#20thYearOfNaMo: मोदी के सत्ता में बीस साल, चुप्पी पर क्यों उठे सवाल

    • Author, अपूर्व कृष्ण
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

#20thYearOfNaMo - ट्विटर पर बुधवार को सुबह से ये हैशटैग ट्रेंड में बना हुआ है.

और इसकी वजह ये है - आज से ठीक 20 साल पहले, वर्ष 2001 में नरेंद्र मोदी ने गुजरात की कमान संभाली थी.

यानी आज नरेंद्र मोदी को सत्ता में बने हुए ठीक 19 साल पूरे हो गए हैं और मोदी राज का 20वाँ वर्ष शुरू हो रहा है.

मोदी सात अक्तूबर 2001 को गुजरात के मुख्यमंत्री बनाए गए थे.

ये वो साल था जब गुजरात भुज में आए विनाशकारी भूकंप से जूझ रहा था जिसमें लगभग बीस हज़ार लोग मारे गए थे.

उस आपदा के बाद गुजरात में भाजपा सरकार में असंतोष उपजा और उसका नतीजा ये हुआ कि भाजपा आलाकमान ने केशुभाई पटेल को गद्दी से हटाकर नरेंद्र मोदी को मुख्यमंत्री की गद्दी पर बिठा दिया.

मोदी के मुख्यमंत्री बने कोई पाँच महीने हुए थे जब फ़रवरी, 2002 में गुजरात में दंगे भड़क उठे, उनकी बहुत आलोचना हुई, काफ़ी दबाव पड़ा मगर मोदी टिके रहे.

दिसंबर में प्रदेश में चुनाव हुए और भाजपा की ज़बरदस्त जीत के साथ मोदी के नेतृत्व पर मुहर लग गई. पार्टी ने 182 में से 127 सीटों पर जीत हासिल कर प्रचंड बहुमत हासिल किया.

फिर मोदी की अगुआई में भाजपा ने 2007 और 2012 के चुनाव में भी आसानी से सत्ता बनाए रखी. गुजरात के अब तक के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले मोदी के गुजरात मॉडल का ख़ूब नाम हुआ.

2013 में पार्टी ने मोदी को अपना प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया और अगले साल उन्होंने आम चुनाव में भी अपना विजय रथ चलाते हुए पूरे भारत की ज़िम्मेदारी संभालने के लिए दिल्ली कूच किया.

2019 में भी मोदी का विजय रथ नहीं रुका, वो लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री बने.

#20thYearOfNaMo

सात अक्तूबर को प्रधानमंत्री मोदी के समर्थकों ने सोशल मीडिया पर एक बड़ा दिन बना दिया है. पार्टी से लेकर सरकार के तमाम बड़े मंत्री व कार्यकर्ता-समर्थक उनका गुणगान कर रहे हैं.

पार्टी अध्यक्ष जगत प्रकाश नड्डा ने लिखा है, "भारत के राजनीतिक इतिहास में 7 अक्तूबर, 2001 की तारीख़ एक मील का पत्थर है, जब मोदी जी ने पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली थी. तब से, हर बार पिछली जीत से बड़ी जीत, पिछले समर्थन से बड़ा समर्थन, लोकप्रियता का बढ़ता पायदान."

गुजरात में मोदी के मुख्यमंत्रित्व काल में उनके गृह मंत्री और अब मोदी के प्रधानमंत्रित्व काल में भी उनके गृह मंत्री अमित शाह ने भी बधाई देते हुए ट्वीट किया है.

उन्होंने लिखा है, "अगर कोई सही मायने में 130 करोड़ भारतीयों की आकांक्षाओं को समझ सकता है तो वह @narendramodi जी हैं. अपनी दूरदर्शी सोच से वह ऐसे भारत का निर्माण कर रहे हैं जो सशक्त, आधुनिक व आत्मनिर्भर हो. एक जनप्रतिनिधि के रूप में उनके 20वें वर्ष पर उन्हें हृदयपूर्वक बधाई देता हूँ."

भारतीय जनता पार्टी ने भी अपने ट्विटर एकाउंट से प्रधानमंत्री की उपलब्धियों को गिनाते हुए कई ट्वीट किए हैं.

एक ट्वीट में उनकी तुलना अमरीका के पूर्व राष्ट्रपतियों फ़्रैंकलिन रूज़वेल्ट, बिल क्लिंटन, जॉर्ज डब्ल्यू बुश और बराक ओबामा, ब्रिटेन की पूर्व प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर, फ़्रांस के पूर्व राष्ट्रपति फ़्रांसुआं मितरां और जर्मनी के पूर्व चांसलर हेलमुट कोल से भी की है.

