कांग्रेस का अंतर्कलह गहराया, ग़ुलाम नबी आज़ाद की नसीहत पर अधीर रंजन चौधरी बोले- ज्ञान देना बंद करिए

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद ने एक बार फिर से पार्टी के कामकाज़ पर सवाल उठाए हैं. आज़ाद पार्टी के उन 23 नेताओं में शामिल थे, जिन्होंने अगस्त में पार्टी में सुधार के लिए लिखी गई चिट्ठी पर दस्तखत किए थे.

रविवार को उन्होंने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा कि वे लोग एक मैकेनिक की भूमिका निभा रहे थे, जो ये बताता है कि गाड़ी में क्या ख़राबी है ताकि ड्राइवर जंग लगे उस पुर्जे को हटा सके. ग़ुलाम नबी आज़ाद का कहना है कि वो चिट्ठी कांग्रेस के भीतर पार्टी की कमज़ोर पड़ती विचारधारा के मुद्दे पर जागरूकता फैलाने के लिए लिखी गई थी.

उन्होंने कहा, "इस विशाल और विविधता भरे देश में कांग्रेस की विचारधारा जो गांधी, नेहरू, सरदार पटेल और मौलाना आज़ाद की विचारधारा है, वही इस देश में एकता बनाए रखेगी. कांग्रेस धर्म, जाति और वर्ग के आधार पर भेदभाव नहीं करती है. हमारे लिए सब बराबर है."

चिट्ठी लिखे जाने के सवाल पर उन्होंने कहा कि जब हम कांग्रेस के भीतर ये भीतर ये बात लिखते हैं तो हम उन्हें ये बताते हैं कि विचारधारा कमज़ोर पड़ रही है. इस चिट्ठी में कांग्रेस के 23 नेताओं ने पूर्णकालिक और प्रभावी नेतृत्व की मांग की थी, साथ ही कांग्रेस कार्यसमिति के लिए चुनाव का भी मुद्दा उठाया गया था.

बिहार चुनावों और 11 राज्यों में हुए उपचुनावों में कांग्रेस के ख़राब प्रदर्शन के बाद इन नेताओं ने पार्टी में ठोस क़दम उठाए जाने की मांग फिर से की है.

कांग्रेस नेता ने कहा, "हम उन्हें बताना चाहते हैं कि मशीन के वो हिस्से जो इस विचारधारा को चलाते हैं, उनमें जंग लग गई है या फिर वे ढीले पड़ रहे हैं. जहां उनमें जंग लग गई है, उसे बदले जाने की ज़रूरत है और जहां वे ढीले पड़ गए हैं, उन्हें कसे जाने की ज़रूरत है."

"इसलिए हम एक मैकेनिक की तरह काम करते हैं जो जो ये बताता है कि गाड़ी में क्या ख़राबी है ताकि ड्राइवर जंग लगे उस पुर्जे को हटा सके. हम ड्राइवर से अपना काम छोड़ने के लिए और हमें ड्राइविंग का काम सौंप देने के लिए नहीं कह रहे हैं."

आज़ाद बनाम अधीर

लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने समाचार चैनल एबीपी न्यूज़ से बात करते हुए पार्टी नेतृत्व पर सवाल उठाने वाले नेताओं पर सख़्त नाराज़गी जताई और कहा कि ऐसे नेताओं को पार्टी छोड़ देनी चाहिए.

उन्होंने कहा, "नाराज़गी तो ज़रूर जताना पड़ेगा, क्या करें हमलोग, क्या बैठे-बैठे इन नेताओं का ज्ञान सुनें? हम बंगाल में मैदान में उतरे हुए हैं, हमारे कार्यकर्ता पूछते हैं कि हम तो यहाँ लड़ रहे हैं, मगर ऊपर के जिन नेताओं को कांग्रेस की मेहरबानी से नुमाइंदगी का मौक़ा मिला, अगर वो लोग कांग्रेस में रहते हुए हमारे नेता के ख़िलाफ़ या पार्टी के ख़िलाफ़ या राहुल जी के ख़िलाफ़ या आलाकमान के ख़िलाफ़ अगर इस तरीक़े से विरोध करते रहे तो हम लोगों को क्या कहेंगे?"

अधीर रंजन चौधरी ने कहा "मैं उनलोगों को ये सलाह दूँगा कि ज्ञान देना बंद करिए, या तो कुछ करके दिखाइए, या चुप रहिए."

