कोरोना वायरस: भारत की टेस्ट और ट्रेसिंग रणनीति काम कर रही है?

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    • Author, श्रुति मेनन
    • पदनाम, बीबीसी रिएलिटी चेक

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कोरोना वायरस से देश के सबसे बुरी तरह प्रभावित राज्यों से कहा है कि वो टेस्टिंग और कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग को शीर्ष प्राथमिकता दें.

भारत में संक्रमण के रोज़ाना आ रहे मामलों में सितंबर के मध्य से कमी आई है, लेकिन इस बात की चिंता जताई जा रही है कि अलग-अलग टेस्टिंग रणनीति बीमारी के ख़िलाफ़ लड़ाई में बाधा बन सकती है.

भारत किस तरह की टेस्टिंग कर रहा है?

भारत पीसीआर टेस्ट का इस्तेमाल कर रहा है. इस टेस्ट को सबसे सटीक नतीजे देने वाला (गोल्ड स्टैंडर्ड) माना जाता है.

लेकिन इस वक़्त सिर्फ़ 60 फ़ीसद टेस्ट इस पद्धति से किए जा रहे हैं. कई राज्य - जो अपनी स्वास्थ्य नीतियों के इनचार्ज ख़ुद हैं - वो रैपिड एंटीजन टेस्ट (आरएटी) का इस्तेमाल करने लगे हैं. जो नतीजे तो जल्दी देता है लेकिन कम विश्वसनीय है.

माना जाता है कि फॉल्स निगेटिव (जहां संक्रमित लोगों की पहचान नहीं हो पाती) की वजह से आरएटी टेस्ट 50 फ़ीसद नतीजे ग़लत दे देता है, हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि ये टेस्ट वायरस हॉटस्पॉट वाले इलाक़ों में उपयोगी हो सकते हैं.

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हरियाणा की अशोका यूनिवर्सिटी में एक संक्रामक रोग विशेषज्ञ, प्रोफ़ेसर गौतम मेनन कहते हैं, 'मामले की पहचान करने की क्षमता कम संवेदनशील आरएटी टेस्ट और गोल्ड स्टैंडर्ड पीसीआर टेस्ट के सापेक्ष मिश्रण पर निर्भर करती है.'

सिर्फ़ भारत ही इस टेस्ट का इस्तेमाल नहीं कर रहा है, लगातार आ रही संक्रमण की लहरों से जूझ रहे कुछ यूरोपीय देश भी रैपिड टेस्टिंग करने लगे हैं.

क्या पूरे देश में एक समान टेस्टिंग हो रही है?

नहीं, ऐसा नहीं है.

भारत में संक्रमण की सबसे ज़्यादा मार जिस राज्य पर पड़ी है, वो है महाराष्ट्र. देश के कुल मामलों में से 17 फ़ीसद महाराष्ट्र में ही सामने आए हैं.

महाराष्ट्र की तुलना में कम आबादी वाले कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और केरल में कोरोना वायरस के सबसे ज़्यादा मामले सामने आए हैं.

लेकिन बड़ी आबादी वाले दो राज्यों - उत्तर प्रदेश और बिहार में स्थिति ऊपर लिखे राज्यों से काफ़ी बेहतर है.

यहां पुष्ट मामलों का अनुपात कम यानी 2.9 और 1.6 फ़ीसद है.

टेस्टिंग के आंकड़े बताते हैं कि बिहार और उत्तर प्रदेश (और कुछ दूसरे राज्य) में कुल टेस्ट में से 50 फ़ीसद से भी कम पीसीआर टेस्ट से हो रहे हैं. इसका मतलब है कि कई मामलों की पहचान नहीं हो पा रही है.

महाराष्ट्र में क़रीब 60 फ़ीसद टेस्ट पीसीआर टेस्ट थे (हालांकि वो राज्य की राजधानी मुंबई में रैपिड टेस्ट का इस्तेमाल बढ़ा रहे हैं.)

और तमिलनाडु राज्य में पूरी तरह से पीसीआर टेस्ट हुए हैं, इसका मतलब हो सकता है कि वहां संक्रमण के प्रसार का सबसे सटीक आइडिया मिल रहा है.