यानी कुल मिलाकर सोशल मीडिया पर मोदी सरकार के 20वें वर्ष की चर्चा ट्रेंड में है.

हाथरस पर चुप्पी का सवाल

मगर पिछले कई दिनों से भारत में जो ख़बर ट्रेंड कर रही थी, यानी वो ख़बर जिससे अख़बारों के पन्नों से लेकर टीवी के पर्दे तक अटे पड़े थे वो थी हाथरस की घटना.

उत्तर प्रदेश के एक दलित परिवार की बेटी के साथ हुए एक अपराध ने देश को ही नहीं झकझोरा बल्कि संयुक्त राष्ट्र तक ने इसपर चिंता प्रकट कर दी जिसे भारत ने अनावश्यक बताया.

लेकिन इस दौरान ये सवाल कौंधा कि संयुक्त राष्ट्र का बोलना भले अनावश्यक लगे, मगर ऐसी किसी घटना पर क्या प्रधानमंत्री का कुछ कहना आवश्यक नहीं?

राहुल गांधी ने एक दिन पहले ही पंजाब में एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा, "एक लड़की के साथ रेप होता है और सारा प्रशासन उसके परिवार को निशाना बनाता है. मगर देश के प्रधानमंत्री एक शब्द भी नहीं कहते."

दलित संगठन भीम आर्मी के नेता चंद्रशेखर आज़ाद ने भी प्रधानमंत्री की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए सवाल किया, "हाथरस के वहशीपन पर मोदी जी ख़ामोश क्यों हैं? जिस यूपी से वे दूसरी बार सदन मे पहुँचे हैं उसी यूपी में हाथरस भी है क्या पीएम यह नहीं जानते? हमारी बहन को कचरे की तरह जलाया गया इस पर चुप्पी क्यों ?"

हाथरस मामले में प्रधानमंत्री की चुप्पी पर और भी कई लोगों ने सवाल उठाए हैं, सोशल मीडिया पर भी लगातार टिप्पणियाँ होती रहीं.

लेकिन हाथरस अकेला मामला नहीं है जहाँ प्रधानमंत्री मोदी से बोलने की अपेक्षा की गई है, मगर वो मौन रहे.

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प्रधानमंत्री का बोलना आवश्यक?

पर क्यों नहीं बोलते प्रधानमंत्री? उनका बोलना आवश्यक है या अनावश्यक?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि प्रधानमंत्री से ये अपेक्षा करना कि वो हाथरस जैसे मामलों में कुछ बोलेंगे वो ना तो तार्किक है, ना ही व्यावहारिक.

वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप सिंह कहते हैं, "अगर आप एनसीआरबी (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो) के आँकड़े उठाकर देखें तो हर घंटे बलात्कार के मामले हो रहे हैं देश में, अगर प्रधानमंत्री हर मुद्दे पर बोलने लगेंगे तो इसके अलावा काम ही नहीं रहेगा. उनकी पार्टी बोल रही है, मुख्यमंत्री बोल रहे हैं, मामले की जाँच हो रही है, फिर प्रधानमंत्री को क्यों बोलना चाहिए इसपर?"

वो इसमें एक और मुश्किल की ओर ध्यान दिलाते हुए कहते हैं, "मान लीजिए इस घटना पर वो बोल दें, 10 दिन बाद फिर कुछ हो जाए तो उन्हीं के पार्टी के लोग बोलेंगे कि यूपी वाली घटना पर आपने बोला, राजस्थान पर क्यों नहीं बोल रहे, या मध्य प्रदेश या छत्तीसगढ़ की घटना पर क्यों नहीं बोल रहे, तो प्रधानमंत्री अगर बोलना शुरू कर देंगे फिर तो मुश्किल हो जाएगी."

वरिष्ठ पत्रकार अदिति फ़डनीस भी मानती हैं कि इस मामले में प्रधानमंत्री से कुछ बोलने की अपेक्षा करना सही नहीं है, और अगर वो बोलते भी हैं तो उससे बहुत फ़र्क़ नहीं पड़ेगा.

वो कहती हैं, "इसके बारे में आप बोल क्या सकते हैं? यही ना कि राज्य सरकार ने ठीक काम किया क्योंकि वो राज्य सरकार की आलोचना तो कर नहीं सकते, तो जैसे-जैसे भाजपा का वर्चस्व बढ़ता जाएगा, हम देखेंगे कि मोदी जी स्वयं कुछ नहीं बोलेंगे, ख़ास तौर पर जब चीज़ें गड़बड़ होंगी उस समय."

