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यूपी: धोखे से धर्म परिवर्तन की साज़िश को एसआईटी ने नकारा, पर सरकार ने नहीं
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
डिस्क्लेमर: भारत के "मौजूदा क़ानून में 'लव जिहाद' शब्द को परिभाषित नहीं किया गया है. किसी भी केंद्रीय एजेंसी की ओर से 'लव जिहाद' का कोई मामला सूचित नहीं किया गया है."
रिपोर्ट की शुरुआत में इस तरह के डिस्क्लेमर का ख़ास संदर्भ है. कई राजनीतिक नेता इस शब्द का प्रयोग कर रहे हैं लेकिन ऊपर लिखा वाक्य केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी किशन रेड्डी की तरफ़ से चार फ़रवरी 2020 को लोकसभा में दिए गए एक तारांकित प्रश्न के जवाब का अंश है.
अंतरधार्मिक शादी का मामला वैवाहिक संबंध जैसे सामाजिक संस्कारों के दायरे से निकल कर अदालत और क़ानून की चौखट तक ही नहीं जा पहुँचा बल्कि इसके पीछे तमाम तरह की साज़िशों के तार भी ढ़ूंढ़ने की कोशिश की जाने लगी है.
उत्तर प्रदेश के कानपुर में इसी साज़िश का पता लगाने के लिए पिछले दिनों एक विशेष जाँच टीम यानी एसआईटी गठित की गई. एसआईटी ने ऐसी 14 शादियों की क़रीब दो महीने तक पड़ताल की जिन पर कुछ संगठनों की ओर से संदेह जताया गया था लेकिन एसआईटी को साज़िश के तार कहीं नहीं दिखे.
कानपुर ज़िले में जबरन शादी (जिसे बीजेपी लव जिहाद कहती है) के मामलों की जाँच के लिये गठित एसआईटी ने सोमवार को अपनी रिपोर्ट कानपुर के पुलिस महानिरीक्षक मोहित अग्रवाल को सौंप दी. एसआईटी ने ऐसे कुल 14 मामलों की जाँच की जिनमें 11 मामलों में अभियुक्त आपराधिक गतिविधियों में लिप्त पाए गए लेकिन किसी भी मामले में साज़िश की बात सामने नहीं आई है.
कानपुर ज़ोन के पुलिस महानिरीक्षक मोहित अग्रवाल का कहना था, "जिन 11 मामलों में एसआईटी ने पाया कि अभियुक्तों ने धोखाधड़ी करके हिन्दू लड़कियों से प्रेम संबंध बनाए, उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की गई है. बाक़ी तीन मामलों में लड़कियों ने अपनी मर्ज़ी से शादी करने की बात कही है इसलिए उसमें पुलिस ने फ़ाइनल रिपोर्ट लगा दी है."
पुलिस महानिरीक्षक मोहित अग्रवाल ने बताया कि 11 मामलों में आरोप पत्र दाख़िल किया गया है और अभियुक्तों को गिरफ़्तार कर लिया गया है. उनका कहना था, "नाबालिग़ लड़कियों को ग़लत नाम बताकर प्रेम जाल में फंसाने वाले अभियुक्तों पर बलात्कार, अपहरण और शादी के लिये मजबूर करने के आरोप भी लगाए गए हैं. शुरू में जांच के दायरे में मात्र छह मामले थे लेकिन मीडिया में मामला आने के बाद कुछ और प्रकरण सामने आए और फिर सभी की जांच एसआईटी को सौंप दी गई. एसआईटी जांच में किसी साज़िश या बाहरी फ़ंडिंग के सुबूत नहीं मिले हैं."
दरअसल, इसी साल अगस्त-सितंबर महीने में कानपुर में कुछ हिन्दूवादी संगठनों ने कथित लव जिहाद की घटनाओं को लेकर पुलिस महानिरीक्षक मोहित अग्रवाल से शिकायत की थी. इनकी जांच के लिये आईजी मोहित अग्रवाल ने आठ सदस्यीय एसआईटी गठित की थी. पुलिस महानिरीक्षक का कहना है कि पुलिस का मुख्य उद्देश्य यह है किसी भी लड़की को साज़िश के तहत न फंसाया जाए.
