भारत-ऑस्ट्रेलिया मेलबर्न टेस्ट: भारत की जीत में अंपायर कॉल बन सकता था विलेन

सचिन गावस्कर

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    • Author, वी. कुमार
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

मेलबर्न टेस्ट में भारत की जीत को संजय मांजरेकर ने ऐतिहासिक जीत बताया है. ऐतिहासिक इसलिए क्योंकि पिछले मैच में 36 रन पर ऑल आउट होकर टीम इंडिया ने सबसे कम स्कोर का शर्मनाक रिकॉर्ड बनाया था. इसके बाद शानदार वापसी कर जीत हासिल करना भारतीय टीम के लिए एक बड़ी उपलब्धि है जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा. लेकिन अंपायरों के कुछ फ़ैसलों ने मैच का रंग बदल ही दिया था, अगर भारतीय गेंदबाज़ लगातार ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ों की परीक्षा नहीं लेते तो हो सकता है मैच की नतीजा कुछ और हो जाता.

दरअसल मेलबर्न टेस्ट ने अंपायर के फ़ैसलों में डीआरएस की भूमिका को एक बार फिर विवाद के घेरे में ला खड़ा किया है. मेलबर्न टेस्ट के तीसरे दिन अंपायरों के कम से कम दो डीआरएस फ़ैसले ‘अंपायर्स कॉल’ की वजह से विवादास्पद रहे. जसप्रीत बुमराह की गेंद बर्न्स के जूते से टकराई, भारत ने एलबीडब्लू की अपील की जिसे अंपायर ने नॉट आउट क़रार दिया. कप्तान अजिंक्य रहाणे ने डीआरएस लेने में देरी नहीं की. रिप्ले में गेंद लाइन में गिरते दिखी, बॉल का इंपैक्ट भी लाइन के अंदर था लेकिन गेंद स्टंप का एक किनारा छू कर जा रही थी जिसकी वजह से नॉट आउट का फ़ैसला सही ठहराया गया.

कुछ ओवरों बाद मोहम्मद सिराज ने मार्नस लांबुशान के ख़िलाफ़ एलबीडब्ल्यू की अपील की और एक बार फिर वही कहानी दुहराई गई. बल्लेबाज़ बच गए क्योंकि अंपायर का ओरिजिनल फ़ैसला नॉट आउट था. ध्यान देने वाली बात है कि अगर अंपायर ने दोनों फ़ैसले आउट का दिया होता तो रिव्यू लेने पर फ़ैसला ऑउट के पक्ष में ही जाता. इसका मतलब यह है कि विवाद के घेरे में पूरा डीआरएस सिस्टम नहीं बल्कि अंपायर्स कॉल का मसला है.

सचिन ने जताया ग़ुस्सा

मास्टर ब्लास्टर सचिन तेंदुलकर ने ऑस्ट्रेलिया में कई शानदार पारियां खेली हैं और वो बख़ूबी जानते हैं कि अगर कंगारुओं को एक मौक़ा मिलता है तो वो उसका भरपूर फ़ायदा उठाते हैं. यहां तो एक नहीं बल्कि दो-दो जीवनदान लगातार ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ों को अंपायर्सं द्वारा मिला. सचिन तेंदुलकर इन फ़ैसलों से बेहद निराश हुए और तुरंत उन्होंने ट्वीट कर कहा कि आईसीसी को डीआरएस सिस्टम और ख़ासकर अंपायर्स कॉल पर दोबारा गहरा विचार करना चाहिए.

