You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
हर महीने इस्तेमाल होने वाले एक अरब सैनिटरी पैड्स का कचरा जाता कहां है?
- Author, सुशीला सिंह
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
भारत में क़रीब 35.5 करोड़ महिलाएं और लड़कियां हैं जिन्हें पीरियड्स होता है. सरकार के नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे-4(एनएफ़एचएस) के अनुसार 15-24 साल की 42 फ़ीसद लड़कियां सैनिटरी पैड्स का इस्तेमाल करती हैं. अगर इन आंकड़ों में 24 साल से बड़ी उम्र की महिलाओं की संख्या जोड़ दी जाए तो पीरियड्स के दौरान पैड्स इस्तेमाल करने का प्रतिशत और बढ़ जाएगा.
हाल के वर्षों में ये देखा गया है कि देश में सरकार और स्वंयसेवी संस्थाएं पीरियड्स और उस दौरान साफ़-सफ़ाई को लेकर महिलाओं में जागरूकता लाने की लगातार कोशिश कर रही हैं.
अब तक पीरियड्स के दौरान सैनिटरी पैड्स के इस्तेमाल को स्वच्छ उपाय माना जा रहा है वहीं उसे नियमित समय पर बदलने पर भी ज़ोर दिया जाता है लेकिन इस बात पर चर्चा कम ही सुनाई देती है कि इस्तेमाल हुए सैनिटरी पैड्स के कचरे से कैसे निपटा जाए?
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर ने कहा था, ''हम देख रहे हैं कि सैनिटरी पैड्स और डायपर का उत्पाद और इस्तेमाल देश में बहुत बढ़ा है. और जिस तरह से उन्हें कूड़े में डाला जाता है, वो कूड़ा बिनने वालों के लिए ख़तरनाक है. हम 2021 से ये नियम लागू करेंगे कि जो भी सैनिटरी पैड्स के निर्माता हैं उन्हें हर सैनिटरी पैड्स को फेंकने के लिए डिग्रेडेबल (यानि जिन्हें नष्ट किया सके) बैग देने पड़ेगें.''
उन्होंने ये भी कहा था कि ये नियम लागू तो हैं लेकिन निर्माता कंपनियां इसका पालन नहीं करती हैं.
सरकार के इस क़दम को फ़ायदेमंद क़दम माना जा रहा है. अध्ययन बताते हैं कि ग्रामीण और कई शहरी इलाक़ों में जैसे झुग्गी झोपड़ी, छोटे और मध्यम शहरों में कूड़े बिनने का सटीक प्रबंधन नहीं होता. ऐसे में इस्तेमाल हुए सैनिटरी नैपकिन्स को खुले मैदानों में फेंक दिया जाता है, बहते पानी, तालाब या नदी में बहा दिया जा जाता है या फिर मिट्टी के नीचे दबा या खुले में जला दिया जाता है. कूड़ा बिनने वाले भी इस्तेमाल किए हुए पैड्स के संपर्क में आते हैं जो उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है. तो ऐसे में ये डिस्पोज़ेबल बैग इन कचरा बिनने वालों के लिए सहायक हो सकते हैं.
मैन्सट्रूएल हेल्थ एलांयस इंडिया (एमएचएआई) ने सैनिटरी पैड्स से होने वाले कचरे का आकलन किया है. इस जानकारी में उन्होंने एनएफ़एचएस-4 के सर्वे को भी शामिल किया है.
सैनिटरी पैड्स का कचरा कहां जाता है?
एमएचएआई संस्थाओं का नेटवर्क है जो माहवारी के दौरान स्वास्थ्य और स्वच्छता संबंधित विषयों पर काम करता है.
इनके आकलन के मुताबिक़ 12.1 करोड़ महिलाएं सैनिटरी पैड्स का इस्तेमाल करती हैं. अगर एक साइकिल में महिलाएं आठ पैड्स का इस्तेमाल करती हैं तो एक महीने में महिलाएं एक अरब पैड्स का इस्तेमाल करती हैं यानि एक साल में 1200 करोड़ पैड्स का इस्तेमाल होता है.
लेकिन ये कचरा कहां जाता है? सरकार, निर्माता कंपनियों को इस्तेमाल हुए सैनिटरी पैड्स को फेंकने के लिए डिग्रेडेबल बैग देने की बात कर रही है लेकिन सैनिटरी पैड्स से होने वाले कचरे के बारे में सोचना भी उतना ही ज़रूरी माना जाता हैं.
