बिहार चुनाव की गूँज दिल्ली तक क्यों सुनाई देती है

    • Author, सलमान रावी
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

राजनीतिक हलकों में हमेशा से ये कहा जाता रहा है कि दिल्ली की सरकार का रास्ता उत्तर प्रदेश से गुज़रता है.

बात काफ़ी हद तक इसलिए भी ठीक मानी जाती है क्योंकि जनसंख्या के हिसाब से उत्तर प्रदेश सबसे बड़ा राज्य है और वहाँ लोकसभा सीटें भी सबसे ज़्यादा हैं.

लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों को लगता है कि दिल्ली की सरकार तब तक मज़बूत नहीं हो सकती, जब तक बिहार की भी उसमें कोई भूमिका न हो.

वो चाहे विश्वनाथ प्रताप सिंह का प्रधानमंत्री बनना हो या फिर चंद्रशेखर और इंद्र कुमार गुजराल या एचडी देवेगौड़ा का प्रधानमंत्री के तौर पर चुना जाना हो, इन सबके प्रधानमंत्री बनने में बिहार के नेताओं के फ़ैसले या उनके राजनीतिक जोड़ घटाव का बड़ा योगदान रहा है.

इसीलिए बिहार में हो रहे इस बार के विधानसभा चुनाव पर पूरे देश की नज़र है.

बिहार के चुनावी नतीजे

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश के अनुसार बिहार के चुनावों के बाद पश्चिम बंगाल और उत्तर प्रदेश में भी चुनाव होने हैं.

बिहार के चुनावी नतीजे सभी दलों के लिए महत्वपूर्ण है और ख़ासतौर पर भारतीय जनता पार्टी के लिए भी, क्योंकि बिहार में अभी तक भाजपा का कोई भी नेता मुख्यमंत्री नहीं बन पाया है.

उर्मिलेश के अनुसार, "बिहार के चुनावी नतीजे ये भी तय करेंगे कि पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी का राजनीतिक भविष्य क्या होगा? नतीजों से ये भी पता चलेगा कि पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रस के सामने किस तरह की चुनौतियाँ आने वाली हैं."

हाल में ही भारतीय जनता पार्टी ने पश्चिम बंगाल की राजनीति में काफ़ी ज़ोर लगाया है. तृणमूल कांग्रेस की सरकार के ख़िलाफ़ भारतीय जनता पार्टी, कई राजनीतिक कार्यक्रम भी आयोजित करती आ रही है. पश्चिम बंगाल में भाजपा आक्रामक रूप से तृणमूल कांग्रेस का सामना कर रही है और इस दौरान प्रदेश की कई जगहों से हिंसक घटनाओं की खबरें भी आती रही हैं.

अलग राजनीतिक स्पेस

लेकिन राजनीतिक जानकार बिहार को पश्चिम बंगाल की राजनीति से अलग देखते हैं. वो कहते हैं कि बिहार एकमात्र प्रदेश है, जहाँ विभिन्न विचारधाराओं की राजनीतिक शक्तियाँ अपनी जगह पर काफ़ी मज़बूत हैं.

वरिष्ठ पत्रकार उर्मिलेश कहते हैं कि समाजवादी अगर सत्ता में हैं, तो वो विपक्ष में भी मौजूद हैं. जय प्रकाश नारायण के आंदोलन से उभरे नेता सत्ता में भी हैं और विपक्ष में भी हैं. उसी तरह वाम दलों का अपना एक अलग राजनीतिक स्पेस है. लोहियावादी भी कुछ जगहों पर मज़बूत हैं. यानी हर तरह की राजनीतिक विचारधारा के लिए बिहार में जगह है.

कुछ विश्लेषक, मंडल आंदोलन का उदाहरण देते हैं. उनका दावा है कि उत्तर प्रदेश में मंडल आयोग की सिफ़ारिशों को लागू करने का उतना ज़ोरदार आंदोलन नहीं हुआ था, जितना बिहार में हुआ. वो कहते हैं कि इसी आंदोलन की वजह से रामविलास पासवान, लालू यादव और कई अन्य नेता नेता देश की राजनीति पर छा गए.

वो कहते हैं कि उत्तर प्रदेश में तो मंडल आयोग की सिफ़ारिशों का विरोध हुआ था, लेकिन बिहार ने आरक्षण की राह दिखाई. इसलिए भी यहाँ के चुनाव देश के लिए बहुत महत्व रखते हैं.

