बिहार चुनाव: क्या कांग्रेस में सब कुछ 'ऑल इज वेल' है?

    • Author, सीटू तिवारी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, पटना से

बिहार में दूसरे चरण के नामांकन की आखिरी तारीख 16 अक्तूबर है.

लेकिन राज्य में 1990 तक कुछ वर्षो को छोड़कर सत्ता में रही कांग्रेस ने अपने उम्मीदवारों को हवा में त्रिशंकु की तरह लटका रखा है.

पार्टी ने महज 21 प्रत्याशियों की लिस्ट अब तक जारी की है, जबकि महागठबंधन (राजद ,कांग्रेस और वामपंथी पार्टियों के गठजोड़) में उसके हिस्से 70 सीटें आई हैं. यानी पार्टी को 49 सीट पर उम्मीदवार की घोषणा करना बाकी है.

पार्टी प्रवक्ता राजेश राठौर से ये सवाल पूछने पर वो कहते है, "हमारी पार्टी कोई एक आदमी की पार्टी नहीं है. हमारे यहां एक प्रक्रिया का पालन होता है. 14 अक्टूबर को पार्टी की केन्द्रीय चुनाव समिति (सीईसी) की बैठक होगी जिसके बाद दूसरे और तीसरे चरण के उम्मीदवारों की घोषणा होगी. इसमें देरी की बात कहां है?"

उम्मीदवारों को मिल गया है संकेत

हालांकि इस बीच पार्टी ने अपने कुछ उम्मीदवारों का नाम आधिकारिक तौर पर तो जारी नहीं किया है, लेकिन अनाधिकारिक तौर पर उन्हें अपने क्षेत्र जाकर चुनाव प्रचार करने के संकेत दे दिए हैं.

पार्टी के सोशल मीडिया विभाग से जुड़े एक कार्यकर्ता ने बीबीसी से कहा, "सब कुछ तय है. बस घोषणा बाकी है जो महज औपचारिकता है."

वैसे ये माना जा रहा है कि औपचारिक तौर पर पार्टी लिस्ट जारी करने में देरी इसलिए भी करती है ताकि कार्यकर्ताओं के बीच असंतोष को दबाया जा सके.

पार्टी को लेकर कई अख़बारों और पोर्टल ने ये खबर भी प्रकाशित कर दी थी कि बिहार कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष मदन मोहन झा, सीएलपी नेता सदानंद सिंह और चुनाव अभियान समिति के अध्यक्ष अखिलेश प्रसाद सिंह को चुनाव चयन समिति से हटा दिया गया है. लेकिन बिहार कांग्रेस स्क्रीनिंग कमिटी के अध्यक्ष अविनाश पांडे ने इन खबरों को भ्रामक बताते हुए खारिज किया.

राजद - कांग्रेस में खींचतान की ख़बरें

इधर राजद और कांग्रेस में कई सीटों को लेकर खींचतान की खबरें हैं, जिससे राजद और कांग्रेस इनकार करते हैं.

राजद प्रवक्ता चितरंजन गगन कहते है, "हमारे बीच कोई खींचतान नहीं है. पहले ही हमने सभी फैसले सर्वसम्मति से लिए है. महागठबंधन के हर घटक दल के साथ हमारा सामंजस्य बहुत अच्छा है."

इधर, मशहूर शायर मुन्नवर राणा की बेटी फौजिया राणा भी किशनगंज से अपनी किस्मत आजमा सकती हैं.

उन्होने कुछ दिन पहले ही पार्टी ज्वॉइन की थी.

कांग्रेस प्रवक्ता राजेश राठौर कहते है, "वो चुनाव लड़ने की इच्छा रखती हैं लेकिन अंतिम फैसला तो चुनाव समिति का ही होगा."

कांग्रेस को ज़रूरत से ज्यादा सीटें मिल गईं

गौरतलब है कि 90 के दशक तक बिहार में कांग्रेस कुछ वर्षों को छोड़कर सत्ता में ही रही. साल 2015 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने जेडीयू और राजद के साथ चुनाव लड़ा था जिसमें पार्टी ने 41 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतार कर, 27 सीट पर जीत हासिल की थी.

साल 2015 में पार्टी का वोट शेयर महज 6.07 फीसदी था. जबकि 2010 के विधानसभा चुनाव की बात करें तो पार्टी को महज 4 सीट मिली थीं, लेकिन वोट शेयर 8.38 फीसदी था.

साल 2018 में पार्टी ने मदन मोहन झा को बिहार कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया था. साल 1991 में बिहार के पार्टी अध्यक्ष जगन्नाथ मिश्र थे. पार्टी ने 27 साल बाद किसी ब्राह्मण चेहरे को प्रदेश अध्यक्ष की कमान सौंपी थी. साफ़ था कि इसका मकसद ब्राह्मणों में अपने पुराने वोट आधार को वापस लाना था. हालांकि लोकसभा चुनाव में पार्टी को इसका कोई फायदा नहीं मिला.

कांग्रेस के एक पुराने कार्यकर्ता ने बीबीसी से कहा, "पार्टी ने जो जिलाध्यक्ष बनाए हैं उनका हाल तो ये है कि वो घर से निकलते ही नहीं हैं. अगर किसी जिले अमें कोई बैठक बुलाई जाए तो सभी ब्लॉक अध्यक्ष तक बैठक में नहीं आएंगे. ऐसी पार्टी से क्या उम्मीद करें. बाकी हमारी निष्ठा कई पीढ़ी से गांधी परिवार से है, तो हम यहां है."

वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद कहते हैं, "दरअसल कांग्रेस को जरूरत से ज्यादा सीट मिल गई है. उनके पास जिताऊ उम्मीदवार हैं ही नहीं. हो सकता है कि पार्टी को राजद से ही उम्मीदवार लेने पड़ें. इसकी वजह ये है कि पार्टी में अंदरूनी खींचतान बहुत ज्यादा है और कोई सक्षम नेतृत्व नहीं है. 90 के बाद तो पार्टी अपने दम पर कभी भी अच्छा प्रदर्शन नहीं कर सकी."

एंटी बीजेपी मूवमेंट का आधार बनाना चाहती कांग्रेस

कांग्रेस में सब कुछ 'ऑल इज वेल' नजर नहीं आ रहा है. ना तो राष्ट्रीय स्तर पर और ना ही बिहार राज्य के स्तर है. लेकिन इसके बावजूद पार्टी बिहार चुनाव को लेकर बड़े लक्ष्य अपने सामने रख रही है.

वरिष्ठ पत्रकार रमाकांत चंदन की मानें तो कांग्रेस, बीजेपी के ख़िलाफ़ जो माहौल बन रहा है, उसका पुख्ता आधार बिहार में तैयार करना चाहती है.

वो कहते है, "इस बार कांग्रेस, महागठबंधन के जरिए बिहार से एंटी बीजेपी मूवमेंट का राष्ट्रीय आधार बनाना चाहती है. पार्टी चाहती है एंटी बीजेपी मूवमेंट बिहार से शुरू हो और फिर उसका विस्तार बंगाल, उत्तरप्रदेश सहित कई राज्यों में हो. बिहार में बीजेपी जदयू की हार इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाएगी क्योंकि यहां कुछ साल छोड़कर 15 साल से बीजेपी ही शासन में रही."

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)