इसी संस्था के मुताबिक़ एक सैनिटरी पैड सड़ने-गलने या डिकम्पोज़ होने में 500-800 साल लेता हैं क्योंकि उसमें इस्तेमाल होने वाला प्लास्टिक नॉन- बॉयोडिग्रेडबल यानि नष्ट नहीं किया जा सकता है और जिससे वो स्वास्थय के साथ-साथ पर्यावरण के लिए ख़तरा बन जाता है.
नाइन सैनिटरी नैपकिन बनाने वाली कंपनी में चीफ़ एग्ज़ेक्यटिव ऑफ़िसर ऋृचा सिंह का कहना है कि उनकी कंपनी, सरकार के सैनिटरी पैड्स के साथ डिस्पोज़बल बैग देने के फ़ैसले के तहत ही काम कर रही है और इन्हें काफ़ी किफ़ायती दाम पर उपभोक्ताओं तक पहुँचाया जा रहा है.
वे कहती हैं कि उनकी कंपनी द्वारा दिए जा रहे डिकम्पोज़बल बैग बॉयोडिग्रेडबल हैं. वे हीट अच्छे से अब्ज़ॉर्ब करते हैं तो डिकम्पोज़ भी जल्दी होते हैं.
पैड्स में इस्तेमाल कई कॉपोनेंट्स डिकम्पोज़ नहीं होते
वे इस बात को मानते हुए कहती है, ''कई पैड्स में ऊपर और नीचे की शीट बॉयोडिग्रेडबल नहीं होती लेकिन अभी व्यावसायिक तौर पर उसका कोई हल नहीं है लेकिन इस पर सोचा जा रहा है और ये देखना होगा कि सप्लाई मैटिरियल कहां से आएगा.''
लेकिन वे इस बात की उम्मीद रखती हैं कि कंपनियां अगले दो साल में बॉयोडिग्रेडबल पैड्स उपलब्ध करवा पाएंगी.
बाज़ार में उपलब्ध ज्यादातर पैड्स सैल्युलोस, सुपर अब्ज़ॉर्बेंट पोलिमर (SAP), प्लास्टिक कवरिंग और गोंद यानि कई ऐसे अव्यव या कॉपोनेंट्स से बने होते हैं जो आसानी से सड़ते गलते या डीकम्पोज़ नहीं होते और पर्यावरण में बने रहते हैं और पानी और मिट्टी को प्रदूषित करते रहते हैं.
ऐसे सैनिटरी पैड्स जिनमें ख़ासकर SAP होता है उनको जलाने से ज़हरीले रसायन निकलते हैं जैसे डाइऑक्सिन और फ्यूरन जो कि कॉर्सिनजन या कैंसरकारी माने जाते है और स्वास्थ्य के लिए घातक होते हैं.
वहीं सरकार ने भी ब्यूरो ऑफ़ इंडियन सटैन्डर्ड के तहत सैनिटरी पैड्स के निर्माण के लिए दिए गए मानकों की समीक्षा की है जिसमें कहा गया है कि जहां ऐसे उत्पाद विकसित करने का दावा किया गया है जिनसे कंपोस्ट या खाद बन सकता है. इस उत्पाद का टेस्ट किया जाना चाहिए.
आकार इनोवेशन प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक जयदीप मंडल इस दिशा में कई वर्षों से काम कर रहे हैं और कंपोस्टिबव पैड्स बनाने वाली भारत की पहली कंपनी होने का दावा करते हैं.
क्या विकल्प हो सकते हैं?
मंडल कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार भी पा चुके हैं. वे कहते हैं कि उनकी कंपनी द्वारा निर्मित पैड्स में सारे मैटिरियल कंपोस्टिबल होतें हैं और उनके पैड्स में प्लास्टिक कवरिंग की जगह वे आलू से निकलने वाले स्टार्च इस्तेमाल करते हैं.
वे कहते हैं सैनिटरी पैड्स में इस्तेमाल होने वाला वूड पल्प अमरीका और कनाडा से आता है ऐसे में उन्होंने इसे कम करने के लिए विकल्प भी तलाशें है जिसमें केले या गन्ना से मिलने वाला फ़ाइबर, जूट और बैंबू से मिलने वाले फ़ाइबर शामिल है.
