दिल्ली सरकार की अनुमति के बिना दिल्ली पुलिस को नहीं मिलेंगी डीटीसी बसें - प्रेस रिव्यू

गणतंत्र दिवस पर ट्रैक्टर रैली के दौरान भड़की हिंसा और तोड़-फोड़ की अलग-अलग घटनाओं में 45 बसों को नुक़सान पहुंचा था.

26 जनवरी को हुई घटना में डीटीसी की 40 बसों और क्लस्टर स्कीम के तहत चलायी जाने वाली पांच बसों को नुकसान हुआ है.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया ने एक सूत्र के हवाले से लिखा है कि इनमें से ज़्यादातर बसों को दिल्ली पुलिस ने अपने इस्तेमाल के लिए हायर किया था लेकिन इन बसों का इस्तेमाल बैरिकेड के तौर पर भी किया. जिसका परिणाम ये हुआ कि बसों को भारी नुकसान हुआ है और उन्हें रिपेयर कराने की ज़रूरत है.

दिल्ली परिवहन मंत्री कैलाश गहलोत जो कि डीटीसी बोर्ड के चेयरमैन भी हैं, उन्होंने एक आदेश जारी करते हुए कहा है कि डीटीसी बसों को अब दिल्ली सरकार की अनुमति के बाद ही और ख़ास परिस्थितियों में ही किराये पर लिया जा सकेगा.

अख़बार की ख़बर के मुताबिक़, दिल्ली सरकार ने बसों को हुए नुकसान को देखते हुए दिल्ली पुलिस से कहा है कि उन्हें अपने लिए कोई दूसरा इंतज़ाम तलाश लेना चाहिए.

दिल्ली दंगे: हिंसा के कारण विधवा हुई औरतों ने की मदद की मांग

बीते साल क़रीब-क़रीब इसी दौरन उत्तर-पूर्वी दिल्ली में दंगे भड़के थे. इन दंगों के कारण विधवा हुई 15 औरतों ने बुधवार को करदमपुरी में जमा होकर अपने लिए मुआवज़े की मांग की.

इंडियन एक्सप्रेस की ख़बर के अनुसार, इन महिलाओं की शिकायत है कि उन्हें जो मुआवज़ा दिया गया है वो अपर्याप्त है. ख़ासतौर पर उन महिलाओं के लिए जो नौकरीपेशा नहीं हैं. इनमें से कई महिलाओं का कहना था कि दंगे में उनका घर पूरी तरह से बर्बाद हो चुका है जिसे दोबारा से बनाने के लिए उन्हें मदद की ज़रूरत है.

रुख़साना बानो नाम की एक महिला ने बताया कि वो लोनी में रहती हैं और उनके छह बच्चे हैं. बीते साल 24 फरवरी को दंगे में उनके पति की मौत हो गई. रुख़साना का कहना है कि उनके पति फ़िरोज़ काम के सिलसिले में घर से बाहर गए थे तभी वो दंगाइयों की चपेट में आ गए. रुख़साना बताती हैं कि उन लोगों ने फ़िरोज़ को मारकर ऑटो में फेंक दिया था. रुख़साना को फ़िरोज़ का शव उनकी हत्या के 17 दिन बाद अस्पताल में मिला.

वो कहती हैं, "शुरू में फ़िरोज़ के माता-पिता सहयोग करते थे लेकिन अब सब कुछ ख़ुद ही करना होता है. दिल्ली सरकार की ओर से उन्हें दस लाख रुपये मिले थे लेकिन बच्चों की पढ़ाई और बाकी ख़र्च पूरे करना अब मुश्किल हो रहा है."

वो कहती हैं कि लॉकडाउन के कारण कहीं काम भी नहीं मिला, इसलिए परेशानी बढ़ गई है.

पहली बार पता चली पेड़ की मॉनिटरी वैल्यू, 74,500 रुपये प्रति वर्ष

एक पेड़ का आर्थिक मूल्य कितना होता है? अभी तक इस सवाल का जवाब देना मुश्किल था लेकिन पहली बार एक पेड़ की आर्थिक क़ीमत बतायी जा सकती है.

एक पेड़ की मौद्रिक क़ीमत (मॉनिटरी-वर्थ) 74,500 रुपये प्रति वर्ष होती है. ऐसे में जितने भी साल का पेड़ है उसे 74,500 रुपये से गुणा करके उसकी कुल आर्थिक क़ीमत पता की जा सकती है.

हिंदुस्तान टाइम्स की ख़बर के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट द्वारा नियुक्त एक समिति ने अपनी रिपोर्ट में यह बात कही है. यह पहला मौक़ा है जब पेड़ों के मूल्यांकन के लिए इस तरह की कोई आर्थिक क़ीमत तय की गई है.

पांच सदस्यों वाली इस समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अगर कोई पेड़ सौ साल पुराना है तो उसकी आर्थिक क़ीमत एक करोड़ रुपये से भी अधिक हो सकती है.

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