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जबलपुर: डॉक्टर की ख़ुदकुशी और जातीय उत्पीड़न के आरोप
- Author, आलोक प्रकाश पुतुल
- पदनाम, रायपुर से बीबीसी हिंदी के लिए
छत्तीसगढ़ के जांजगीर चांपा के 28 वर्षीय मेडिकल छात्र डॉक्टर भागवत देवांगन की जबलपुर मेडिकल कॉलेज में कथित जातीय उत्पीड़न के बाद आत्महत्या को लेकर विरोध प्रदर्शन शुरु हो गए हैं.
परिजनों का आरोप है कि ग़रीबी और छोटी जाति का हवाला दे कर कॉलेज के सीनियर्स उसे लगातार प्रताड़ित करते थे, जिसके कारण भागवत ने मेडिकल कॉलेज़ के हॉस्टल में फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली. हालांकि मेडिकल कॉलेज प्रबंधन इससे इनकार कर रहा है.
इस मामले में परिवार की शिकायत पर पुलिस ने आरंभिक जांच तो शुरू कर दी है लेकिन अभी तक एफ़आईआर दर्ज नहीं हुई है.
परिवार वालों ने भागवत देवांगन के पांच सीनियर डॉक्टरों के ख़िलाफ़ शिकायत दर्ज कराई है.
पिछले नौ दिनों से मामले की जांच कर रहे जबलपुर के गढ़ा थाना के प्रभारी राकेश तिवारी ने बीबीसी से कहा, "इस मामले में नामज़द सभी छात्रों के बयान लिए गए हैं. अभी कोविड के कारण कई डॉक्टरों से पूछताछ नहीं हो पाई है. कल डीन और अस्पताल की एंटी रैगिंग कमेटी की बैठक भी है. हम सारी आवश्यक कार्रवाई कर रहे हैं."
भागवत देवांगन, जबलपुर मध्यप्रदेश के नेताजी सुभाष चंद्र बोस मेडिकल कॉलेज में ऑर्थोपेडिक में पीजी कर रहे थे.
डॉक्टर भागवत देवांगन के बड़े भाई प्रहलाद देवांगन ने बीबीसी से कहा, "मेरे छोटे भाई ने मुझे कई बार शिकायत की कि उसके कॉलेज के सीनियर उसकी ग़रीबी और जाति का हवाला दे कर उसके साथ मारपीट करते हैं और शारीरिक-मानसिक रुप से प्रताड़ित करते हैं. कॉलेज़ प्रबंधन को भी इसकी जानकारी थी लेकिन उन्होंने इसमें कभी हस्तक्षेप नहीं किया और मेरा भाई मौत को गले लगाने के लिये मज़बूर हो गया."
हालांकि मेडिकल कॉलेज हॉस्टल के वार्डन और कॉलेज की एंटी रैगिंग कमेटी के सदस्य डॉक्टर अरविंद शर्मा हॉस्टल के भीतर रैगिंग या किसी किस्म की प्रताड़ना से इंकार कर रहे हैं.
उनका कहना है कि आत्महत्या करने वाले छात्र ने कभी भी हॉस्टल में प्रताड़ित किए जाने की शिकायत नहीं की थी. डॉक्टर अरविंद शर्मा ने कहा, "प्रताड़ना और रैगिंग का मामला विभाग से जुड़ा हुआ है. जिन छात्रों पर आरोप हैं, उनमें से कौन-कौन हॉस्टल में रहते हैं, यह मुझे देखना पड़ेगा."
जातीय उत्पीड़न
छत्तीसगढ़ के जांजगीर-चांपा ज़िले के एक छोटे से कस्बे राहौद के रहने वाले भागवत देवांगन अपने चार भाइयों में दूसरे नंबर के थे.
पिता की कस्बे में ही बर्तन बेचने की एक छोटी-सी दुकान है. यहां अति पिछड़ा और अनुसूचित जाति में देवांगन टाइटिल के लोग मिलते हैं, लेकिन मृतक डॉक्टर अति पिछड़ा वर्ग से आते थे.
छठवीं तक स्थानीय स्कूल में पढ़ाई करने के बाद भागवत का चयन नवोदय विद्यालय में हो गया, जहां से उन्होंने बारहवीं तक की पढ़ाई पूरी की. इसके बाद उनका चयन पुणे के बायरामजी जीजीभोय सरकारी मेडिकल कॉलेज में हुआ, जहां से उन्होंने एमबीबीएस की पढ़ाई की.
भागवत के परिजनों का कहना है कि पीजी की पढ़ाई के लिये उनका चयन महाराष्ट्र में ही हो गया था लेकिन मराठा आरक्षण के कारण चयन सूची रद्द हो गई. इसके बाद भागवत ने अगले साल पीजी में प्रवेश के लिये परीक्षा दी, जिसमें देश में उनकी रैंक 5500 थी. इसके आधार पर जबलपुर के मेडिकल कॉलेज़ में ऑर्थोपेडिक विभाग में उन्हें दाखिला मिला.