अदिति बताती हैं कि ऐसे मामलों में चुप रहने के पीछे नरेंद्र मोदी का मुख्यमंत्री के तौर पर अपना ख़ुद का अनुभव भी एक वजह हो सकती है.

अदिति कहती हैं, "जब वो मुख्यमंत्री थे और अटल जी ने कहा था कि मुख्यमंत्री को मेरा संदेश यही है कि राजधर्म का पालन होना चाहिए, तो वो तो भुक्तभोगी हैं ना, उन्हें शायद लगता होगा कि मुख्यमंत्रियों को छोड़ देना चाहिए अपना काम करने के लिए."

प्रदीप सिंह कहते हैं कि विपक्ष तो ज़रूर चाहेगा कि प्रधानमंत्री ऐसे विषयों पर बोलें जिससे सरकार मुश्किल में आ सकती है, मगर कोई भी प्रधानमंत्री इस जाल में क्यों फँसना चाहेगा.

वो एक पुरानी घटना की याद दिलाते हुए कहते हैं, "इसका सबसे बड़ा उदाहरण राजीव गांधी हैं, बोफ़ोर्स पर विपक्ष आरोप लगाता गया और वो जवाब देते गए और आख़िर में क्या हुआ, नारा लगा कि गली-गली में शोर है, राजीव गांधी चोर है."

'मनमोहन भी मौन थे'

यहाँ एक सवाल ये भी उठता है कि मोदी के चुप रहने पर तो सवाल पूछे जा रहे हैं, पर क्या मोदी से पहले के प्रधानमंत्री ऐसे मामलों पर बोलते रहे हैं?

अदिति फ़डनीस इसके जवाब में कहती हैं, "कहाँ बोलते थे? इतना बड़ा निर्भया कांड हुआ, मनमोहन सिंह ने कुछ नहीं कहा."

वो कहती हैं कि राजनीति में चुप रहने की रणनीति बहुत पुरानी है, सभी लोग मुश्किल के मौक़ों पर इसे अपनाते रहे हैं.

अदिति याद दिलाती हैं कि लॉकडाउन के समय प्रवासियों की समस्या पर प्रधानमंत्री कुछ नहीं बोले जो कि पूरी तरह से अव्यवस्था थी, और जीएसटी मामले में भी राज्य सरकारों ने केंद्र के ख़िलाफ़ मुहिम छेड़ी हुई है, उसपर भी वो चुप हैं,

वो कहती हैं कि जहाँ भी राज्य सरकारों का सवाल होता है, वहाँ वो बीजेपी के नेता बन जाते हैं.

अदिति कहती हैं, "वे ममता बनर्जी को जमकर लताड़ते हैं, मगर प्रवासी संकट पर नीतीश कुमार की आलोचना जैसी कोई बात नहीं की. शिवसेना को लेकर भी उन्होंने कुछ नहीं कहा, जबकि शिवसेना ने भी सुर को काफ़ी ऊँचा किया था, क्योंकि उन्हें लगता होगा कि शिवसेना किसी भी समय वापस आ सकती है, तो क्यों संबंध ख़राब करें."

मोदी और मीडिया

पर विश्लेषक ये बात ज़रूर कहते हैं कि मीडिया से संवाद के मामले में मोदी दूसरे प्रधानमंत्रियों से अलग हैं.

प्रदीप सिंह बताते हैं कि मोदी ने स्वयं इसकी वजह बताई थी.

वो कहते हैं, "मोदी ने कहा कि 2002 के दंगों के बाद 2007 तक उन्होंने मीडिया के सारे सवालों का जवाब दिया. मगर उनका कहना था कि लोग लिखते वही थे जो उनको लिखना था, मैं क्या कह रहा हूँ उससे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता. तो उसके बाद उन्होंने बात करना बंद कर दिया."

अदिति फ़डनीस बताती हैं कि मुख्यमंत्री बनने से पहले मोदी बहुत मिलनसार थे, मीडिया से मिलते जुलते भी थे और उनका इस्तेमाल भी करते थे.

वो कहती हैं, "ये बड़ा जटिल मामला है. मोदी सरकार ही नहीं सारी सरकारें मीडिया को एक राह का काँटा मानती रही हैं."

प्रदीप सिंह कहते हैं, "मोदी को ये भी लगता होगा कि मीडिया के विरोध के बावजूद मैं यहाँ पहुँचा हूँ तो मैं इनपर क्यों ध्यान दूँ, क्यों समय बर्बाद करूँ."

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