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शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी : अदब का चाँद अब आसमां का हो गया
- Author, राना सफ़वी
- पदनाम, इतिहासकार, बीबीसी हिंदी के लिए
मौजूदा दौर के उर्दू साहित्य के बारे में मामूली जानकारी रखने वाले लोगों को मालूम होगा कि सबसे चमकदार सितारा बुझ गया है, शम्सुर्रहमान फ़ारूक़ी दुनिया से विदा हो चुके हैं.
वे कुछ समय से बीमार चल रहे थे और उन्हें चाहने वाले उनके लिए दुआएँ कर रहे थे जिनमें मैं भी शामिल थी. हम चाहते थे कि कोई चमत्कार हो जाए और फ़ारूक़ी साहब हमारा साथ छोड़कर न जाएँ, लेकिन ये न हो सका.
उनकी बेटी मेहर अफशां ने ट्वीट करके बताया कि वे आज ही अपने इलाहाबाद वाले सुंदर घर में गए थे, जहाँ से वे शांति से इस दुनिया से कूच कर गए.
1935 में उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ में जन्मे फ़ारूक़ी साहब ने अंग्रेज़ी साहित्य में एमए किया था. वे इंडियन सिविल सर्विस में थे, वे अपनी सरकारी ज़िम्मेदारियों के साथ-साथ साहित्य से भी पूरी तरह जुड़े रहे. वे शबख़ून नाम की पत्रिका का संपादन भी करते रहे.
वे अपने नज़रिए में आधुनिकतावादी थे, उर्दू साहित्य के आलोचक, विचारक, कवि और उपन्यासकार के तौर पर उनका काम दंग करने वाला है. उनके जाने के बाद भी लंबे समय तक उस विरासत की बातें होती रहेंगी, जो वे छोड़ गए हैं.
दास्तानगोई की परंपरा
उर्दू, फ़ारसी और अंग्रेज़ी पर न सिर्फ़ उनकी जबरदस्त पकड़ थी, बल्कि वे इन तीनों भाषाओं की क्लासिकल रवायत के भी माहिर थे. इलाहाबाद वाले घर की उनकी लाइब्रेरी तो किसी भी पढ़ने के शौकीन के लिए खजाने से कम नहीं है, वहाँ आपको दास्तान-ए-अमीर हम्ज़ा का पूरा सेट मिल सकता है.
उन्होंने दास्तानगोई की खत्म हो रही परंपरा को दोबारा ज़िंदा किया, उसमें नई जान फूंकी.
शम्स का मतलब सूरज होता है, वे समचुमच साहित्य के आकाश के सूरज थे, उन जैसा कद उनकी पीढ़ी में शायद ही किसी और का रहा हो.
उर्दू के किसी और रीडर की तरह मैं उनके लिखे को पढ़ने का इंतज़ार करती थी. उनसे मेरी पहली मुलाकात 2014 में एक आयोजन में हुई. यह वह दौर था जब उन्होंने अपने शानदार उपन्यास का अंग्रेज़ी अनुवाद किया था, यह उपन्यास 'द मिरर ऑफ़ ब्यूटी' के नाम से छपा था.
'कई चाँद थे सरे आसमां' एक ऐसा नॉवेल जिसे पढ़कर ग़ालिब और दाग़ के दौर के हिंदुस्तान की मुकम्मल जानकारी आपको मिलती है, उस वक्त की शायरी, लोगों का रहन-सहन, खान-पान, कला, सवारी, आम ज़िंदगी से लेकर शाही ज़िंदगी तक के ब्योरों से भरपूर यह उपन्यास आपको टाइम मशीन की तरह उस दौर में ले जाता है.
इतिहास, शायरी और मोहब्बत
मैंने उस वक्त उपन्यास पढ़कर खत्म किया था. मैंने किताब का बड़ा हिस्सा उर्दू में भी पढ़ा था. इस उपन्यास में वज़ीर खानम के चरित्र के चारों तरफ़ उनके समय, इतिहास, शायरी और मोहब्बत का बेहद सुंदर ताना-बाना बुना गया है, जो न सिर्फ़ सुंदर है, बहुत गहरा भी है.
यह वह दौर था जब मैं अनुवाद कर रही थी, जब भी मेरे मन में कोई सवाल होता तो उनसे ही पूछती, वे एक स्कॉलर के तौर पर इल्म बाँटने के मामले में बहुत दरियादिल थे, अपना भरपूर स्नेह और समय देते थे. वे हर किसी से पूरी गर्मजोशी और सच्चे लगाव के साथ मिलते थे.
मेरे लिए यह सब लिखना काफ़ी मुश्किल हो रहा है, मेरे कानों में उनकी आवाज़ गूंज रही है, वे कहते थे, "पूछ लो बेटा, पूछ लो, जब तक मैं हूँ."
उनकी आवाज़ के स्नेह, उनकी आँखों की चमक और मुस्कान को मैं महसूस कर सकती थी. वे अब इस दुनिया में नहीं हैं, यह यकीन करना मेरे लिए मुश्किल हो रहा है.
हिंदी-उर्दू की बहस
मैं उन्हें ईमेल करती थी या व्हाट्सऐप मैसेज भेजती थी और वे समय मिलते ही कॉल करते थे. मेरे एक सवाल के जवाब में उन्होंने मुझे प्यार के लिए उर्दू के 21 शब्दों की सूची भेजी— इश्क, मोहब्बत, उल्फ़त, उंस, मोह, शफ़्तगी, आशनाई, प्रीत, प्रेम....वगैरह
मैंने लिखकर पूछा कि क्या प्रीत और प्रेम हिंदी के शब्द नहीं हैं?
मैं दौलताबाद फ़ोर्ट में थी तभी उनका फ़ोन आया, उन्होंने बहुत प्यार से पूछा, "कहाँ घूम रही हो?" जब मैंने बताया तो बोले कि मैं दौलताबाद किले के बारे में तुम्हारे आर्टिकल का इंतज़ार करूँगा.
मेरे सवाल के जवाब में उन्होंने मुझे समझाया कि यह हिंदी-उर्दू की बहस नहीं है, ये शब्द अवधी और ब्रजभाषा से उर्दू में दाखिल हुए, यह उस दौर की बात है जब हिंदी उस तरह से वजूद में नहीं थी जैसे हम उसे आज जानते हैं.
भाषा के मामलों में होने वाली ढेर सारी बहसों के बीच उनकी कमी बहुत खलेगी.
अदब की दुनिया आज ग़मगीन है, लेकिन यह मेरे लिए निजी हादसा भी है. वे मेरे लिए पिता की तरह थे, मेरे जीवन में छाँव की तरह थे. यह मेरी खुशक़िस्मती थी कि मैं उन्हें जानती थी.
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