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नीतीश कुमार के ख़िलाफ़ बीजेपी और चिराग पासवान में है मौन सहमति?
- Author, रजनीश कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, पटना (बिहार) से
राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) के बिहार प्रदेश अध्यक्ष जगदानंद सिंह पटना के वीरचंद पटेल मार्ग स्थित पार्टी दफ़्तर में अपने समर्थकों के साथ बैठे हैं.
यहाँ सबकी निगाहें टीवी पर हैं. जेडीयू और बीजेपी में गठबंधन की घोषणा की प्रेस कॉन्फ़्रेंस चल रही है. जगदानंद सिंह कहते हैं इस बार बीजेपी ने नीतीश कुमार को ठिकाने लगाने की पूरी योजना बना ली है.
आरजेडी के एक नेता कहते हैं, ''सर, राजेंद्र सिंह तो लोजपा में चले गए. 2015 में इन्हें बीजेपी का सीएम उम्मीदवार बताया जा रहा था. झारखंड में बीजेपी के संगठन मंत्री रहे. सर, सब कुछ सेट है. बीजेपी ही एलजेपी के उम्मीदवार तय कर रही है.''
इस पर जगदानंद सिंह कहते हैं, ''बीजेपी के संगठन मंत्री की बड़ी हैसियत होती है. भला इतना कुछ छोड़कर कोई विधायक के लिए क्यों दांव लगाएगा. नीतीश कुमार ने हमें धोखा दिया था, अब उन्हें पता चलेगा.''
जगदानंद सिंह की इस बात पर उनके चेंबर में बैठे सभी नेता सहमति जताते हैं. इसी दौरान टीवी पर एक ब्रेकिंग चलती है- आरजेडी में आए 'अनंत' बाहुबली, मोकामा से मिला टिकट. इस पर मैंने पूछा कि आपने अनंत सिंह को टिकट क्यों दिया? जगदानंद सिंह ने कहा, ''कल तक नीतीश के लिए वो ठीक थे और हमारे लिए ख़राब हो गए?''
राजेंद्र सिंह से पूछा कि क्या आपको बीजेपी ने एलजेपी का उम्मीदवार बनाया है? बीजेपी में आपकी एक हैसियत थी, अचानक एक विधायक के टिकट के लिए एलजेपी में क्यों चले गए?
राजेंद्र सिंह कहते हैं, ''दिनारा के लोग चाहते थे कि मैं चुनाव लड़ूँ. इस बार भी ये सीट जेडीयू के पास चली गई. मैं जनता के दबाव में चुनाव लड़ रहा हूँ. लेकिन पार्टी बदलने से मेरी विचारधारा नहीं बदली है. मैं अब भी उसी विचारधारा के साथ हूँ.''
पटना के सभी राजनीतिक दलों में इस बात की चर्चा गर्म है कि बीजेपी ने इस बार नीतीश कुमार को राजनीतिक रूप से ठिकाने लगाने के लिए सारे दाँव खेल दिए हैं.
एलजेपी बिहार में सभी सीटों पर जेडीयू के ख़िलाफ़ उम्मीदवार उतारेगी.
चिराग पासवान ने कहा है कि उनकी पार्टी बिहार में 143 सीटों पर चुनाव लड़ेगी और अगर ऐसा होता है तो ज़ाहिर है कि 21 उन सीटों पर भी उम्मीदवार उतारेगी, जहाँ बीजेपी चुनाव लड़ रही है. क्या बीजेपी और एलजेपी में कोई मौन गठबंधन है?
'बेलगाम महत्वाकांक्षा'
जेडीयू प्रवक्ता राजीव रंजन प्रसाद कहते हैं, ''ऐसा अब नहीं लगता. अब तो स्पष्ट हो गया है कि बीजेपी 121 और जेडीयू 122 सीटों पर चुनाव लड़ेगी. यह चुनाव बहुत ही ध्रुवीकृत होने जा रहा है और लड़ाई एनडीए बनाम आरजेडी ही है. बाक़ियों को जो करना हैं करें.''
