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बजट 2021: बाज़ार और कारोबारी क्यों कर रहे हैं स्वागत - नज़रिया
- Author, आलोक जोशी
- पदनाम, आर्थिक विश्लेषक
घाटे की फिक्र छोड़कर इस वक्त सरकार को खर्च करना चाहिए. तमाम विद्वानों की यह बात तो वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने मान ली है.
उन्होंने इतनी हिम्मत दिखाई है कि चालू वित्तवर्ष में न सिर्फ सरकार का घाटा यानी फिस्कल डेफिसिट साढ़े नौ परसेंट पहुंचने की बात खुलकर कबूल की बल्कि यह भी बताया कि अभी इस साल ही अस्सी हज़ार करोड़ रुपए का कर्ज और लेना पड़ेगा.
कुल मिलाकर सरकार इस साल 18.48 लाख करोड़ रुपए का कर्ज ले चुकी है. कोरोना काल में यह कोई आश्चर्य भी नहीं है. ऐसी आशंका थी.
हालांकि ज्यादातर विद्वान मान रहे थे और अंदाजा लगा रहे थे कि यह आंकड़ा सात से आठ परसेंट के बीच रह सकता है. लेकिन संशोधित अनुमान में यह साढ़े नौ परसेंट तक पहुंच चुका है.
अगले साल जब बजट आएगा तब ही शायद पता चले कि बीते साल का घाटा दरअसल रहा कितना.
हालांकि यहां यह साफ करना ज़रूरी है कि वित्तमंत्री ने इस बार घाटे में वो घाटे भी शामिल करके दिखा दिए हैं जिन्हें अब तक सरकारें छिपाकर रखती थीं या जिन्हें बैलेंस शीट से बाहर रखा जाता था.
कर्ज़ लेने की एक बड़ी वजह तो साफ है. कोरोना की वजह से आमदनी में आई तेज़ गिरावट. डायरेक्ट और इनडायरेक्ट दोनों ही तरह के टैक्स की वसूली में भारी गिरावट है.
दूसरी तरफ कोरोना की वजह से सरकार का खर्च कम होने के बजाय बढ़ा ही है. बजट के बाद अपनी प्रेस कॉन्फ्रेंस में निर्मला जी ने कहा भी - "हर कोई मुझे सलाह दे रहा था कि प्लीज़ खर्च बढ़ाइए. और इसीलिए हमने खर्च किया, खर्च किया और खर्च किया! ऐसा न होता तो आपका सरकारी घाटा इस जगह तक नहीं पहुंच सकता था."
और इसी तर्ज पर उन्होंने आगे की योजना भी बनाई है और अगले वित्तवर्ष में सरकारी घाटा जीडीपी के 6.8% पर पहुंचाने का लक्ष्य रखा है.
इसके साथ उन्होंने हौसला बढ़ानेवाला एक एलान यह किया है कि अगले साल कैपिटल यानी ऐसी चीजों पर साढ़े पांच लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का खर्च होगा जिनसे सरकार के पास संपत्ति बनती है. यानी वो खर्च जो बेकार नहीं जाता, या वो रकम जो इस साल सिर्फ खर्च हो जाती है आगे उससे कुछ मिलने की उम्मीद नहीं रहती. सरकार जब ऐसा खर्च बढ़ाती है तो निजी क्षेत्र को भी निवेश बढ़ाने की प्रेरणा और हिम्मत मिलती है.
लेकिन निजी क्षेत्र को, बड़े कारोबारियों को या शेयर बाज़ार के खिलाड़ियों को बजट में जो चीज़ सबसे ज्यादा पसंद आई वो वही है जिसपर बजट के दिन वित्तमंत्री की सबसे ज्यादा आलोचना हुई और शायद आगे भी होती रहे.
विनिवेश की योजना
यह है सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी बेचकर पौने दो लाख करोड़ रुपए जुटाने का लक्ष्य और साथ ही दो सरकारी बैंक, एक सरकारी जनरल इंश्योरेंस कंपनी, अनेक सड़कें, बंदरगाह, एयरपोर्ट, पावरग्रिड कॉर्पोरेशन की बिजली लाइनें, रेलवे लाइनें और डेडीकेटेड फ्रेट कॉरिडोर बेचकर पैसे जुटाने का एलान. यही नहीं सरकारी विभागों की खाली पड़ी ज़मीनों को बेचने के लिए एक एसपीवी बनाने का नया एलान.
विपक्षी पार्टियों और इस फैसले के आलोचकों की जुबान में कहें तो सरकार ने बहुत बड़ी सेल लगाने का फैसला किया है.
लेकिन इसके बाद दो और एलान आए. सरकारी बैंकों में डूबे या डूबने की कगार पर पहुंचे कर्ज को खरीदकर ठिकाने लगाने के लिए एक सरकारी ऐसेट रीकंस्ट्रक्शन कंपनी और इसी तरह एक ऐसेट मैनेजमेंट कंपनी बनाने का फैसला.