उन्होंने कहा कि पार्टी पर सवाल उठाने वाले नेताओं को पार्टी से अलग हो जाना चाहिए.

उन्होंने कहा, "हर बात में कांग्रेस की आलोचना करना ही अगर इनकी आदत बनती जा रही है, अगर उन्हें लगता है कि यही सियासत है तो मतलब उन्हें कांग्रेस अच्छी नहीं लग रही, अगर ऐसा है तो ये लोग अलग से पार्टी बना सकते हैं."

बिहार विधानसभा चुनाव के मुद्दे पर

बिहार विधानसभा चुनाव में 70 सीटों पर लड़ने वाली कांग्रेस पार्टी महज 19 के आँकड़े पर सिमट कर रह गई. इस मुद्दे पर राज्यसभा में विपक्ष के नेता ग़ुलाम नबी आज़ाद ने कहा कि चुनाव फ़ाइव स्टार कल्चर से नहीं जीते जाते हैं और पार्टी पदाधिकारियों का चयन चुनाव के जरिये होना चाहिए.

हालांकि ग़ुलाम नबी आज़ाद ने पार्टी नेतृत्व को इसके लिए क्लीनचिट भी दिया कि कोरोना महामारी के कारण शीर्ष नेतृत्व संगठन का चुनाव नहीं करा सका. उन्होंने संकेत दिया कि महामारी से राहत मिलने के बाद अगले छह महीनों में संगठन के चुनाव कराये जा सकते हैं.

उन्होंने कहा, "5-स्टार से चुनाव नहीं लड़े जाते. हमारे नेताओं के साथ समस्या है कि अगर टिकट मिल गया तो 5-स्टार में जाकर बुक हो जाते हैं. एयर कंडीशनर गाड़ी के बिना नहीं जाएंगे, जहां कच्ची सड़क है वहां नहीं जाएंगे. जब तक ये कल्चर हम नहीं बदलेंगे, हम चुनाव नहीं जीत सकते."

आज़ाद ने कहा, "पार्टी को हुए नुक़सान से हम सभी चिंतित हैं, ख़ासकर बिहार और उपचुनावों में मिली हार से. मैं इसके लिए राहुल गांधी और सोनिया गांधी को दोष नहीं देता. पार्टी पदाधिकारियों को ये समझना चाहिए कि उनकी नियुक्ति के साथ ही उनकी ज़िम्मेदारियां शुरू हो जाती हैं. उन्हें पार्टी से मोहब्बत करनी चाहिए. मैं ये शेर कहना चाहूंगाः ये इश्क नहीं आसान, बस इतना समझ लीजिए, इक आग का दरिया है और डूब के जाना है."

"पार्टी पदाधिकारियों को अपनी ज़िम्मेदारी समझनी चाहिए. जब तक कि पार्टी पदाधिकारी नियुक्त किए जाते रहेंगे, वे ज़मीन नहीं जाएंगे. लोगों में ये आम भावना है कि इस पार्टी में कोई अध्यक्ष नहीं है. सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों ने ही ये कहा है कि संगठन के चुनाव अक्टूबर में होने चाहिए. लेकिन हमने कोरोना महामारी के कारण इसे छह महीने बाद कराए जाने की मांग की. प्रखंड स्तर के भी चुनाव होने हैं. बिहार में प्रखंड स्तर के कई पद खाली पड़े हैं. ऐसे हम कोई राज्य कैसे जीत पाएंगे."

"हमारे लोगों का ब्लॉक स्तर पर, जिला स्तर पर लोगों के साथ कनेक्शन टूट गया है. जब कोई पदाधिकारी हमारी पार्टी में बनता है तो वो लेटर पैड छाप देता है, विज़िटिंग कार्ड बना देता है, वो समझता है बस मेरा काम ख़त्म हो गया, काम तो उस समय से शुरू होना चाहिए."

"हमारा ढांचा कमज़ोर है, हमें ढांचा पहले खड़ा करना पड़ेगा. फिर उसमें कोई भी नेता हो चलेगा. सिर्फ नेता बदलने से आप कहेंगे कि पार्टी बदल जाएगी, बिहार आएगा, मध्य प्रदेश आएगा, उत्तर प्रदेश आएगा, नहीं वो सिस्टम से बदलेगा."