डॉक्टर भागवत के भाई का कहना है कि इस साल एक जुलाई को मेडिकल कॉलेज में प्रवेश के पखवाड़े भर बाद ही भागवत ने घर के लोगों को बताया कि उसके सीनियर लगातार उसे प्रताड़ित कर रहे हैं.
भागवत के बड़े भाई प्रहलाद देवांगन कहते हैं, "उसने एक दिन फ़ोन पर बताया कि उसके सीनियर नर्स और वार्ड ब्वाय को गाली देकर बुलाने के लिए कहते हैं, उन्हें पीटने के लिए कहते हैं और ऐसा करने से इंकार करने पर भागवत को सार्वजनिक तौर पर पीटा जा रहा था."
प्रहलाद का कहना है कि भागवत ने आरक्षण का लाभ नहीं लिया था और सामान्य कोटे से ही उसे प्रवेश मिला था. लेकिन उनके मेधावी भाई को आरक्षण का ताना दिया जाता था.
प्रहलाद आरोप लगाते हुए कहते हैं, "कॉलेज में दूसरे छात्रों की तुलना में हमारे परिवार की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी. बड़ी मुश्किलों से हम पैसों की प्रबंध कर के अपने भाई को पढ़ा रहे थे. लेकिन मेडिकल कॉलेज के सीनियर बार-बार मेरे भाई को कहते थे कि वह ठीक से पढ़ाई नहीं कर पाता क्योंकि आरक्षण की बदौलत उसे यहां दाखिला मिला है. वे उसकी आर्थिक स्थिति का भी मजाक उड़ाते थे."
पहले भी की थी आत्महत्या की कोशिश
परिवार वालों ने भागवत को जल्दी ही सब ठीक होने का हवाला दे कर उसे समझाया. इन सारी बातों को विभागाध्यक्ष और हॉस्टल प्रबंधन को भी बताने की सलाह दी.
वैसे घर वालों को मामले की गंभीरता 24 जुलाई को समझ में आई, जब मेडिकल कॉलेज़ के एक डॉक्टर ने उन्हें फ़ोन पर बताया कि डॉक्टर भागवत ने नींद की गोलियां खा ली हैं. घर वाले अगले दिन सुबह जब पहुंचे तो डॉक्टर भागवत अस्पताल के आईसीयू में थे. वहां उन्होंने बताया कि सीनियर्स की प्रताड़ना के कारण उन्होंने नींद की गोलियां खा कर जान देने की कोशिश की थी.
इसके बाद भागवत आठ दिनों का अवकाश का लेकर अपने परिजनों के साथ अपने घर लौट आए. अवकाश ख़त्म होने के बाद छोटे भाई देवी देवांगन के साथ वे जबलपुर पहुंचे और उन्होंने अपनी ड्यूटी ज्वाइन कर ली.
छोटे भाई देवी का आरोप है कि प्रताड़ना का सिलसिला जारी रहा तो एक दिन भागवत जबलपुर में रहने वाले अपने दोस्त के घर चले आए. तीन-चार दिन दोस्त के परिजनों के साथ रहने के बाद उन्होंने अपने को बीमार बता कर विभागाध्यक्ष से छुट्टी ली और महीने भर के लिए अपने घर जांजगीर लौट आए.
आत्महत्या की ख़बर
डेढ़ महीने तक घर में रहने के बाद डॉक्टर भागवत 26 सितंबर को मेडिकल कॉलेज़ लौट गए. लेकिन उन्होंने ड्यूटी ज्वाइन नहीं की. परिजनों का आरोप है कि डॉक्टर भागवत घर से मेडिकल कॉलेज तो पहुंच गये थे लेकिन सीनियर्स का ख़ौफ़ उनके भीतर इतना था कि वे ड्यूटी ज्वाइन करने से बच रहे थे.
परिजनों का कहना है कि एक अक्टूबर को भागवत के एक सीनियर विकास द्विवेदी का फ़ोन आया और उन्होंने फ़ोन पर कहा कि भागवत ने अब तक ड्यूटी ज्वाइन नहीं की है और वह फ़ोन भी नहीं उठा रहा है.
इसके बाद परिजनों ने भागवत को फ़ोन कर ड्यूटी ज्वाइन करने की सलाह दी. भागवत ने भी उन्हें बताया कि उनकी विकास द्विवेदी से बात हो गई है और वे ड्यूटी ज्वाइन करने वाले हैं.
डॉक्टर भागवत के बड़े भाई प्रहलाद देवांगन के अनुसार, "उसकी आवाज़ से लगा कि वो बहुत डरा हुआ है. मैंने उसे ढांढ़स बंधाया और कहा कि डरने की ज़रुरत नहीं है. किसी भी तरह की कोई परेशानी हो तो मुझे बताना."
डॉक्टर भागवत के पिता अमृतलाल देवांगन ने दोपहर में कई बार भागवत को फ़ोन लगाया लेकिन भागवत ने फ़ोन नहीं उठाया. इसके बाद परिजनों ने उसके दो साथियों को हॉस्टल के कमरा नंबर 14 में जा कर भागवत से बात कराने के लिये कहा.
