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पश्चिम बंगाल में चुनावी हिंसा का सच - ग्राउंड रिपोर्ट
- Author, अपूर्व कृष्ण
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, उत्तर 24 परगना, पश्चिम बंगाल से
पश्चिम बंगाल में इन दिनों शायद ही कोई ऐसा दिन गुज़रता है जब राजनीतिक हिंसा की कोई ख़बर ना सुनाई देती हो, कि फ़लां जगह पर किसी पार्टी दफ़्तर पर हमला हो गया, कि किसी जगह समर्थक आपस में भिड़ गए, फिर राजनीतिक बयानों का सिलसिला शुरू हो जाता है.
अधिकतर घटनाएँ छोटी झड़पों की होती हैं, लेकिन कुछ सालों में कुछ बड़ी घटनाएँ बड़ी सुर्खियाँ बनीं.
पिछले साल 13 जुलाई 2020 को उत्तर दिनाजपुर ज़िले में हेमताबाद क्षेत्र के विधायक देवेंद्र नाथ रॉय की लाश बीच बाज़ार में फंदे से लटकी मिली. 2016 में सीपीएम के टिकट पर चुने गए रॉय पाला बदल बीजेपी में चले गए थे. बीजेपी आरोप लगाती है कि तृणमूल कांग्रेस ने उनकी हत्या की, तृणमूल इसे आत्महत्या का मामला बताती है.
वहीं 9 फ़रवरी 2019 को नदिया ज़िले की कृष्णागंज सीट से तृणमूल कांग्रेस के विधायक सत्यजीत बिस्वास पर सरस्वती पूजा के एक कार्यक्रम में दिन-दहाड़े गोलियां चलाई गईं.
कुछ महीने पहले 4 अक्तूबर 2020 को कोलकाता के पास उत्तर 24 परगना ज़िले के टीटागढ़ शहर में बीजेपी के एक स्थानीय युवा नेता मनीष शुक्ला को सरेआम गोलियों से छलनी कर दिया गया.
थाने से महज़ 50 मीटर दूर हुई इस हत्या के लिए भी तृणमूल कांग्रेस पर आरोप लगा क्योंकि मनीष पहले टीएमसी के पार्षद थे.
2018 के मई महीने में पुरुलिया ज़िले में बीजेपी कार्यकर्ता त्रिलोचन महतो की लाश पेड़ से लटकी मिली थी, साथ ही उसके कपड़े पर एक संदेश भी लिखा मिला था.
गृह मंत्री अमित शाह ने तब इस घटना को लेकर ट्वीट किया था.
पिछले महीने 10 दिसंबर की घटना भी सुर्खियों में आई जब कोलकाता में भारतीय जनता पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा और पार्टी के पश्चिम बंगाल प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय के काफ़िले पर हमले की ख़बर आई.
बीजेपी ने इसे 'गुंडाराज' क़रार दिया तो ममता बनर्जी ने इसे 'नौटंकी' का नाम दिया.
प्रदेश में आए दिन हिंसा की घटनाओं का सिलसिला जारी है, बयानों में बांग्ला भाषा का एक शब्द यहाँ बार-बार सुनाई देता है - संत्रास - जिसका मतलब है, आतंक, दहशत. और इन्हीं ख़बरों से जन्मे माहौल में ऐसी एक तस्वीर उभरकर आ रही है कि पश्चिम बंगाल में आतंक का माहौल है.
हिंसक झड़पें
2021 के विधानसभा चुनाव से पहले पश्चिम बंगाल में हिंसा का जो सिलसिला जारी है उसमें कुछ बातें बिल्कुल साफ़ हैं.
सबसे पहली बात ये कि इस बार संघर्ष के ज़्यादातर मामलों में सत्ताधारी तृणमूल कांग्रेस और उनको चुनौती दे रही बीजेपी के कार्यकर्ताओं और समर्थकों के बीच झड़प हो रही है.
इसकी एक बानग़ी मिलती है कोलकाता से सटे उत्तर 24 परगना ज़िले में. पश्चिम बंगाल में राजनीति के नज़रिए से बेहद अहम इस ज़िले में दोनों दलों के बीच हमले भी उतनी ही शिद्दत से हो रहे हैं.
राज्य में विधानसभा की 294 सीटें हैं, और 23 ज़िलों में सबसे ज़्यादा सीटें उत्तर 24 परगना ज़िले में है जहाँ से 33 विधायक चुने जाते हैं.