"5-स्टार से चुनाव नहीं लड़े जाते. हमारे नेताओं के साथ समस्या है कि अगर टिकट मिल गया तो 5-स्टार में जाकर बुक हो जाते हैं. एयर कंडीशनर गाड़ी के बिना नहीं जाएंगे, जहां कच्ची सड़क है वहां नहीं जाएंगे. जब तक ये कल्चर हम नहीं बदलेंगे, हम चुनाव नहीं जीत सकते."

सिब्बल और चिदंबरम के सवाल पर

ग़ुलाम नबी आज़ाद ने सिब्बल और चिदंबरम के बारे में पूछे जाने पर कहा, "पी चिदंबरम और कपिल सिब्बल ने पार्टी के आत्मचिंतन पर जो कुछ कहा है वो ग़लत नहीं है लेकिन इसका मतलब शीर्ष नेतृत्व को बदलना भी नहीं है. सिब्बल और चिदंबरम, दोनों ने ही कुछ गलत नहीं कहा."

"और आत्मावलोकन का ये मतलब नहीं है कि लोग सोनिया गांधी के ख़िलाफ़ हैं. इसका मतलब ये भी नहीं है कि राहुल गांधी ख़राब हैं. आत्मचिंतन का मतलब है कि इस बात पर बहस होनी चाहिए कि हम बिहार का चुनाव क्यों हारे. हम मध्य प्रदेश में कुछ ही सीटें क्यों जीत पाए."

"और इन मुद्दों पर बहस के बाद हम जिन नतीजों पर पहुंचेंगे, उसे किस तरह से लागू किया जाए. हमें यही सुनिश्चित करना है."

कपिल सिब्बल ने पिछले सप्ताह इंडियन एक्सप्रेस अख़बार को दिए एक इंटरव्यू में कहा था कि ना केवल बिहार के लोग बल्कि देश भर में जहां कहीं भी उपचुनाव हुए, वहां लोगों ने कांग्रेस को एक सशक्त विकल्प के तौर अस्वीकार कर दिया.

पार्टी में टकराव की आहट

बिहार चुनाव में कांग्रेस के कमज़ोर प्रदर्शन के बाद से पार्टी के भीतर टकराव का माहौल लगातार दिखाई दे रहा है. कुछ दिनों पहले पार्टी के वरिष्ठ नेता कपिल सिब्बल ने खुलकर पार्टी नेतृत्व की आलोचना की थी जिसके बाद राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने एतराज़ जताया.

कपिल सिबल ने कहा था कि 'बिहार चुनाव पर पार्टी नेतृत्व ने अब तक कुछ नहीं कहा है, शायद उन्हें लगता है कि सब ठीक ही चल रहा है.'

इसमें उन्होंने कहा है कि पार्टी को ये स्वीकार करना चाहिए कि वो कमज़ोर होती जा रही है और इसे दोबारा दुरूस्त करने के लिए "तज़ुर्बेकार दिमाग़, तज़ुर्बेकार हाथों और ऐसे लोगों की ज़रूरत है जो राजनीतिक वास्तविकताओं को समझते हैं."

उनके इस इंटरव्यू के बाद अशोक गहलोत ने कई ट्वीट किए.

उन्होंने इसमें कहा, "कपिल सिब्बल जी को हमारे अंदरूनी मसलों की मीडिया में चर्चा करने की ज़रूरत नहीं थी, इससे देश भर में हमारे कार्यकर्ताओं की भावनाएँ आहत हुई हैं. 1969, 1977,1989 और बाद में 1996 में, कांग्रेस ने कई बार संकटों का सामना किया है. लेकिन हर बार हम अपनी विचारधारा, कार्यक्रमों, नीतियों और पार्टी नेतृत्व पर भरोसे के बूते मजबूत होकर उभरे. हर बार संकट की स्थितियों से हम बेहतर होकर उभरे. सोनिया जी के नेतृत्व में हमने साल 2004 में यूपीए सरकार बनाई. हम आज के हालात से भी उबर जाएंगे."

"चुनावी हार की कई वजहें होती हैं. लेकिन हर बार कांग्रेस कार्यकर्ता और पदाधिकारियों ने पार्टी नेतृत्व के प्रति दृढ़ विश्वास बनाए रखा है. यही वजह है कि हम बार ज़्यादा मजबूत और एक होकर संकट से उबर पाए."

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