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किसानों को मोदी सरकार पर भरोसा क्यों नहीं, कॉर्पोरेट जगत का डर क्यों
- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
हाल में पारित किये गए तीन नए कृषि क़ानूनों का विरोध करने वाले किसानों को कई आपत्तियां हैं जिनमें से एक ये है कि इन क़ानूनों की आड़ में कॉर्पोरेट जगत कृषि क्षेत्र पर हावी हो जाएगा और किसानों के शोषण का खतरा पैदा हो जाएगा.
लेकिन सच तो ये है कि कृषि क्षेत्र में कॉर्पोरेट की दुनिया की एंट्री कब की हो चुकी है. इसे देखने के लिए एक उदाहरण को समझना होगा.
सरकारी संस्था फ़ूड कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया किसानों के उत्पाद की सब से बड़ी ख़रीदार है. 23 अलग-अलग फ़सलों के ख़रीदे जाने का प्रावधान है लेकिन सरकार अक्सर केवल चावल और गेहूं ख़रीदती है.
लेकिन यह जानना दिलचस्प होगा कि देश में दूसरे नंबर पर गेहूं का ख़रीदार कौन है?
कॉर्पोरेट की दुनिया की 75,000 करोड़ मूल्य वाली कंपनी, आईटीसी ग्रुप.इसने इस साल 22 लाख टन गेहूं देश भर के किसानों से सीधे ख़रीदा है.
महिंद्रा ग्रुप भी कृषि क्षेत्र में काफ़ी अंदर तक प्रवेश कर चुका है. नेस्ले, गोदरेज और महिंद्रा जैसी निजी कंपनियां कृषि क्षेत्र में फल फूल रही हैं.
ई-चौपाल और किसान
आईटीसी ग्रुप और किसानों का आपसी रिश्ता कोई 20 साल पुराना है और इसमें मज़बूती इसकी ई-चौपाल योजना के कारण आई है.
साल 2000 में लॉन्च किया गया, ई-चौपाल मॉडल, गावों में इंटरनेट कियोस्क का एक नेटवर्क है जो औपचारिक बाज़ारों से कटे छोटे और सीमांत किसानों को वास्तविक समय के मौसम और मूल्य की जानकारी देते हैं और कृषि को बढ़ाने के लिए प्रासंगिक ज्ञान और सेवाओं को इन किसानों तक पहुँचाते हैं.
ये मॉडल काम कैसे करता है? इसका उदाहरण मैंने 2005 में देख था, उस समय जब मैं नागपुर के सोयाबीन उगाने वाले किसानों पर एक स्टोरी कर रहा था.
मैं उन गावों और मंडियों में गया था जो ई-चौपालों के अंतर्गत आते थे. मैंने देखा था कि गावों में कंप्यूटर बैठाए गए हैं और एक-दो युवा इसका इस्तेमाल करके किसानों को मौसम की जानकारी देते थे. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में सोयाबीन के रोज़ाना मूल्य की जानकारी भी देते थे.
इसके बाद मंडी में ये किसान अपना उत्पाद लेकर पहुंचते थे और आईटीसी की टीम पहले से तय हुए भाव पर किसानों का सोयाबीन खरीद लेती थी.
उस समय ये योजना नई थी और किसानों का कॉर्पोरेट जगत के साथ संपर्क भी नया था. इसलिए आईटीसी ने इस पर एक वीडियो विज्ञापन तैयार किया था जिसे कंपनी शाम को गावों में बड़े परदे पर किसानों को दिखाया करती थी. किसान भी खुश थे और कंपनी भी.
लेकिन जानकारों के मुताबिक़ ये बात सही है कि अगर कोई कंपनी इन किसानों का शोषण करना चाहे तो इसका ख़तरा पूरा मौजूद है. नए क़ानून में इसके बचाव का कोई इंतज़ाम नहीं है.
ई-चौपाल एक सफल मॉडल है, इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि अब इससे 40 लाख किसान जुड़े हैं. ये 10 राज्यों में 6100 कंप्यूटर कियोस्क के माध्यम से 35,000 गाँवों में फैला है. कंपनी की वेबसाइट के मुताबिक़ इसका लक्ष्य एक करोड़ किसानों तक पहुँचने का है.