वे कहते हैं, ''पैड्स बॉयोडिग्रेडबल की जगह कंपोसटिबल होने चाहिए यानि जो खाद में तब्दील हो जाए. क्योंकि बॉयोडिग्रेडबल का मतलब होता है प्राकृतिक तौर पर नष्ट होना और ये उसमें एक दिन लेकर कई वर्ष लग सकते हैं बाज़ार में ऐसी भी कंपनियां है जिनके पैड्स ऑक्सो डिग्रेडेबल होते हैं यानि वे सूरज की किरण, यूवी किरणों, और गर्मी के कारण माइक्रो प्लास्टिक बन जाते है. ये प्लास्टिक पशुओं के लिए ज्यादा घातक हो सकता है क्योंकि वे ज़मीन से उगी हुई चीज़ों को सीधे खा जाते है जिसके कारण ये माइक्रो प्लास्टिक भी उनके पेट में चला जाता है. वहीं इंसान के शरीर में भी जा सकते हैं.''
वहीं यूरोप में ऑक्सो डिग्रेडबल उत्पादों पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है.
ऋृचा सिंह सैनिटरी पैड्स से होने वाले कचरे के उपाय के लिए डिस्पोज़बल बैग के साथ-साथ इनसिनेरेटर लगाने पर ज़ोर देती हैं.
अजिंक्य धारिया पैड केयर लैब स्टार्टअप के मालिक हैं और उन्होंने ये कंपनी 2018 शुरू की थी. वे केंद्र और महाराष्ट्र सरकार के साथ मिलकर काम कर रहे हैं.
वे सरकार के डिस्पोज़ेबल बैग देने के क़दम को सही बताते हैं लेकिन वे सैनिटरी नैपकिन से होने वाले कचरे के निपटान के लिए इनसिनेरेटर लगाने को इसका सही इलाज नहीं मानते और इसके पीछे वे वैज्ञानिक तर्क देते हैं.
इनसिनेरेटर प्लांट पर वे कहते हैं ,''उसमें वेस्ट या कचरा 800 डिग्री पर जलाया जाता है. उसमें प्लास्टिक और अन्य कचरा भी होता है. लेकिन नियमों के अनुसार इस तरह के बॉयोमेडिकल वेस्ट को इनसिनेरेटर में जाना चाहिए. उससे जो राख निकलती है उसे अलग जगह पर फेंकना चाहिए. अभी ये प्रक्रिया होनी चाहिए लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है.''
इनसिनेरेटर कितना सटीक उपाय
एमएचएआई ने भी अपनी रिपोर्ट में कहा कि सरकार ने इनसिनेरेटर का प्रबंध करने को कहा है लेकिन केंद्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड ने जो उत्सर्जन के मानक तय किए हैं वो कई बार उसे पूरा नहीं करते हैं. जो कम दाम के इनसिनेरेटर होते हैं वे कम तापमान पर कचरे को जलाते हैं और उससे जो ख़तरनाक गैस निकलती है उसका वो ठीक से प्रबंधन नहीं कर पाता.
डेवलपमेंट सलुशंस से जुड़ी तान्या महाजन भी कहती हैं ,''कई स्कूल, कॉलेजों, मॉल और बड़े होटलों में इनसिनेरेटर लगाए गए हैं. हमने अपने शोध में पाया है कि कई स्कूलों में ये सैनिटरी पैड्स के कचरे से भरे पड़े मिले. ऐसा हमने झारखड़ के रिहायशी स्कूल में देखा. ये देखा गया है कि स्मॉल स्केल इनसिनेरेटर प्रभावी नहीं होते, वो ठीक से जला नहीं पाते हैं. यहां ये भी देखना महत्पूर्ण है कि जलाने की प्रक्रिया के दौरान निकलने वाले रसायन और गैस का प्रबंधन कैसे होता है.''