'मैं चिराग को लेकर यही कहूँगा कि बेलगाम महत्वाकांक्षा अक्सर औंधे मुँह गिरा देती है. रामविलास जी होते तो स्थिति दूसरी होती. अभी वो बीमार हैं, इसलिए इतना कुछ हुआ है.''
राजीव रंजन कहते हैं, ''जिस गठबंधन में नीतीश कुमार रहेंगे, उस गठबंधन की जीत होगी. कोई इस मुगालते में ना रहे कि बिना नीतीश कुमार के चुनाव जीत लेगा और सरकार बना लेगा.''
''बीजेपी और एलजेपी में मौन सहमति की आशंका लोगों में है लेकिन जैसे-जैसे चुनाव क़रीब आएगा, स्थिति और स्पष्ट हो जाएगी. बीजेपी ने साफ़ कह दिया है कि प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर केवल एनडीए ही इस्तेमाल करेगा और बिहार में एलजेपी अब एनडीए में नहीं है.''
हालाँकि ऐसा भी नहीं है कि रामविलास पासवान और नीतीश कुमार के रिश्ते बहुत अच्छे रहे हैं. फ़रवरी 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था.
रामविलास पासवान की पार्टी से 29 विधायक जीते थे और उन्होंने किसी का भी समर्थन नहीं किया था.
अक्तूबर 2005 में फिर से चुनाव हुआ और एलजेपी अप्रासंगिक हो गई क्योंकि बीजेपी और जेडीयू को स्पष्ट बहुमत मिल गया था. दूसरी ओर एलजेपी फ़रवरी के प्रदर्शन को दोहरा नहीं पाई थी और 10 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा था.
2015 में नीतीश कुमार और लालू प्रसाद यादव साथ आ गए. एलजेपी को बीजेपी ने 42 सीटें दीं, लेकिन जीत महज दो सीटों पर मिली. इस बार जेडीयू एलजेपी को 15 सीट से ज़्यादा देने पर तैयार नहीं थी और एलजेपी 42 से कम सीटों पर लड़ने के लिए तैयार नहीं थी.
नीतीश कुमार और रामविलास पासवान में दलित वोटों को लेकर भी जंग है. हाल ही में नीतीश कुमार ने अशोक चौधरी को कार्यकारी अध्यक्ष बना दिया है. अशोक चौधरी पासी जाति से हैं और नीतीश कुमार ने इस जाति को महादलित श्रेणी में रखा है.
नीतीश कुमार में दलित जातियों के बीच भी एक लक़ीर खींची. उनका तर्क था कि दलितों के बीच जिन जातियों को सरकारी योजनाओं का फ़ायदा नहीं पहुँच पाया है, उन पर प्राथमिकता के आधार पर ध्यान दिया जाएगा.
बिहार में दलित वोट को लेकर नीतीश और चिराग में जंग
नीतीश कुमार ने चिराग पासवान की जाति दुसाध को पहले महादलित की कैटेगरी में नहीं रखा था, बाक़ी सभी दलित जातियों को महादलित की श्रेणी में डाल दिया गया था.
हालाँकि बाद में दुसाध जाति को भी महादलित की श्रेणी में डाल दिया गया.
2011 की जनगणना के अनुसार बिहार में दलितों की 93.3 फ़ीसदी आबादी गाँवों में रहती है.
बिहार में गया, कैमूर, वैशाली, औरंगाबाद और नालंदा में दलितों की आबादी सबसे सघन है. जनगणना में सूचीबद्ध 23 अनुसूचित जातियों में चमार जाति का सबसे बड़ा हिस्सा है.
कुल दलितों में इनकी तादाद 31.3 फ़ीसदी है. इसके बाद दुसाध यानी पासवान हैं. ये 30 प्रतिशत हैं.
बिहार में दलितों की कुल आबादी के 16 फ़ीसदी है और चुनावी राजनीति में नई सरकार बनाने और पुरानी सरकार गिराने में इनके वोट की अहम भूमिका है.
