहा?
अर्थशास्त्री रितिका खेड़ा कहती हैं, "एक कारण ये दिखता है कि उन्हें काग़ज़ी कार्रवाइयों की कठिन बाधाओं से गुज़रना पड़ता है."
"और इसकी भी कोई गारंटी नहीं है कि अगर पैसे बचे भी हैं, तो क्या वे अगले साल भी उपयोग में लाए जा सकते हैं?"
यह अनिश्चितता भी राज्यों को इस मद में पैसे के लिए आवेदन या इसे इस्तेमाल करने से रोकता है. वे उस योजना को लेकर अनिच्छुक हो सकते हैं, जिनका भविष्य अनिश्चित है, ख़ास कर जब ये पैसा केंद्र सरकार के बजट से आ रहा है.
यह बताना मुश्किल है कि क्या इस फंड में वृद्धि हो रही है?
2013 में यह लगभग 823 करोड़ रुपए था. लेकिन बाद के वर्षों में इसमें ऊपर नीचे होता रहा है. इस फंड को उन योजनाओं और कैटेगरी में दिया जाता रहा है, जिनके नाम हर साल बदलते रहे हैं.
लिहाजा इस फंड में कितनी राशि आबंटित की गई है, इसे जानने के लिए यह पता लगाया जाना चाहिए कि कितनी राशि अब तक जारी की गई है, न कि क्या आबंटित किया गया है.
लैंगिग बजट इसी आधार पर निकाला जाता है
इस वर्ष 21.3 बिलियन डॉलर के लैंगिक बजट का एक तिहाई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के फ्लैगशिप ग्रामीण आवास योजना में दिया गया है. यह ग़रीबों के घरों को बनाने में मदद करता है, लेकिन इसमें महिला का सह-स्वामित्व होना ज़रूरी है. बीते दो बजट के दौरान भी इसे बहुत अहमियत दी गई थी.
हालाँकि, लैंगिक अधिकार कार्यकर्ता इस पहल का स्वागत करते हैं, लेकिन साथ ही वे सवाल करते हैं कि पहले से कम फंड के हिस्से से इस योजना में ख़र्च करना क्या सबसे अच्छा तरीक़ा है.
अर्थशास्त्री विवेक कौल कहते हैं, "अधिकांश अर्थनीति एक राजनीतिक गणना है. कुछ राज्यों में पुरुषों की संख्या में महिलाएँ अधिक मतदान करती हैं."
साथ ही इसके लाभार्थियों की सूची में ग्रामीण महिलाओं को खाना पकाने की गैस ख़रीदने में मदद करने की एक योजना भी है (इसिलिए, पेट्रोलियम मंत्रालय को भी निर्भया फंड से राशि प्राप्त हुई है) और साथ ही कई कृषि योजना भी.
अधिकारों का क्या?
दिल्ली गैंग रेप के बाद भारत में महिलाओं और लड़कियों के साथ होने वाले अपराधों में कमी के कोई संकेत नहीं हैं और इनमें से अधिकांश की पहुँच से न्याय दूर ही है.
2012 के बाद से रेप के मामलों की ढिलाई से की गई कई ख़बरें अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में छाई रहीं, जिसमें अभियोजन के गतिरोध की ओर इशारा था. और अगर महिला ग़रीब है या फिर आदिवासी है या भारत के निचले वर्ग से है- तो उसके लिए बाधाओं की ढेर कहीं ऊँची है.
उत्तर प्रदेश पुलिस के पूर्व महानिदेशक विक्रम सिंह कहते हैं, "अगर भ्रष्टाचार से अधिक कुछ बुरा है, तो वह है निर्दयता."
"हम पर्याप्त महिला अभियोजकों, पुलिस अधिकारियों, जजों की बहाली और फास्ट ट्रैक कोर्ट नहीं बना पाए हैं. यह निर्भया फंड का ढीला उपयोग है."
वे कहते हैं, "मर्दानगी की एक सनक है, जो पुलिस कॉन्सटेबल को है और इसमें पुलिसिया सिस्टम में गंभीर सुधार और ज़िम्मेदारी के बगैर इसे समाप्त नहीं किया जा सकता- जैसे पुलिस अधिकारियों के ख़िलाफ़ शिकायतों की जाँच के लिए निष्पक्ष प्राधिकरण का होना."
महिलाओं के प्रति उदासीनता पुलिस के अलावा डॉक्टरों तक फैली है.
इस मद में डॉक्टरों को प्रशिक्षित करने के लिए अलग से कोई पैसा नहीं तय किया गया है, जबकि रेप की जाँच में वे अहम किरदार निभाते हैं. यहाँ तक कि पुलिस की तुलना में घरेलू हिंसा की शिकार महिला का डॉक्टरों के पास जाना ज़्यादा आसान होता है.
इस सूची में शिक्षा को भी कम महत्व दिया गया दिखता है. लेकिन इस अभियान से जुड़े लोग कहते हैं कि पुरुष बनने से पहले एक युवा लड़के की सोच को बदलना बेहद महत्वपूर्ण है.
लेकिन लैंगिक अधिकार के पैरोकार कहते हैं कि फंड की चुनौती तो केवल एक हिस्सा है. दूसरा महत्वपूर्ण हिस्सा यह है कि महिलाओं को उनके अधिकारों का प्रयोग करने के लिए सशक्त बनाने के बजाय उनके सम्मान की रक्षा करना करना ज़्यादा ज़रूरी है.
एक शोध इस ओर इशारा करती है कि जो सज़ा की गंभीरता के बजाय दोष सिद्ध होने की निश्चितता अपराध के ख़िलाफ़ सबसे बड़ा हथियार है. और यह तभी होगा जब एक महिला पुलिस थाने जा कर आसानी से अपने शिकायत लिखवा सकेगी.
खेड़ा कहती हैं, "आपको उस स्थिति तक पहुँचाने के लिए कोई चाहिए."
वे कहती हैं, "किसी योजना को बर्बाद करने के कई तरीक़े हो सकते हैं, जबकि दूसरी तरफ आप यह दिखाते रहें कि आप इस पर बहुत ज़ोर दे रहे हैं."
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