स्वदेशी तेजस लड़ाकू विमान की राह तक रही वायु सेना, क्या है ख़ासियत?

    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

सिंगल इंजन वाला तेजस लड़ाकू विमान पूरी तरह से स्वदेशी है और इसकी एक खेप भारतीय वायु सेना को 2024 में मिल जाने की संभावना है.

इसकी निर्माता कंपनी यानी हिंदुस्तान एयरोनौटिक्स लिमिटेड (एचएएल) और भारतीय वायु सेना के बीच इन नए 'फोर ऐंड हाफ़ जेनरेशन' के हलके लड़ाकू विमान यानी 'लाइट कॉम्बैट एयरक्राफ्ट' के उत्पादन को लेकर मार्च महीने में समझौता हो जाएगा.

जानकार बताते हैं कि तीन साल पहले ही वायु सेना ने एचएएल को तेजस विमानों के लिए आदेश दिया था जिसके तहत कई तेजस विमानों को वायु सेना के लड़ाकू बेड़े में शामिल भी किया गया.

रक्षा मामलों के विशेषज्ञ अजय शुक्ला के अनुसार रक्षा मंत्रालय को एचएएल के साथ इसके उत्पादन को लेकर अनुबंध करने में तीन साल से ज़्यादा का समय लग गया.

उनके अनुसार मंत्रालय ने एचएएल को वर्ष 2017 के दिसंबर माह में आवश्यकता की स्वीकृति यानी 'अक्सेपटेंस ऑफ़ नेस्सिसिटी' प्रदान की. ये कुल 83 विमानों के लिए थी.

क्या कहते हैं एक्सपर्ट?

रक्षा उत्पादन के सबसे बड़े लोक उपक्रम यानी एचएएल ने वर्ष 2018 के मार्च महीने में इसकी निविदा सरकार को सौंपी. अजय शुक्ला के अनुसार पिछले दो सालों से सरकार और एचएएल के बीच तकनीक और क़ीमत को लेकर बातचीत होती रही.

अजय शुक्ला का कहना है कि ये विमान भारत का पहला स्वदेशी लड़ाकू विमान है जिसमें पचास प्रतिशत से ज़्यादा कलपुर्ज़े भारत में ही निर्मित हैं. उनका कहना है कि जब तक पूरी खेप तैयार होने के स्थिति में आएगी, इस विमान में स्वदेशी कलपुर्ज़ों का प्रतिशत 60 तक पहुँच जाएगा.

भारत के रक्षा मंत्रालय से इस सम्बन्ध में जारी किए गए एक बयान में कहा गया कि कुल मिलाकर 83 हलके लड़ाकू विमान का ऑर्डर दिया गया है जिसमें 73 तेजस मार्क-1ए और 10 तेजस मार्क-1ए (ट्रेनर) या प्रशिक्षण विमान हैं. मंत्रालय का कहना है कि पूरी खेप की क़ीमत 45,696 करोड़ रुपये है.

शुक्ला के अनुसार एक तेजस मार्क 1ए लड़ाकू विमान की क़ीमत 550 करोड़ रुपये है जो सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमान से 120 करोड़ रुपये ज़्यादा है. सुखोई विमानों का उत्पादन भी एचएएल ही करती है.

भारतीय वायु सेना के सेवानिवृत विंग कमांडर केटी सेबेस्टियन टेस्ट पायलट और ग्रुप कैप्टन भी रह चुके हैं. बीबीसी से वह कहते हैं कि भारत सरकार ने तेजस मार्क-1ए विमानों को ख़रीदने में काफ़ी देर कर दी है जबकि इसकी आवश्यकता वायुसेना को बहुत सालों से थी.

उनका कहना है कि तेजस मार्क-1ए, सुखोई-30 एमकेआई लड़ाकू विमान से इसलिए भी महँगा है क्योंकि इसमें कई आधुनिक उपक्रम जोड़े गए हैं जैसे इसराइल में विकसित रडार.