क्या बिहार में अब बीजेपी 'बिग ब्रदर' है?
यह पहली बार हो रहा है जब एनडीए में बीजेपी और जेडीयू बराबर सीटों पर चुनाव लड़ रही हैं. इसके पहले बीजेपी को कम सीटें मिलती थीं.
अक्तूबर 2005 के बिहार विधानसभा चुनाव में जेडीयू 139 सीटों पर लड़ी और उसे 88 सीटों पर जीत मिली.
इसी चुनाव में बीजेपी 102 सीटों पर लड़ी और 55 पर जीत मिली. 2010 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी को 102 सीटें ही मिलीं, जबकि जेडीयू 141 सीटों पर लड़ी. इस चुनाव में बीजेपी 91 सीट जीतने में कामयाब रही और जेडीयू 115 सीट.
2015 में बीजेपी और जेडीयू ने अलग-अलग चुनाव लड़े.
पटना में बीजेपी दफ़्तर के एक पदाधिकारी ने नाम नहीं लिखने की शर्त पर बताया कि जेडीयू के साथ सीटों के बँटवारे पर हो रही बैठक में बिहार में बीजेपी के चुनाव प्रभारी देवेंद्र फडणवीस ने ललन सिंह के सामने फ़ाइल फेंक दी थी और कह दिया था कि 2015 की तरह इस बार भी जहाँ जाना है, जा सकते हैं.
उस बैठक से देवेंद्र फडणवीस और भूपेंद्र यादव ग़ुस्से में निकल गए थे. बीजेपी पदाधिकारी ने बताया कि नीतीश कुमार की बीजेपी ने बहुत सुन ली है और अब बारी उनकी है.
वही एलजेपी के आईटी सेल का काम देखने वाले एक व्यक्ति ने नाम नहीं लिखने की शर्त पर कहा कि बीजेपी और एलजेपी में इस बात पर सहमति है कि एलजेपी इतनी सीटें जीत ले कि नीतीश कुमार की ज़रूरत नहीं पड़े.
उन्होंने यह भी कहा कि मुख्यमंत्री के रूप में बीजेपी में नित्यानंद राय, रविशंकर प्रसाद और आरके सिंह का नाम आगे चल रहा है. इन तीनों नामों पर बीजेपी के उस पदाधिकारी ने भी सहमति जताई.
दूसरी तरफ़ कांग्रेस भी जेडीयू का इंतज़ार कर रही थी कि बीजेपी के साथ उसका गठबंधन नहीं हो और वो ख़ुद आरजेडी से करने के बदले जेडीयू से कर ले.
कांग्रेस के एक पूर्व अध्यक्ष ने कहा, ''आरजेडी के सामने हमने 70 से ज़्यादा सीटों की मांग की थी. लालू जी 55 से ज़्यादा देने को तैयार नहीं थे. दूसरी तरफ़ नीतीश कुमार और बीजेपी में भी ठनी हुई थी. ऐसे में हम इंतज़ार कर रहे थे कि नीतीश कुमार बीजेपी से अलग हों और कांग्रेस उनसे गठबंधन कर ले. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हमें आरजेडी ने भले 70 सीटें दी हैं, लेकिन वो खीझ में हमें हराने की भरपूर कोशिश कर रहा है. इसीलिए उसने हमें जानबूझकर हारने वाली सीटें दी हैं.''
इस बार का बिहार चुनाव एकदम से उलझता हुआ दिख रहा है. इन दोनों गठबंधन के अलावा मैदान में ओवैसी की पार्टी भी हैं.
इसके साथ ही उपेंद्र कुशवाहा और पप्पू यादव भी हैं. इन दोनों से आरजेडी और कांग्रेस को ज़्यादा नुक़सान होने की बात कही जा रही है. लेकिन इस बात को कोई मानने के लिए तैयार नहीं है कि बीजेपी और एलजेपी में कोई मौन सहमति नहीं है.
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