बैरकपुर भाजपा के अध्यक्ष और एडवोकेट रवींद्रनाथ भट्टाचार्य बताते हैं कि अकेले बैरकपुर लोकसभा क्षेत्र में हाल के समय में उनकी पार्टी से जुड़े पाँच नेताओं और कार्यकर्ताओं की हत्याएँ हो चुकी हैं, और पूरे ज़िले में कम-से-कम 30 हत्याएँ हो चुकी हैं.
रवींद्रनाथ भट्टाचार्य बताते हैं, "हिंसा का शिकार होने के बावजूद हमारी ही पार्टी के लोगों के ऊपर लगभग 500 मामले दायर किए गए हैं जिनमें बैरकपुर के सांसद अर्जुन सिंह के ख़िलाफ़ 73 और वरिष्ठ पार्टी नेता मुकुल रॉय के ख़िलाफ़ 23 मामले दर्ज हैं. बीजेपी ने भी टीएमसी के ख़िलाफ़ हज़ार से ज़्यादा मामले दर्ज करवाए हैं पर उनपर कुछ नहीं हो रहा."
बैरकपुर के बीजेपी सांसद अर्जुन सिंह बताते हैं कि उनपर पिछले दो साल में दो बार हमले हुए.
चार मर्तबा भाटपाड़ा सीट से टीएमसी के विधायक रहे अर्जुन सिंह ने 2019 के चुनाव से पहले पाला बदल लिया था और फिर बीजेपी के टिकट पर बैरकपुर के सांसद बने.
अर्जुन सिंह के सांसद बनने के बाद उनकी विधानसभा सीट से उनके ही बेटे पवन सिंह विधायक निर्वाचित हुए.
अर्जुन सिंह आरोप लगाते हैं कि उनपर हमला तृणमूल कांग्रेस ने किया, तो तृणमूल कांग्रेस के नेता ऐसा ही आरोप उनपर लगाते हैं.
भाटपाड़ा में तृणमूल कांग्रेस के चेयरमैन धर्मपाल गुप्ता आरोप लगाते हैं कि चुनावों के नतीजे आने के बाद अर्जुन सिंह और उनके लोगों ने जमकर हंगामा किया और लंबे वक़्त तक उनके इलाक़े में अशांति रही.
वहीं उत्तर 24 परगना युवा तृणमूल कांग्रेस के उपाध्यक्ष गोपाल राउत बताते हैं कि उनके घर पर एक रात बम फेंका गया और उनपर हमला भी हुआ. वो इस हमले के लिए अर्जुन सिंह को ज़िम्मेदार ठहराते हैं क्योंकि वो उनके साथ ही बीजेपी में चले गए थे लेकिन कुछ समय बाद फिर टीएमसी में लौट आए.
गोपाल राउत कहते हैं, "हम लोग उनके लिए एक बहुत बड़ा पिलर (आधार) थे, उनको छोड़ देने से उनको लगता है कि हम बहुत कमज़ोर हो जाएँगे तो वो हम पर हमला करवाए."
बैरकपुर में बीजेपी और टीएमसी के बीच झड़पों की इन ख़बरों से पश्चिम बंगाल की हिंसा की एक और तस्वीर साफ़ होती है कि ये केवल आम समर्थकों के बीच होनेवाली राजनीतिक हिंसा भर नहीं है.
ख़ुद अर्जुन सिंह कहते हैं, "उत्तर 24 परगना ज़िला कहीं ना कहीं हिंसा से जुड़ा रहा है, यहाँ संगठित अपराध होते हैं, यहाँ के औद्योगिक इलाक़ों में अगर कोई किसी पर हमला करता है तो लोग जवाब भी देते हैं, और वहीं इसके बॉर्डर वाला इलाक़ा स्मगलिंग का इलाक़ा है जहाँ टीएमसी ने स्मगलरों को ही नेता बना दिया है, मगर सीपीएम के ही ज़माने से पूरे बंगाल की सरकार उत्तर 24 परगना से ही चलती थी."
राजनीति और अपराध
राज्य विधानसभा में नेता विपक्ष और कांग्रेस पार्टी के अनुभवी नेता अब्दुल मन्नान बताते हैं कि हिंसा की असल वजह ये है कि बंगाल की राजनीति में अब अपराधियों का दख़ल हो चुका है.