अजिंक्य धारिया बताते हैं कि उनकी कंपनी स्कूल, कॉलेज, हाउसिंग सोसाइटी दफ़्तरों, आदि जगह पर पेड केयर बिन देती है जो कि सेंसर बिन होती है. जो हर शौच में रखे जाते हैं. ये बिन किसी भी तरह की बदबू, बैक्टिरीया या वायरस को भी मार देती है. जब वो भर जाता है तो कंपनी को नोटिफिकेशन आता है. वे उसे लेकर जाते हैं. उसे जलाया नहीं जाता बल्कि कैमिकल और मेकैनिकल तरीक़े से उसे प्रोसेस किया जाता है. दस मिनट के बाद उसमें से प्लास्टिक अलग हो जाता है जो दोबारा इस्तेमाल हो जाता है और उससे निकला कंपोस्ट भी इस्तेमाल हो जाता है.
वे मानते हैं कि सरकार भी इस्तेमाल हुए सैनिटरी पैड्स के कचरे की समस्या को समझ रही है और अलग-अलग क़दम भी उठा रही है.
भारत में ये अनुमान है कि क़रीब 30 से अधिक ऐसी संस्थाएं हैं जो रियूसेबल या कई बार इस्तेमाल होने वाले सैनिटरी पैड्स बना रही है. इसमें केले के फ़ाइबर, कपड़ा या बैंबू से बनने वाले पैड्स शामिल है.
जहां इससे बनाने वाले इन्हें कई सालों तक चलने, किफ़ायती और पर्यावरण को मदद देने का तर्क देते हैं वहीं पैड्स निर्माता कहते हैं कि भारत जैसे देश में महावारी पर बात करना अभी भी एक टैबू हैं तो वहां महिलाएं खुले में कैसे कपड़ा या पैड सुखा सकती हैं. वे कहते हैं कि अगर इन पैड्स को धूप न मिले और सही से न धूले और सूखे तो वो इन्फ़ेक्शन का कारण भी बन सकते हैं.
नीति आयोग में लोकनीति विशेषज्ञ उर्वशी प्रसाद भी मानती हैं कि बॉयोडिग्रेडबल पैड्स होने चाहिए और इस पर चर्चा भी हो रही है. लेकिन वे मानती हैं कि अभी कई चुनौतियां हैं. जैसे इस तरह के पैड्स बनाने के बाद बढ़ने वाला ख़र्च उसे कितना मंहगा बना देगा, कितनी महिलाएं वो ख़रीद पाएगी और वो कितने बड़े स्तर पर निर्माण हो सकेगा, वास्तविकता में उस पर कितना अमल हो सकेगा आदि.
उर्वशी का मानना है कि भारत जैसे देश में उसका स्केल बड़ा होगा ऐसे में ये काम काफ़ी चुनौतीपूर्ण हो सकता है.
उनके अनुसार पहले ये देखा जा रहा था पैड्स का ज्यादा इस्तेमाल शहरों में है लेकिन एनएफ़एचएस-4 के नए आंकडे बताते हैं कि साफ़-सफ़ाई को लेकर महिलाओं में जागरूकता आई है और वे सैनिटरी पैड्स का इस्तेमाल कर रही हैं और आगे जाकर ये आंकड़ा बढ़ेगा. ऐसे में इससे पेश होने वाली समस्या की दिशा में सरकार काम कर रही है.
वे कहती हैं, ''पहले टॉयलट की सुविधा इतनी नहीं थी. सरकार ने उस पर फ़ोकस किया. फिर धीरे-धीरे हाइजीन यानि साफ़-सफ़ाई पर बात आई और उसी में मैन्सट्रूएल हाइजीन भी शामिल है. ये विकास का एक नेच्युरल प्रोगेशन है और आप एक-एक करके आगे बढ़ते हैं. शहरों में स्वच्छता अभियान को देखते हैं उसमे वेस्ट मैनेजमेंट भी लाया गया है तो उसमें मैन्सट्रूएल वेस्ट भी शामिल है.''
तान्या महाजन भी मानती है कि सरकार की तरफ़ से डिस्पोज़ेबल बैग का क़दम अच्छा है लेकिन इसमें कंपनियों की एक बड़ी भूमिका होगी वहीं उपभोक्ताओं को भी कचरे को अलग-अलग कर के डालने की आदत सीखनी होगी.
ये कचरा किस तरह इकट्ठा होता है,लेकर जाया जाता है और वो मैनेज होता है, ये सभी बातें अहम है. इस कचरे का लैंडफ़िल में जाना ही हल नहीं है. सबको अपनी भूमिका निभानी होगी.
ये भी पढ़ें
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)