बैंकिंग कारोबार के लिए इसका सीधा मतलब हुआ कि अब सरकारी बैंकों की बैलेंस शीट में जो भी उल्टे सीधे कर्ज चढ़े हुए हैं वो वहां से बाहर होकर इधर आ जाएंगे, यानी बैंकों के खातों की सफाई हो जाएगी. और उसके बाद इन सरकारी बैंकों में से कोई दो बैंक बेचने की भी तैयारी है. नाम अभी सामने नहीं आए हैं. लेकिन अब इन दोनों खबरों के बाद बैंकों का शेयर खरीदना तो फायदे का सौदा हो गया.
सोने पर सुहागा था इंश्योरेंस कंपनियों में विदेशी निवेश की सीमा 49% से बढ़ाकर 74% करने का एलान. अब इंश्योरेंस कंपनियों में तेजी का बहाना मिल गया. इसी तरह की खबरें सीमेंट और स्टील के लिए भी आ गईं.
पिछले पूरे हफ्ते की गिरावट के बाद बजट से पहले ही सेंसेक्स और निफ्टी में तेज़ी दिखने लगी थी. लेकिन बजट के बाद तो वो हुआ वो पिछले बाईस साल में नहीं हआ था. सेंसेक्स में पांच परसेंट और निफ्टी में पौने पांच परसेंट का उछाल. इस तेज़ी में एक बड़ा हिस्सा इस बात का भी रहा कि सरकार ने कोविड के नाम पर कोई नया टैक्स, सेस, या सरचार्ज नहीं लगाया.
यह तो रही वजह कि बाज़ार और उद्योग इस बजट का स्वागत क्यों कर रहे हैं और क्यों उन्हें वित्तमंत्री की हिम्मत और साफगोई इतनी पसंद आई.
मिडिल क्लास निराश
मगर इस बजट ने जिस बिरादरी को सबसे ज्यादा निराश किया वो है मिडिल क्लास. उसे तो उम्मीद थी कि ऐसे में सरकार उन्हें टैक्स में राहत देगी और हो सकता है कि कुछ और भी मिल जाए. यही वो बिरादरी है जिसकी शिकायत रही है कि कोरोना संकट का असर तो उनपर भी हुआ लेकिन सरकार की तरफ से राहत के जो भी कदम उठाए गए उनमें इन्हें कुछ मिला नहीं.
हालांकि साथ में यह आशंका भी थी कि कहीं कोरोना के नाम पर कोई नया टैक्स या सरचार्ज न लग जाए. लेकिन कुल मिलाकर यहां निराशा ही है. और जिन्होंने बारीकी से नहीं पढ़ा वो यह जानकर और निराश बल्कि नाराज़ भी हो सकते हैं कि अब प्रॉविडेंट फंड में अगर सालाना ढाई लाख रुपए से ऊपर की रकम जमा हुई तो उसपर मिलनेवाला ब्याज अब टैक्स फ्री नहीं रहेगा. 75 साल से ऊपर के बुजुर्गों को रिटर्न भरने की छूट में भी शर्त लगी हुई है और उसपर भी टैक्स तो बैंक में ही कट जाएगा.
निराश तो किसान भी हैं. नौकरी की उम्मीद लगाए बैठे या पिछले साल बेरोजगार हुए नौजवान भी हैं. और छोटे मझोले कारोबारियों के लिए जो हुआ हालांकि सरकार जो खर्च कर रही है उससे रोजगार और मांग दोनों बढ़ने की उम्मीद है. लेकिन उसमें वक्त लगेगा. और भी अनेक एलान हैं जिनका फायदा हो सकता है, लेकिन सवाल है कि होगा या नहीं होगा.
एक और मायने में बजट की तारीफ हो सकती है कि वित्तमंत्री ने आसमान से तारे तोड़ लाने जैसा कोई वादा नहीं किया है. ग्रोथ रेट या फिस्कल डेफिसिट का आंकड़ा भी ऐसा ही रखा है जो होना संभव दिखता है.
लेकिन अब सवाल यह है कि जितना कहा है उतना भी हो पाएगा क्या? और अगर नहीं हुआ तो कितनी बड़ी मुसीबत खड़ी हो सकती है. खासकर सरकारी कंपनियों के शेयर और बाकी संपत्ति बेचकर पैसा जुटाने के मामले में अभी तक का रिकॉर्ड बहुत हिम्मत नहीं देता.
लेकिन फिर एक उम्मीद बाकी भी है. प्रधानमंत्री ने बताया ही था कि पिछले बजट से अब तक पांच मिनी बजट आए.तो आगे फिर ज़रूरत पड़ी तो ऐसा करने से सरकार को कौन रोक सकता है?
वित्तमंत्री ने अपने भाषण में बांग्ला, तमिल और कश्मीरी की कविताएं सुनाईं. एक दोहा है जो उनके भाषण की शुरुआत में भी फिट हो सकता था और अंत में भी.
-हारिए न हिम्मत, बिसारिये न हरिनाम,
-रहिए वहि विधि जहि विधि राखे राम
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