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सचिन तेंदुलकर और कई दूसरे खिलाड़ियों का मानना है कि जब कोई टीम अंपायर के फ़ैसले के खिलाफ़ रिव्यू लेती है तो उन्हें पहले ही अंपायर के फ़ैसले पर एतबार नहीं होता. ऐसे में जब टेक्नॉलॉजी इशारा कर रही हो कि अंपायर का फ़ैसला शायद ग़लत था तो फिर उसे वापस अंपायर्स कॉल पर छोड़ देना सही नहीं है

गावस्कर भी साथ खड़े

इस मैच में एक दूसरा रोचक मोड़ भी आया जो अंपायर्स कॉल के विवाद पर रोशनी डालता है. ऑस्ट्रेलियाई बैटिंग की रीढ़ स्टीवन स्मिथ को जसप्रीत बुमराह ने पैड के पीछे से बोल्ड आउट कर दिया. स्मिथ जो लगभग ऑफ़ स्टंप पर स्टांस लेते हैं बुमराह की स्विंग करती गेंद से बीट हुए और गेंद लेग स्टंप को छूकर बेल्स गिराते हुए निकल गई. मान लीजिए की वही गेंद अगर स्मिथ के पैड्स पर लगती और अंपायर एलबीडब्ल्यू की अपील ठुकरा देते तो डीआरएस लेने पर भी स्मिथ नॉट आउट रहते. इस उदाहरण ने साफ़ कर दिया कि अगर गेंद स्टंप्स के किनारे को भी छूए तो भी बैट्समैन आउट हो सकते हैं.

सुनील गावस्कर ने भी इस विकेट का उदाहरण देते हुए सचिन तेंदुलकर की माँग का समर्थन किया है.

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लगातार विवादों में डीआरएस

इससे पहले डीआरएस के अंपायर्स कॉल पर कई पूर्व खिलाड़ी जैसे माइकल होल्डिंग, रिकी पोंटिंग और हरभजन सिंह ने भी अपनी राय रखी है कि इसे सुधारना चाहिए. आंकड़े भी अंपायर्स कॉल पर विचार करने का इशारा करते हैं. साल 2019 में 364 एलबीडब्ल्यू रिव्यू किए गए जिसमें 62 यानी की 17 प्रतिशत रिव्यू अंपायर कॉल की वजह से टर्न डाउन किए गए.

2020 में अब तक खेले गए मैचों में ये संख्या 20 प्रतिशत के आसपास आ रही है. पिछले साल इंग्लैंड और पाकिस्तान के बीच सीरीज़ में कुछ ऐसे ही फ़ैसलों के बाद माइकल होल्डिंग ने कहा था कि अगर बॉल स्टंप को क्लिप करके निकल रही है तो वो या तो सबके लिए आउट होना चाहिए या किसी के लिए भी नहीं, यहां पर अंपायर्स कॉल की भूमिका हटनी चाहिए.

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कई खिलाड़ी जैसे सचिन तेंदुलकर का ये भी मानना है कि जब फ़ैसला लेने में तकनीक की सहायता ली जाती है तो वो सौ प्रतिशत होनी चाहिए ना कि बीच का कोई रास्ता अपनाना चाहिए. टेनिस और फ़ुटबॉल जैसे खेलों में भी टेक्नॉलॉजी की मदद ली जाती है और उसपर ही पूरी निर्भरता रहती है. जैसें गेंद लाइन के बाहर है या अंदर, ये रिव्यू होने पर कैमरे से पता लगाया जाता है और जो कैमरा दिखाता है वही माननीय होता है, अंपायर या रेफ़री के कॉल की कोई भूमिका नहीं होती है.

मेलबर्न टेस्ट में जब भारतीय टीम जीत का जश्न मना रही है तो उनकी चर्चा डीआएस पर भी ज़रूर हो रही होगी. ज़ाहिर है जब गावस्कर, होल्डिंग, तेंदुलकर और पोंटिंग जैसे पूर्व खिलाड़ी डीआरएस में अंपायर्स कॉल को बदलने की बात कहते हैं तो मुमकिन है कि आईसीसी भी अपने अगले सालाना बैठक में इसपर विचार करे. क्रिकेट के नियम लगातार बदलते रहते हैं. साल 1770 से अबतक एलबीडब्ल्यू के रूल में कई परिवर्तन किए गए जो बदलते समय के साथ सही भी रहे. डीआरएस में भी बदलाव लाया जा सकता है.

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