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किसान आंदोलन: कहां ‘ग़ायब’ हैं जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करने वाले तमिलनाडु के किसान
- Author, बाला सुब्रमण्यम डी
- पदनाम, बीबीसी तमिल संवाददाता
दिल्ली बॉर्डर पर चल रहा किसान आंदोलन इस वक़्त भारत में सबसे बड़ा मुद्दा बना हुआ है. इस आंदोलन को देश के अलग-अलग स्थानों से समर्थन मिलने की ख़बरें भी आ रही हैं.
नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी-एनडीए सरकार पहली बार किसी प्रदर्शन को लेकर बैकफुट पर दिख रही है.
किसानों के इस प्रदर्शन को देखते हुए कई लोग तमिलनाडु के उन किसानों को याद कर रहे हैं जिन्होंने कुछ बरस पहले राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में कई दिनों तक विरोध प्रदर्शन किया था.
'नेशनल साउथ इंडियन रिवर इंटरलिंकिंग एग्रीकल्चरिस्ट एसोसिएशन' के संस्थापक अध्यक्ष अय्याकन्नू के नेतृत्व में तमिलनाडु के किसानों ने लंबे समय तक प्रदर्शन किया था.
हालांकि उस वक़्त प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाले किसानों की संख्या कम थी लेकिन यह प्रदर्शन चर्चा में रहा था.
नाम मात्र के कपड़ों में प्रदर्शन में हिस्सा लेने वाले किसानों ने चूहे खाकर और मूत्रपान करने के तौर तरीके अपनाकर लोगों का ध्यान खींचा था.
लेकिन तब सरकार ने किसानों को बातचीत के लिए नहीं बुलाया था. उस वक़्त कहा गया था कि इन किसानों में इतना दम नहीं है कि वे सरकार को झुका पाएं, इसके अलावा अय्याकन्नू को भी बेहद अमीर किसान बताकर उनकी ख़ूब आलोचना की गई.
मौजूदा किसान आंदोलन में पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान केंद्र सरकार द्वारा बनाए गए तीनों नए कृषि क़ानूनों का विरोध कर रहे हैं, लेकिन उनकी असली चिंता अपनी फसल के लिए उचित मूल्य के भुगतान से जुड़ी है.
तमिलनाडु में किसान यूनियन मज़बूत
ख़ास बात यह है कि इसी मुद्दे पर तमिलनाडु के किसानों ने प्रदर्शन किया था, लेकिन इस बार दिल्ली के प्रदर्शन में वे कहीं दिखाई नहीं दे रहे हैं. अय्याकन्नू भी इन प्रदर्शनों से ग़ायब हैं.
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि वो कहां ग़ायब हैं और नए कृषि क़ानूनों को लेकर उनकी राय क्या है? और इन विरोध प्रदर्शन को लेकर तमिलनाडु के दूसरे किसान संगठन क्या सोच रहे हैं?
तमिलनाडु में किसानों की अपनी यूनियन है जिसकी राज्य भर में शाखाएं हैं. भारतीय किसान यूनियन की इस इकाई से बड़ी संख्या में किसान जुड़े हुए हैं. यह अखिल भारतीय किसान संघर्ष संयोजन समिति का भी हिस्सा है.
ख़ास बात यह है कि दिल्ली की सीमा पर हो रहे प्रदर्शन के आयोजन में इस समिति की अहम भूमिका है.
ऐसे में सवाल यह है कि तमिलनाडु की किसान यूनियन ने दिल्ली में चल रहे विरोध प्रदर्शन में अपने किसानों को क्यों नहीं भेजा है?
इस यूनियन के राज्य सचिव पी. शनमुगम ने बीबीसी से बातचीत में कहा, "दिल्ली में हो रहे प्रदर्शन के साथ एकजुटता दिखाने के लिए हम लोगों ने पूरे राज्य में प्रदर्शन आयोजित किए हैं. हम लोग चरणबद्ध तरीके से विरोध प्रदर्शन का आयोजन कर रहे हैं. हमारी यूनियन राज्य में क़रीब 500 जगहों पर विरोध प्रदर्शन कर चुकी है."
उन्होंने यह भी बताया कि जब दिल्ली में विरोध प्रदर्शन की योजना बन रही थी, तब यह फ़ैसला लिया गया था कि इसमें छह राज्यों (पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मध्य प्रदेश) के किसान हिस्सा लेंगे. लिहाजा, योजना के मुताबिक़ ही प्रदर्शनों का आयोजन हो रहा है.
उन्होंने कहा, "अब इसमें महाराष्ट्र के किसान भी शामिल हो चुके हैं फिर भी केंद्र सरकार ने इसे लगातार पंजाब के किसानों का प्रदर्शन बताने की कोशिश की है, लेकिन उन्हें अब दूसरे राज्यों के किसान संगठन के प्रतिनिधियों को भी बातचीत में शामिल करना पड़ रहा है."
दिल्ली की सर्दी भी वजह
पी शनमुगम ने यह भी कहा कि दिल्ली में पड़ने वाली दिसंबर की सर्दी भी एक वजह है जिसके चलते तमिलनाडु के किसान मौजूदा प्रदर्शन में शामिल नहीं हुए हैं.
उन्होंने कहा कि तमिलनाडु में इतनी सर्दी नहीं होती. लिहाजा खुले आसमान के नीचे रहना इन किसानों के लिए मुश्किल भरा हो सकता है.