अब्दुल मन्नान कहते हैं, "पिछले 10-15 सालों में अपराधियों ने देखा कि मकान तोड़ेंगे तो पुलिस पकड़ लेगी, हम बिजली का तार काटेंगे तो पुलिस पकड़ लेगी, तो नेता बन जाने से हम चोरी भी कर सकते हैं, और पुलिस भी सलाम ठोकेगी, तो ऐसे में राजनीति कमाई का एक ज़रिया बन गई है."
वो कहते हैं कि सत्ता में रहना लूट से जुड़ चुका है और 'अपराधी अगर राजनीति में आएँगे तो क्या वो हारने के लिए तैयार होंगे?'
वहीं बैरकपुर सीट से 2019 का लोकसभा चुनाव लड़ने वाली सीपीएम नेता गार्गी चटर्जी कहती हैं कि एक-दूसरे पर हमलों का आरोप लगाने वाले बीजेपी-तृणमूल के नेता वास्तव में एक ही जैसे हैं.
गार्गी कहती हैं,"बैरकपुर इंडस्ट्रियल एरिया है जहाँ पहले अर्जुन सिंह तृणमूल के साथ रहकर दादागिरी करते थे, अब बीजेपी के साथ करेंगे. थोड़ा बहुत गुंडागर्दी पहले सभी राज्यों में होता था पर तृणमूल सरकार आने के बाद हिंसा इतनी बढ़ गई कि उसकी चर्चा बाहर भी होने लगी है ".
कोलकाता स्थित वरिष्ठ पत्रकार निर्माल्य मुखर्जी कहते हैं कि राजनीतिक हिंसा की मूल वजह पार्टियों की अंदरूनी गुटबाज़ी है और उत्तर-24 परगना में सीपीएम के साथ भी यही हुआ था.
निर्माल्य मुखर्जी कहते हैं,"अगर आप ये समझ रहे हैं कि ये बीजेपी के साथ टीएमसी की लड़ाई है, तो ये बात नहीं है, ये तृणमूल के अंदर तृणमूल की लड़ाई है, उनके साथ जो बीजेपी में जा रहा है, और बीजेपी के अंदर बीजेपी की लड़ाई है, जो तृणमूल में जा रहा है".
राजनीतिक हिंसा और बंगाल
वैसे बंगाल में राजनीतिक हिंसा का अपना एक इतिहास रहा है. आज़ादी के बाद लगभग दो दशक तक राज्य में कांग्रेस का शासन रहा. मगर 60 के अंत और 70 के शुरुआती दशक में राज्य में वामपंथ का प्रभाव बढ़ने लगा. उस दौर में यहां उग्र वामपंथियों ने सरकार के ख़िलाफ़ हथियार उठा लिए.
राज्य के दार्जिलिंग ज़िले के नक्सलबाड़ी गाँव में 1967 में आदिवासी किसानों ने कम्युनिस्टों की अगुआई में हथियार उठा लिए और फिर अगले कई वर्षों तक राज्य के गाँवों से लेकर कोलकाता शहर तक में खून-ख़राबा होता रहा. नक्सल विद्रोह के बाद नक्सल और नक्सलाइट शब्द सरकार के ख़िलाफ़ बंदूक उठाने वालों के लिए इस्तेमाल होने लगा.
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1972 में सिद्धार्थ शंकर रे की अगुआई में कांग्रेस की सरकार बनी और इसके बाद हिंसा और बढ़ी. आख़िरकार 1977 में वाम मोर्चे ने ऐतिहासिक जीत हासिल की और फिर अगले 34 सालों तक वो सत्ता में रहे.
अब्दुल मन्नान मौजूदा समय की राजनीतिक हिंसा की तुलना उस दौर की हिंसा से करने को सही नहीं मानते.
वो कहते हैं,"70 के ज़माने में जो लड़ाई थी वो विचारधारा की लड़ाई थी, उसमें लोग विचारधारा के लिए अपनी जान देने के लिए तैयार थे, पैसे के लिए नहीं."
वाम मोर्चा और राजनीतिक हिंसा
वामपंथी पार्टियों ने 60 और 70 के दशक में कांग्रेस पर राजनीतिक हिंसा के आरोप से जन्मे असंतोष के बीच सत्ता हासिल की थी मगर एक वक़्त आया जब उन्होंने ख़ुद को ऐसी ही स्थिति में घिरा हुआ पाया.