"इसके अलावा इस विमान में स्वदेश में विकसित किया हुआ रडार भी है. विमान हल्का है और इसकी मारक क्षमता भी अच्छी है. ये बहुआयामी लड़ाकू विमान है."

गोरखा रेजिमेंट से सेवानिवृत हुए कर्नल संजय श्रीवास्तव कहते हैं कि अभी तक वायु सेना के बेड़े में मौजूद मिग-21 लड़ाकू विमानों को एक-एक कर हटा देने का वक़्त आ गया है. ये सब चालीस साल पुरानी तकनीक के बने हुए विमान हैं.

क्यों है तेजस सुखोई से बेहतर?

सेवानिवृत कर्नल संजय श्रीवास्तव कहते हैं कि तेजस लड़ाकू विमान सुखोई लड़ाकू विमानों से हल्के हैं और ये आठ से नौ टन तक बोझ उठा सकते हैं. इसके अलावा ये ध्वनि की गति यानी मैक 1.6 से लेकर 1.8 तक की तेज़ी से उड़ सकते हैं, वो भी 52 हज़ार फ़ीट की ऊंचाई तक.

तेजस में जिस नई तकनीक का इस्तेमाल किया गया है वो है- क्रिटिकल ऑपरेशन क्षमता के लिए 'एक्टिव इलेक्ट्रॉनिकली-स्कैन्ड रडार' यानी इलेक्‍ट्रॉनिक रूप से स्‍कैन रडार, बियांड विजुअल रेंज (BVR) मिसाइल, इलेक्‍ट्रानिक वारफेयर सुइट और एयर टू एयर रिफ़्यूलिंग की व्यवस्था.

ये विमान दूर से ही दुश्मन के विमानों पर निशाना साध सकता है और दुश्मन के रडार को भी चकमा देने की क्षमता रखता है. ये विमान उतने ही हथियार और मिसाइल लेकर उड़ सकता है जितना इससे ज़्यादा वज़न वाला सुखोई विमान.

रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का कहना था कि एचएएल ने पहले से ही नासिक और बेंगलुरु में लड़ाकू विमानों के निर्माण के लिए अतिरिक्त व्यवस्था तैयार कर ली है ताकि तय समय सीमा के अंदर ही इन विमानों के डिलीवरी वायु सेना के लिए हो सकें.

इस बारे में सेवानिवृत एयर वाइस मार्शल मनमोहन बहादुर ने एक पत्रिका में अपने विचार व्यक्त करते हुए कहा कि अब सारा दारोमदार एचएएल और एरोनौटिकल डेवलपमेंट एजेंसी यानी एडीए पर है कि वो पुरानी ग़लतियों को न दोहराए और समय पर इन विमानों की डिलीवरी दे.

उनका कहना है कि ऐसे समय में जब भारतीय वायु सेना के बेड़े में लड़ाकू विमानों की कमी हो रही है, इस घोषणा का स्वागत होना चाहिए. साथ ही उनका कहना है कि चूँकि स्वदेशी कम्पनियाँ ही इसके कलपुर्ज़े बनाएंगी, इससे बड़े पैमाने पर रोज़गार का सृजन होगा.

मनमोहन बहादुर के अनुसार तेजस विमानों की इस परियोजना की नींव 1983 में ही रखी गयी और तब इसकी कुल लागत 560 करोड़ रुपये ही थी. अगले दो दशकों में लागत कहीं से कहीं पहुँच गई.

उनका कहना है कि तेजस का जो सैंपल तैयार किया गया, उसने अपनी पहली उड़ान 2001 के जनवरी में भरी. लेकिन सारी औपचारिकताओं को पूरा करने के बाद इस विमान को भारतीय वायु सेना के स्क्वाड्रन में 2016 में ही शामिल किया जा सका. हालाँकि इसकी अंतिम औपचारिकता बीते वर्ष ही पूरी हो पाई.

मनमोहन बहादुर मानते हैं कि इस बार ऐसा नहीं हो तो बेहतर है और उम्मीद भी की जा रही है कि इस बार तेजस लड़ाकू विमानों की खेप समय से वायु सेना को सौंप दी जाएगी.

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