जंतर-मंतर पर प्रदर्शन करके देश भर में चर्चित हुए किसान नेता अय्याकन्नू मौजूदा प्रदर्शनों से तमिल किसानों की अनुपस्थिति की कुछ और वजहें भी गिनाते हैं.
उन्होंने बताया, "दूरी एक बड़ी वजह है. ट्रेनों का भी अभाव है. हालाँकि कुछ किसानों ने जब दिल्ली के लिए निकलने की कोशिश तो पुलिस ने हमें निकलने नहीं दिया. हम 300 लोगों ने 26 नवंबर को ही दिल्ली निकलने की योजना बनाई थी. हमने रेल में 300 टिकटें बुक की, लेकिन हम सबको पुलिस ने हाउस अरेस्ट कर लिया. हमने एक टिकट के लिए 970 रुपये ख़र्च किए थे, लेकिन अंतिम मिनट में टिकट कैंसिल करने से हमें केवल 410 रुपये मिले."
अय्याकन्नू के मुताबिक़, किसानों को इससे तीन लाख रुपये से ज़्यादा का नुकसान हुआ.
उन्होंने कहा, "इसके बाद हमने त्रिची में विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया. हमने एक बार फिर से पुलिस से दिल्ली जाने की अनुमति मांगी है."
केंद्र सरकार के नए कृषि क़ानूनों को लेकर अय्याकन्नू ने कहा, "2014 में जब बीजेपी सत्ता में आई, तब तक मैं बीजेपी में ही था. 2014 के आम चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी कहा करते थे कि वे सत्ता में आएंगे तो किसानों की आय दोगुनी हो जाएगी और मोंसेंटो जैसी मल्टीनेशनल कंपनियों को भारत में प्रवेश की अनुमति नहीं होगी."
"उस वक़्त सरकार हमसे 14 रुपये प्रति किलोग्राम धान ख़रीदती थी. अगर मोदी जी उसमें दोगुनी रकम बढ़वाते तब आज यह दर 42 रुपये प्रति किलोग्राम होनी चाहिए थी. अगर वो इसे आज भी दोगुना करते तो भी किसानों को 28 रुपये प्रति किलोग्राम मिलना चाहिए था. लेकिन छह साल में प्रति किलोग्राम धान का समर्थन मूल्य सिर्फ़ चार रुपये 88 पैसा बढ़ा है. तमिलनाडु सरकार ने इसमें 70 पैसा और जोड़ा है, जिसके चलते हमें प्रति किलोग्राम धान के लिए 19.598 रुपये मिल रहा है."
अय्याकन्नू गन्ने का उदाहरण भी देते हैं. उन्होंने कहा, "2014 से पहले गन्ने का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,500 रुपये प्रति टन था. छह साल बाद यह महज 2,750 रुपये प्रति टन तक पहुंचा है. मोदी जी ने जो वादा किया था वो तो पूरा नहीं किया और ना ही नए कृषि क़ानूनों में इसका कोई ज़िक्र है. जो किसान दूसरों की ज़मीन पर खेती करते हैं, उनकी सुरक्षा की बात भी इन क़ानूनों में शामिल नहीं है."
'नए क़ानूनों से सिर्फ़ बिचौलियों का फ़ायदा'
अय्याकन्नू के मुताबिक़, नए कृषि क़ानूनों में न्यूनतम समर्थन मूल्य की बात शामिल नहीं है. लिहाज़ा, आने वाले दिनों में इसके ग़ायब होने का ख़तरा ही, किसानों के लिए सबसे बड़ी चिंता है.
अय्याकन्नू नए क़ानूनों पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, "नए क़ानूनों के तहत अगर आप निजी कंपनियों के साथ अनुबंध (कॉन्ट्रैक्ट) पर खेती करते हैं तो फसल की गुणवत्ता का फ़ैसला कंपनी करेगी. अगर फसल ख़रीदने के बाद कंपनियां क़ीमत कम कर देंगी तो किसान कहां जाएंगे?"
नए कृषि क़ानूनों के मुताबिक़, ख़रीद को लेकर विवाद के मामलों की सुनवाई सिविल कोर्ट में नहीं होगी. इन शिकायतों को राजस्व अधिकारी के पास भेजने का प्रावधान है, जिनके फ़ैसले को ज़िलाधिकारी के पास चुनौती देने की व्यवस्था होगी.
अय्याकन्नू के मुताबिक़, राजस्व अधिकारी की नियुक्ति सत्तारूढ़ दल के इशारे पर सरकार करती है, ऐसे में कंपनी के ख़िलाफ़ शिकायत पर किसानों की बात सुने जाने की संभावना बेहद कम होगी.
हालांकि, केंद्र सरकार की ओर से बार-बार कहा जा रहा है कि नए क़ानून से किसान जिसे चाहें उसे अपनी फसल बेच पाएंगे.
अय्याकन्नू कहते हैं, "सीमित संसाधनों के बल पर किसान अपना अनाज बेचने कितनी दूर जा पाएगा? नए क़ानूनों से ना तो किसानों को फ़ायदा होगा, ना ही उपभोक्ताओं को. केवल बिचौलियों को फ़ायदा मिलेगा."
बहरहाल, इस वक़्त 2,000 किलोमीटर की दूरी तय करके तमिलनाडु के किसान भले दिल्ली नहीं आ पाए हों, लेकिन वे मौजूदा किसान आंदोलन के साथ खड़े हैं.
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