इस बीच, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सोमवार को कथित लव जिहाद से जुड़े एक मामले में लड़की के परिजनों की ओर से लड़के के ख़िलाफ़ दर्ज कराई गई एफ़आईआर को निरस्त कर दिया.
यूपी के कुशीनगर के रहने वाले सलामत अंसारी और प्रियंका खरवार ने पिछले साल अगस्त में शादी की थी. विवाह से ठीक पहले प्रियंका ने इस्लाम स्वीकार कर लिया था और अपना नाम बदल कर 'आलिया' रख लिया था. प्रियंका के परिजनों ने इसके पीछे साज़िश का आरोप लगाते हुए सलामत के ख़िलाफ़ एफ़आईआर दर्ज करा दी थी जिसमें उस पर अपहरण और जबरन विवाह करने जैसे आरोप लगाए थे. सलामत के ख़िलाफ़ पॉक्सो ऐक्ट की धाराएं भी लगाई गई थी.
लेकिन पूरे मामले को सुनने के बाद अदालत ने सारे आरोप निरस्त करते हुए कहा कि धर्म की परवाह न करते हुए अपनी पसंद के साथी के साथ जीवन बिताने का अधिकार, जीवन के अधिकार और निजी स्वतंत्रता के अधिकार में ही निहित है. अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि अगर दो वयस्क लोग अपनी मर्ज़ी से एक दूसरे के साथ रह रहे हैं तो इसमें किसी दूसरे व्यक्ति, परिवार और यहां तक कि सरकार को भी आपत्ति करने का अधिकार नहीं है.
यह फ़ैसला सुनाते वक्त अदालत ने अपने उन पिछले फ़ैसलों को भी ग़लत बताया जिनमें कहा गया था कि विवाह के लिए धर्मांतरण प्रतिबंधित है और ऐसे विवाह अवैध हैं. पिछले महीने ही इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने एक फ़ैसले में कहा था कि सिर्फ़ शादी के लिए धर्म परिवर्तन को स्वीकार नहीं किया जा सकता. कोर्ट ने अदालत के एक पूर्ववर्ती आदेश का उल्लेख करते हुए यह निर्णय सुनाया था.
अंतर-धार्मिक विवाहों को लेकर इस समय देश भर में बहस छिड़ी हुई है. इसका विरोध करने वालों ने मुस्लिम पुरुष और हिन्दू महिला की ऐसी शादियों को एक साज़िश बताते हुए इसे 'लव जिहाद' की संज्ञा दी है. हाल ही में उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश जैसी कई राज्य सरकारों ने भी अंतर-धार्मिक विवाहों पर नाराज़गी जताई थी और इन्हें रोकने के लिए नए क़ानून लाने की घोषणा की थी.
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने पिछले दिनों हुए विधानसभा उपचुनाव के दौरान घोषणा की थी कि इस संबंध में उनकी सरकार क़ानून बनाएगी. मंगलवार को कैबिनेट की बैठक में इस संबंध में एक अध्यादेश को मंज़ूरी दी गई. इस क़ानून के मुताबिक, अंतर-धार्मिक मामलों में शादी से पहले दो महीने की नोटिस देनी होगी और इसके लिए संबंधित ज़िले के डीएम से अनुमति लेनी होगी. बिल के मसौदे के तहत जानकारी छिपाकर या ग़लत जानकारी देकर शादी करने पर अधिकतम 10 साल की सज़ा का प्रावधान किया गया है.
लेकिन सवाल इस बात पर भी उठ रहे हैं कि क्या यह इतना गंभीर मामला है कि इसके ख़िलाफ़ क़ानून बनाया जाए और यह क़ानून इतना ज़रूरी है कि विधानसभा के सत्र का इंतज़ार न करके तत्काल अध्यादेश लाया जाए?