ई-चौपाल एक तरह से आईटीसी और किसानों के बीच कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग का उदाहरण है जिसका प्रावधान नए कृषि क़ानून में है और जिसका विरोध किसान ये कह कर कर रहे हैं कि इससे "अडानी और और अंबानी" जैसे कॉर्पोरेट समूहों के कृषि क्षेत्र में प्रवेश का खतरा है.
कृषि उत्पाद में भारत बहुत पीछे
भारत में इसके कुल घरेलू उत्पाद में 17 प्रतिशत योगदान कृषि क्षेत्र का है जिसपर देश की 60 प्रतिशत आबादी निर्भर करती है. अमेरिका के बाद खेती योग्य सबसे अधिक ज़मीन भारत में है लेकिन पैदावार में भारत अमेरिका से कहीं पीछे है.
कृषि विशेषज्ञ कहते हैं इसके कई कारण है, जिनमें टेक्नोलॉजी का बहुत कम इस्तेमाल, मानसून की बारिश की अनिश्चितता और खेती से जुड़े लोगों में आधुनिक तकनीक का अभाव ख़ास हैं. दूसरा बड़ा कारण है सरकार की तरफ़ से बुनियादी ढाँचे बनाने में ज़बरदस्त ढीलापन.
भारत सरकार की इस क्षेत्र में भारी भूमिका भी आज के आधुनिक दौर के विशेषज्ञ सही नहीं मानते लेकिन उत्तर भारत के किसान सरकार की भूमिका हटाए जाने का विरोध कर रहे हैं.
अब सरकारी संस्था फ़ूड कार्पोरेशन ऑफ़ इंडिया (एफ़सीआई) का उदाहरण देखें. इस साल जून तक इसके गोदामों में 832 लाख टन अनाज (अधिकतर गेहूं और चावल) मौजूद था. सरकार इस स्टॉक को सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) द्वारा रियायती दामों पर ग़रीब जनता को बेचती है. इन्हें आम भाषा में राशन की दुकानें कहा जाता है.
खाद्य सुरक्षा या फ़ूड सिक्योरिटी
केंद्र में हर सरकार का देश की ग़रीब जनता के लिए खाद्य सुरक्षा या फ़ूड सिक्योरिटी एक बड़ी सियासी प्रतिबद्धता है. पीडीएस द्वारा बहुत ही कम दामों पर पर या इस महामारी के दौरान मुफ़्त अनाज पहुँचाना इसी का एक हिस्सा है. लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि इसके लिए एफ़सीआई में इतने बड़े भंडार की ज़रुरत नहीं है.
सरकार को पीडीएस के लिए केवल 400 लाख टन से कुछ अधिक स्टॉक की ज़रूरत है. इसका मतलब साफ़ है कि ज़रुरत न होते हुए भी सरकार को मंडियों में जाकर मिनिमम सपोर्ट प्राइस (एमएसपी) के अंतर्गत चावल और गेहूं खरीदते रहना पड़ता है. ये सरकार की सियासी मजबूरी है.
मुंबई स्थित आर्थिक विशेषज्ञ विवेक कौल कहते हैं कि एफ़सीआई द्वारा ज़रुरत से ज़्यादा अनाज ख़रीदना किसी भी तरह से सही नहीं है.
वो कहते हैं, "इसका प्रभाव ये है कि सरकार ने चावल और गेहूं खरीदने में बहुत पैसा खर्च किया. वह पैसा सार्वजनिक स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचे पर आसानी से खर्च किया जा सकता था, जिसकी भारत में बहुत कमी है."
विरोध प्रदर्शन करने वाले किसान सरकार से जारी बातचीत में ये मांग कर रहे हैं कि एमएसपी को नए क़ानून में शामिल किया जाए और मंडियों से सरकार उत्पाद खरीदती रहे. भारतीय किसान यूनियन के नेताओं ने बुधवार को इस मांग को दोहराया है.