2007-8 में बुद्धदेव भट्टाचार्य के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने नंदीग्राम और सिंगुर में उद्योगों के लिए ज़मीनों के अधिग्रहण की कोशिश की जिसे लेकर विवाद भड़का. नंदीग्राम में पुलिस की गोली से 14 प्रदर्शनकारियों की जान गई और वाम मोर्चा सरकार की भारी आलोचना होने लगी.
ममता बनर्जी ने वाम सरकार के ख़िलाफ़ उपजे असंतोष को राजनीतिक आंदोलन की शक्ल दी और आख़िरकार 2011 में वाम मोर्चा की 34 साल पुरानी सत्ता को उखाड़ फेंका.
लेकिन इसके बाद भी हिंसा का दौर थमा नहीं है, राज्य में हर चुनाव के दौरान हिंसा की ख़बर आती है.
दो महीने पहले गृह मंत्री अमित शाह ने आरोप लगाया था कि देश में राजनीतिक हत्याओं के चार्ट में पश्चिम बंगाल सबसे ऊपर है लेकिन पश्चिम बंगाल सरकार 2018 के बाद से नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो को आँकड़े नहीं दे रही.
इसके एक महीने बाद ममता बनर्जी सरकार ने दावा किया कि तृणमूल सरकार के शासन में राज्य में राजनीतिक हत्याएँ कम हुई हैं.
पार्टी ने एनसीआरबी के आँकड़ों के हवाले से राष्ट्रपति को एक ज्ञापन में लिखा कि 2001 से 2011 के बीच वाममोर्चे के कार्यकाल में राज्य में 663 राजनीतिक हत्याएँ हुई थीं, 2011 से 2019 के बीच टीएमसी की सरकार में ये आँकड़ा घटकर 113 आ गया.
तृणमूल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और सांसद सौगत राय का कहना है कि पश्चिम बंगाल में हिंसा को बढ़ा-चढ़ाकर पेश किया जा रहा है.
वो कहते हैं, "कुछ घटनाएँ घट रही हैं क्योंकि बीजेपी के जो इतने नेता बाहर से आ रहे हैं उससे उनके कार्यकर्ता कुछ ज़्यादा ही उत्साहित हो जाते हैं, इससे तृणमूल के लोग रिऐक्ट करते हैं, तो हिंसा की कुछ घटनाएँ घटती हैं, लेकिन चुनाव के समय हिंसा नहीं होगी."
'हमारा तो बस नुक़सान ही नुक़सान'
मगर राजनीति और राजनीतिक हिंसा के शोर-शराबे के बीच कई ऐसे लोग मिलते हैं जिनके लिए ये सब एक ख़बर भर नहीं है.
बीजेपी के एक समर्थक तापस सरकार बताते हैं कि पिछले साल कुछ तृणमूल समर्थकों ने उनपर हमला किया और ये ख़बर सुनकर उनकी मां चल बसी.
सरकार बताते हैं, "मां को डर था कि मेरा बेटा बीजेपी का समर्थक है तो कुछ हो सकता है, इसलिए जब हमले की ख़बर आई तो वो बर्दाश्त नहीं कर पाई, ख़बर सुनने के बाद उन्हें स्ट्रोक हुआ और वो अस्पताल ले जाने से पहले ही चल बसीं".
उत्तर 24 परगना में बीजेपी के स्थानीय युवा नेता और पार्षद मनीष शुक्ला की हत्या हाल के समय में हुई सबसे बड़ी राजनीतिक हत्या बताई जाती है. इस हत्या के बाद पश्चिम बंगाल में कई दिनों तक भारी विरोध-प्रदर्शन हुआ था.
उनकी हत्या की ख़बर उनके पिता डॉक्टर चंद्रमणि शुक्ला को टीवी से मिली.
वो बताते हैं कि अपने बेटे की लोकप्रियता का अंदाज़ा उनको उसके नहीं रहने के बाद हुआ.
डॉक्टर शुक्ला कहते हैं, "कारण जो भी रहा हो उसकी हत्या का, मगर हमारा तो सारा संसार ही ख़त्म हो गया, वो मेरा इकलौता लड़का था, उसकी दो बेटियाँ हैं, एक 11 साल की, एक 4 साल की. तो हमारा तो पूरा परिवार ही बिखर गया.
"अब राजनीति से किसे फ़ायदा है, किसे नुक़सान, इससे तो मुझे मतलब नहीं, लेकिन मेरा तो नुक़सान ही नुक़सान हो गया. एक पिता को अपने पुत्र को कंधे पर ले जाना पड़े, इससे बड़ा नुक़सान और क्या हो सकता है."
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