चुनावों की बात की जाए, तो इस बार के चुनाव सबके लिए चुनौती हैं, क्योंकि सत्तारूढ़ गठबंधन में दरार आई है तो विपक्षी महागठबंधन में भी मतभेद दिखे हैं.

नए राजनीतिक गठबंधन

ऐसा माना जा रहा है कि इस बार के विधानसभा चुनाव मुख्य रूप से भाजपा, नीतीश कुमार, तेजस्वी यादव, चिराग पासवान और उपेंद्र कुशवाहा के लिए बड़ी चुनौती है, क्योंकि नए राजनीतिक गठबंधनों ने सभी समीकरणों को उलट-पलट दिया है.

उर्मिलेश कहते हैं कि बिहार के चुनावों पर पूरे देश की नज़र इसलिए भी रहेगी, क्योंकि ये देखने वाली बात होगी कि क्या भाजपा नीतीश के बिना सरकार बना पाएगी?

हालाँकि इसकी संभावना से भाजपा ने फ़िलहाल तो इनकार किया है. लेकिन लोक जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष चिराग पासवान के एनडीए से अलग होने पर कई लोग सवाल उठा रहे हैं.

लोक जनशक्ति पार्टी का इस चुनाव में नारा है- भाजपा से बैर नहीं, नीतीश तेरी खैर नहीं. इससे जानकार अंदाज़ा लगा रहे हैं कि इस बार बिहार की राजनीति में शतरंज की बिसात किस तरह बिछाई गई है.

'एंटी इनकम्बेंसी'

राजनीति के जानकार ये भी कहते हैं कि इस बार बिहार के चुनावों में ये भी देखना महत्वपूर्ण होगा कि अमित शाह और नरेंद्र मोदी की जोड़ी बिहार में नीतीश कुमार के 15 साल के शासन को लेकर 'एंटी इनकम्बेंसी' का कैसे सामना करती है. ये भी पता चलेगा कि पिछले विधानसभा चुनाव में हार से भाजपा ने क्या-क्या सबक़ सीखे हैं, जिसे वो इस बार दुरुस्त करेगी.

जानकारों का कहना है कि हाथरस की घटना, दलित उत्पीड़न के मामले, किसानों का कृषि अध्यादेशों के ख़िलाफ़ ग़ुस्सा और कोरोना काल में प्रवासी मज़दूरों का पलायन जैसे मुद्दों के असर को बिहार में नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी कैसे 'न्यूट्रलाइज' करेगी, ये भी देखने वाली बात होगी.

बिहार में दशकों तक पत्रकारिता करते रहे वरिष्ठ पत्रकार दिवाकर कहते हैं कि देश की राजनीति पर बिहार की छाप ज़रूरी है, जिसे चाह कर भी कोई नज़र अंदाज़ नहीं कर सकता है. उनका कहना है कि बिहार ने ही राजनीतिक दलों को जनहित की राजनीति का रास्ता दिखाया है.

वो कहते हैं कि बिहार भारतीय जनता पार्टी के लिए भी बड़ी चुनौती है, क्योंकि उसने इस प्रदेश में राजनीति, शून्य से शुरू की थी और आज उनके पास उप मुख्यमंत्री का पद है. उनका कहना है, "लेकिन फिर भी, इतने प्रयासों और संघ के प्रभाव के बावजूद भारतीय जनता पार्टी बिहार में नंबर वन नहीं बन सकी."

हरिवंश राज्य सभा के उपसभापति हैं और बिहार से जनता दल (यूनाइटेड) के टिकट पर दो बार राज्य सभा के सांसद बने हैं. बीबीसी से बातचीत में वे कहते हैं कि बिहार बदलाव का बड़ा केंद्र है.

वे कहते हैं, "चाहे उसे महात्मा गाँधी के चंपारण सत्याग्रह से जोड़कर देखिए या सम्राट अशोक या फिर गौतम बुद्ध की दृष्टि से देखिए, बिहार पर सबकी नज़र बनी रहती है- चाहे वो भारत के किसी प्रदेश के रहने वाले हों या विदेश में रहने वाले हों." हरिवंश का मानना है कि बिहार हमेशा से ही राष्ट्रीय मुख्यधारा से जुड़ा रहा है."

ये चुनाव इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि ये पहला चुनाव है, जो कोरोना महामारी के दौर में हो रहा है. और दूसरा ये भी कि इस बार विधानसभा चुनावों का प्रचार 'डिज़िटल प्लेटफ़ॉर्म' के माध्यम से हो रहा है.

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