पुलिस में दर्ज़ बयान के अनुसार शाम 6 बजे के आसपास हॉस्टल के प्रभारी और एंटी रैगिंग कमेटी के सदस्य डॉक्टर अरविंद शर्मा ने प्रहलाद देवांगन को फ़ोन पर बताया कि डॉक्टर भागवत की स्थिति गंभीर है, आपलोग जितनी जल्दी हो सके, जबलपुर पहुंचें.
डॉक्टर भागवत के बड़े और छोटे भाई रात दो बजे जबलपुर पहुंचे, जहां उन्हें बताया गया कि उनके भाई ने फांसी लगा कर आत्महत्या कर ली है. सुबह नौ बजे चीरघर में रखा गया शव उन्हें दिखाया गया.
प्रहलाद देवांगन कहते हैं, "भाई के गले पर कुछ निशान दिखाई पड़ रहे थे. मुझे बताया गया कि मेरे भाई ने फांसी लगा ली थी लेकिन मुझे इस बात में भी संशय है कि मेरे भाई ने आत्महत्या की होगी. भागवत ने हमें बार-बार जिन सीनियर्स द्वारा प्रताड़ित करने की बात बताई थी, हमने उन सभी पांचों के ख़िलाफ़ पुलिस में शिकायत दर्ज़ कराई."
हालांकि आरोपी इस तरह की किसी भी प्रताड़ना में ख़ुद के शामिल होने से इंकार कर रहे हैं. आरोपियों में से एक विकास द्विवेदी ने कहा कि पिछले तीन महीनों में उनकी डॉक्टर भागवत देवांगन से कभी ढंग से बात तक नहीं हुई है.
उन्होंने कहा, "मैंने आज तक केवल एक बार भागवत देवांगन को सिनोप्सिस के लिये फ़ोन किया था. इसके अलावा उनसे मेरा कभी कोई संपर्क नहीं रहा. मुझे बेवजह फंसाया जा रहा है. मुझे इस बारे में और कुछ नहीं कहना. पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है."
जस्टिस फ़ॉर भागवत देवांगन
छत्तीसगढ़ में जांजगीर-चांपा के लोगों का कहना है कि पुलिस इस पूरे मामले को टालना चाह रही है. यहां तक कि हॉस्टल प्रबंधन भी लीपा पोती में जुटा हुआ है.
जिस दिन डॉक्टर भागवत देवांगन का शव लेकर उनके परिजन जांजगीर पहुंचे, उस दिन शहर के लोगों ने कई घटों तक प्रदर्शन किया.
सोमवार को कैंडल मार्च के बाद गुरुवार की शाम को भी कांग्रेस पार्टी से जुड़े लोगों ने प्रदर्शन किया.
भागवत के बचपन के दोस्त दिलीप देवांगन कहते हैं, "मेरा दोस्त पढ़ने में बहुत मेधावी था. उसकी इस तरह से मौत की हमने कल्पना नहीं की थी. हम चाहते हैं कि दोषियों को इस मामले में सज़ा मिले और हमें न्याय मिले. हमने इसके लिए जस्टिस फॉर भागवत देवांगन कैंपेन की शुरुआत की है. छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री को हमने एक लाख पोस्टकार्ड भेजने की योजना बनाई है."
छत्तीसगढ़ के स्वास्थ्य मंत्री टीएस सिंहदेव ने गुरुवार को मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को एक पत्र लिख कर पूरे मामले की जांच का अनुरोध किया है. टीएस सिंहदेव का कहना है कि एंटी-रैगिंग के कड़े नियमों एवं कठोर दंड के प्रावधाने के बावजूद भी छात्र रैगिंग के कारण मानसिक एवं शारीरिक प्रताड़नाओं के शिकार हो रहे हैं.
जांजगीर चांपा ज़िले की एसपी पारुल माथुर का कहना है कि जबलपुर पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है और हम लगातार उनके संपर्क में हैं. यहां इस मामले की कोई स्वतंत्र जांच नहीं हो रही है.
इस मामले में परिवार को क़ानूनी मदद देने की पेशकश करने वाली हाईकोर्ट की अधिवक्ता और सामाजिक कार्यकर्ता प्रियंका शुक्ला का कहना है कि दलित, पिछड़ा, ग़रीब और वंचित समाज के छात्र लगातार प्रताड़ना के शिकार हो रहे हैं लेकिन उनकी कहीं सुनवाई नहीं हो रही.
प्रियंका कहती हैं, "सुशांत सिंह राजपूत की मौत हो जाती है तो महीनों पूरा देश उसमें उलझा रहता है. लेकिन डॉक्टर भागवत देवांगन जैसे मेधावी डॉक्टर की मौत पर कहीं कोई बात तक नहीं होती. हम चाहते हैं कि हमारा देश दलितों, ग़रीबों और वंचितों पर भी तो बात करे."
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