बीबीसी को भेजे गए एक बयान में इन किसानों ने कहा है, "आज सिंघु बॉर्डर पर भाकियू के राष्ट्रीय प्रवक्ता चौधरी राकेश टिकैत, राष्ट्रीय महासचिव युद्धवीर सिंह और प्रवक्ता धर्मेन्द्र मलिक ने दूसरे किसान संगठनों से बैठक कर आंदोलन की रणनीति पर चर्चा की. बैठक में तय किया गया कि सरकार से वार्ता में सभी लोग साथ जाएंगे. सभी संगठन की आम सहमति से तय किया गया कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को क़ानून बनाये जाने और बिल रद्द करने की मांग करेंगे."
मोदी सरकार इस बात पर क़ायम है कि नए कृषि क़ानून वक़्त की ज़रूरत हैं और इनसे फ़ायदा किसानों को होगा. सरकार दबाव में ज़रूर है लेकिन इसके दावों को ज़मीनी हकीक़त से जोड़ कर देखना ज़रूरी है.
कृषि क्षेत्र में बदलाव
दरअसल कृषि क्षेत्र में पिछले दो दशकों में कई तरह के बदलाव आए हैं, जो सरकार की वजह से कम और बाज़ार की ताक़तों की वजह से ज़्यादा संभव हुआ है. नई टेक्नोलॉजी, डाटा और ड्रोन का इस्तेमाल, नयी बीज और खाद की क्वालिटी और एग्रो बिज़नेस का उदय ये सब सकारात्मक बदलाव हैं.
इन बदलाव ने कृषि क्षेत्र में निजी कंपनियों को जगह दी है. लेकिन जिस तेज़ी से बदलाव आ रहे हैं, उस तेज़ी से सरकार के ज़रिए क़ानून को आधुनिक बनाये जाने पर ज़ोर नहीं दिया जा रहा था.
कांग्रेस पार्टी के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के दौर में भी नए क़ानून लाने पर बहस ज़रूर हुई थी लेकिन इस पर अमल नहीं हुआ था. कांग्रेस पार्टी के 2019 के चुनावी घोषणा पत्र में भी नए क़ानून लाने की बात कही गई थी.
अब जब निजी कंपनियों को कृषि क्षेत्र में आने से रोका नहीं जा सकता था तो कुछ ऐसे क़ानून और नियम बनाये जाने ज़रूरी थे जिन से ये निश्चित हो कि निजी कंपनियां आम किसान का शोषण न कर सकें और आम तौर से उनकी आय बढ़े.
मोदी सरकार ने पारित किए तीन कृषि क़ानूनों में इन्हीं ज़मीनी हकीक़त से जूझने की कोशिश की है लेकिन किसानों को लग रहा है कि क़ानून को जल्दबाज़ी में पारित किया गया और इस पर किसानों के साथ चर्चा नहीं की गयी.
केरल के पूर्व विधायक और किसानों की मांग के लिए विरोध प्रदर्शन में शामिल कृष्णा प्रसाद कहते हैं कि निजी कंपनियां पहले से कृषि क्षेत्र में मौजूद हैं इस लिए सरकार को इन्हें रेगुलेट करना और भी ज़रूरी था लेकिन नए क़ानून ने इसे नियंत्रण मुक्त कर दिया है जिसके कारण किसानों के शोषण का ख़तरा और भी बढ़ गया है.
फ़िलहाल सरकार और किसान अपनी बातों पर अड़े हैं.
बीजेपी ने एक ट्वीट में कहा, "किसानों के फ़ायदे के लिए उन्हें अधिक विकल्प देने का अगर विरोध किया जा रहा है तो ये लोग किसान समर्थक हैं या किसान विरोधी? नए कृषि क़ानून के तहत किसानों को उनकी फसल मंडी के साथ ही पूरे देश में किसी को भी बेचने का अधिकार दिया गया है."
उधर क्रांतिकारी किसान यूनियन के अध्यक्ष दर्शन पाल ने मांग की है कि सरकार संसद का एक विशेष सत्र बुला कर सरकार नए क़ानून को वापस ले.
ये कहना मुश्किल है कि इसमें जीत किसकी होगी.
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