राज्यों में भी हर जगह एक समान टेस्टिंग नहीं

ऐसे सबूत मिलते हैं कि राज्य अपने ज़्यादा आबादी वाले इलाक़ों में पर्याप्त टेस्टिंग नहीं कर रहे हैं, जहां संक्रमण की दर कहीं ज़्यादा हो सकती है.

30 नवंबर तक उत्तर प्रदेश के कुल मामलों में से 13 फ़ीसद मामले राजधानी लखनऊ में मिले. हालांकि राज्य में जितने टेस्ट हुए उसके छह फ़ीसद से भी कम यहां हुए थे.

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राज्य में कानपुर ज़िले में दूसरे नंबर पर सबसे ज़्यादा मामले दर्ज किए गए, लेकिन वहां हुए कुल टेस्ट में से तीन फ़ीसद से भी कम कानपुर में हुए थे.

बिहार में भी ज़िला स्तर के डेटा में ऐसा ही ट्रेंड दिखता है. सबसे घनी आबादी वाले इलाक़ों में से एक, पटना में राज्य के कुल मामलों में से 18 फ़ीसद मामले सामने आए. जबकि राज्य के कुल टेस्ट में से सिर्फ़ तीन फ़ीसद टेस्ट पटना में हुए थे.

राज्य के दूसरे हिस्सों में इसकी तुलना में ज़्यादा टेस्ट हुए, लेकिन मामलों की संख्या अपेक्षाकृत कम रही.

केरल में एक सार्वजनिक स्वास्थ्य नीति के विश्लेषक डॉ. रिजो जॉन कहते हैं, 'जिन इलाक़ों में ज़्यादा मामले हैं, अगर आप वहां कम टेस्ट करेंगे और कम मामलों वाले इलाक़े में ज़्यादा टेस्ट करेंगे तो टेस्टिंग तो ज़्यादा दिखेगी लेकिन मामले कम दर्ज होंगे.'

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वो कहते हैं कि इससे मामलों की संख्या का डेटा थोड़ा बेमतलब हो जाता है.

बदलती निगरानी प्रणालियां

भारत की कोविड-19 पर राष्ट्रीय गाइडलाइन कहती है कि राज्यों को कम से कम 80 फ़ीसद पॉज़िटिव मामलों के कॉन्टैक्ट 72 घंटे के अंदर ट्रेस कर लेने चाहिए.

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लेकिन स्वास्थ्य और परिवार कल्याण पर भारत की संसदीय समिति ने कहा है कि "ख़राब कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग और कम टेस्टिंग कोविड के घातक रूप से बढ़ने की एक वजह हो सकती है."

कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग पर हर राज्य से विश्वसनीय जानकारी हासिल करना मुश्किल है.

हाल में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 'हाई-रिस्क कॉन्टेक्ट की जल्द और सिस्टमेटिक ट्रैकिंग करने के लिए' उत्तर प्रदेश की तारीफ़ की थी.

इसके विपरीत, कर्नाटक के आंकड़ों से पता चलता है कि सितंबर से प्राइमरी और सेकेंड्री कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग की संख्या वहां कम हुई है.

तेलंगाना राज्य के पास कोविड -19 की चपेट में आए लोगों के प्राइमरी और सेकेंड्री कॉन्टैक्ट के टेस्ट के अनुपात का डेटा मौजूद है.

टेस्टिंग की संख्या के साथ-साथ सितंबर से इस आंकड़े में भी कुछ कमी आई है.

केरल का डेटा बताता है कि चार मई से अब तक सामने आए सभी मामलों में संक्रमित लोगों के 95 फ़ीसद प्राइमरी और सेकेंड्री कॉन्टैक्ट का पता लगा लिया गया.

लेकिन किसी भी डेटासेट से ये पता नहीं चला कि क्या राष्ट्रीय गाइडलाइन के तहत दी गई समयावधि के अंदर संक्रमित व्यक्ति के 80 फ़ीसद कॉन्टैक्ट का पता लगाया गया.

और कई राज्य ये डेटा सार्वजनिक नहीं करते हैं.

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