यूपी के पुलिस महानिदेशक रह चुके रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी विक्रम सिंह कहते हैं, "ग़ैर क़ानूनी तरीक़े से शादी करने या फिर धर्मांतरण करने के ख़िलाफ़ न जाने कितनी धाराएं हैं हमारे आईपीसी में. यह क़ानून साल 1861 में भले ही बना हो लेकिन जहां तक अपराध के बारे में आप कल्पना कर सकते हैं, वहां तक सब कुछ मौजूद है उसमें. यदि क़ानून का प्रवर्तन ठीक से नहीं हुआ तो आप उसे सुधारने की कोशिश करिए. नया क़ानून लाकर क्या होगा? पहले से मौजूद क़ानून ही नहीं सँभल पा रहे हैं तो नया लाकर क्या कर लेंगे."
विक्रम सिंह कहते हैं कि नए क़ानून में महज़ कुछेक बातें जोड़ी गई हैं जबकि अवैध धर्मांतरण या फिर शादी के लिए धर्म परिवर्तन के लिए मजबूर करने या तथ्य छिपाने जैसे अपराधों के लिए कई क़ानून पहले से ही मौजूद हैं. मसला क़ानून का नहीं, पैरवी का है.
बीबीसी से बातचीत में विक्रम सिंह कहते हैं, "निर्भया मामले को ही ले लीजिए. उसके बाद आईपीसी की धाराओं में कितने बदलाव हुए लेकिन क्या रेप की घटनाएं या उनकी वीभत्सता रुक गई. हां, रुकी होती यदि उनकी पैरवी ठीक से हुई होती, अदालत से सज़ा दिलाई गई होती. कंविक्शन के मामले लगातार घट रहे हैं. सरकार कह रही है कि हमारे पास लव जिहाद का कोई आंकड़ा नहीं है. जब आंकड़ा ही नहीं है तो क़ानून क्या बनाएंगे? अध्यादेश लाने से पहले होमवर्क तो ठीक से कर लिया होता. पहले समस्या को तो समझ लीजिए, तब उस पर क़ानून बनाइए तो ज़्यादा अच्छा रहेगा."
नए अध्यादेश में ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से धर्मांतरण कराने के जुर्म में पांच साल की सज़ा का प्रावधान है लेकिन यदि पीड़ित नाबालिग और अनुसूचित जाति-जनजाति की है तो उस स्थिति में सज़ा दस साल की होगी. विक्रम सिंह इसे ठीक नहीं मानते हैं. उनका कहना है, "क़ानून में जाति और धर्म का नाम न आए तो ही अच्छा है. क़ानून सबके लिए बराबर है और उसे तोड़ने वाले के ख़िलाफ़ एक ही सज़ा होनी चाहिए, पीड़ित चाहे जो हो."
राजनीतिक पर्यवेक्षक इस बात पर भी हैरान हैं कि आख़िर इसके लिए अध्यादेश लाने की क्या ज़रूरत थी. वरिष्ठ पत्रकार सुभाष मिश्र कहते हैं, "बीस करोड़ की जनसंख्या में साल भर में 100 केस भी नहीं आते हैं इस तरह के. तो इसके लिए क़ानून लाना ही हैरान करने वाला है, अध्यादेश तो छोड़ दीजिए. दरअसल, इसके पीछे मक़सद राजनीतिक है, सामाजिक, क़ानूनी या कुछ और नहीं. दरअसल, चुनाव में ध्रुवीकरण के लिए ऐसे क़ानून साथ दे सकते हैं. नहीं तो इसके लिए न तो कोई तर्क है, न कोई आंकड़ा है. और तो और सरकार की फ़ज़ीहत सरकार की एजेंसी ने ही कर दी है. कानपुर में एसआईटी ने ही कह दिया है कि इन मामलों में कोई साज़िश नहीं हुई है."
सुभाष मिश्र इस मामले को भी शहरों के नाम बदलने और सीएए प्रदर्शनों के दौरान की गई ताबड़तोड़ कार्रवाइयों की कड़ी में ही देखते हैं. उनका कहना है कि सरकार के इन फ़ैसलों के पीछे उद्देश्य सिर्फ़ 'संदेश देना' है, और कुछ नहीं.
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