मामला सुदर्शन टीवी का तो फिर निशाना डिजिटल न्यूज़ पर क्यों?

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    • Author, प्रियंका दुबे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पिछले दिनों केंद्र सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में डिजिटल मीडिया को नियंत्रित करने की गुहार लगाता हुआ एक शपथपत्र सुप्रीम कोर्ट में दाख़िल किया गया. इसके तुरंत बाद डिजिटल मीडिया के कटेंट को नियंत्रित करने और लोकतंत्र पर पड़ने वाले इसके असर पर बहस शुरू हो गई.

सूचना-प्रसारण मंत्रालय की ओर से अवर सचिव विजय कौशिक ने जब डिजिटल मीडिया के लिए नियमावली बनाने की अर्ज़ी अदालत में पेश की तब दरअसल सुनवाई सुदर्शन टीवी से जुड़े विवाद पर हो रही थी.

सुदर्शन टीवी के कार्यक्रम 'बिंदास बोल' में भारतीय प्रशासनिक सेवाओं में मुसलमानों की भर्ती को लेकर कथित तौर पर साम्प्रदायिक और विवादास्पद सामग्री प्रसारित की है. उसके प्रोमो पर ही शिकायत होने के बावजूद सूचना-प्रसारण मंत्रालय ने 11 से 14 सितंबर के बीच कार्यक्रम के चार एपिसोड प्रसारित होने दिए.

सुदर्शन न्यूज़ के संपादक सुरेश चव्हानके

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जस्टिस चंद्रचूड़, जस्टिस इंदू मल्होत्रा और जस्टिस केएम जोसफ़ की बेंच सुदर्शन टीवी के खिलाफ़ दायर की गई याचिका की सुनवाई कर रही है.

शपथ पत्र दाख़िल करते हुए सरकार ने कहा कि टीवी और प्रिंट मीडिया से ज़्यादा इस वक़्त डिजिटल मीडिया को नियंत्रित करने के लिए नियम और दिशानिर्देश बनाने की ज़रूरत है.

'टीवी और प्रिंट तो ठीक है, डिजिटल को नियंत्रित करें'

अपने शपथपत्र में सरकार ने कहा कि डिजिटल मीडिया पर कोई भी संदेश प्रसारित करने के लिए सिर्फ़ एक स्मार्टफ़ोन और इंटरनेट की ज़रूरत होती है और वह संदेश देखने-सुनने के लिए भी सिर्फ़ इंटरनेट कनेक्शन के साथ फ़ोन की ज़रूरत पड़ती है. इस तरह से यूट्यूब, फ़ेसबुक जैसे माध्यमों से किसी भी प्रसारित सामग्री को 'वायरल' करवाया जा सकता है.

शपथपत्र में आगे यह भी कहा गया कि एक ओर जहाँ प्रिंट और टीवी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों के लिए 'कोड ऑफ़ कंडक्ट' या आचार संहिता मौजूद है, वहीं डिजिटल माध्यमों में कंटेंट की कोई नियमावली नहीं है.

टीवी और प्रिंट की तरह यहां वेबसाइट शुरू करने के लिए कोई लाइसेंस भी नहीं लेना पड़ता और न ही रजिस्ट्रेशन की ही कोई प्रक्रिया है. सरकार ने वेबपोर्टल और सोशल मीडिया पर प्रसारित होने वाले कंटेंट को समाज के लिए घातक और ख़तरनाक बताया और अदलात से वेब-स्पेस में प्रसारित होने वाली सामग्री को नियंत्रित करने के लिए नियमावली बनाने या दिशानिर्देश जारी करने पर विचार करने को भी कहा.

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वेबसाइटों पर लागू होते हैं क़ानून

इस बारे में बीबीसी से बात करते हुए 'द न्यूज़मिनट' की संपादक धन्या राजेंद्रन ने कहा, "मेरा पहला सवाल यह है कि सरकार एक टीवी चैनल की सुनवाई के मामले में इस बात को क्यों उठा रही है? एक ऐसा टीवी न्यूज़ चैनल जो पहले से ही नियमों और आचार संहिता के तहत काम करता है और इस बार सीधे-सीधे उन नियमों का उल्लंघन करता हुआ नज़र आ रहा है- तो क्या इसे असली मुद्दे से ध्यान भटकाने की कोशिश नहीं माना जाना चाहिए?"

वे कहती हैं, "हमें एक बात नहीं भूलनी चाहिए कि वेबसाइटों और सोशल मीडिया पर सामग्री प्रसारित करने वाले लोग भी भारतीय क़ानून के तहत ही काम करते हैं. आइपीसी और मानहानि वग़ैरह की सभी धाराएँ हम पर भी हमेशा से पूरी तरह लागू होती हैं".

पहले भी हो चुकी है ऐसी कोशिश

मार्च 2018 में तत्कालीन सूचना-प्रसारण मंत्री स्मृति इरानी ने भी डिजिटल मीडिया को नियंत्रित करने की पहल करते हुए इस मामले में दिशा-निर्देशों और क़ानून बनाने पर सुझाव देने के लिए एक नौ सदस्यीय कमेटी का गठन भी किया था. लेकिन कुछ ही दिनों बाद उनका मंत्रालय बदल गया और जुलाई 2018 में इस कमेटी को ख़त्म कर दिया गया.

डिजिटल मीडिया को नियंत्रित करने के लिए फ़िलहाल भारत में अलग से कोई क़ानून नहीं है. हालांकि, प्रिंट मीडिया के लिए रजिस्ट्रेशन और टीवी मीडिया के लिए लाइसेंसिंग की प्रक्रिया मौजूद है.

अख़बार

समाचार प्रसारकों का पक्ष

इस बीच, सुप्रीम कोर्ट में एक शपथपत्र दाख़िल करते हुए न्यूज़ ब्रॉडकास्टर्स एसोसिएशन (एनबीए) ने कहा है कि अदालत उन्हें टीवी मीडिया से जुड़े एक इंटरनल रेगुलेटर के तौर पर मान्यता दे ताकि सभी न्यूज़ चैनल उसके दिशा-निर्देशों का पालन करने के लिए बाध्य हों.

सुदर्शन टीवी वाले मामले की सुनवाई के दौरान ही जस्टिस चंद्रचूड़ ने एनबीए से पूछा था कि अब वह अपने दिशा-निर्देशों का पालन क्यों नहीं करवा पाती?

जवाब में शपथपत्र दाख़िल करते हुए एनबीए ने कहा कि न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग स्टैंडर्ड एसोसिएशन (एनबीएसए) के तहत उनकी आचार संहिता को 'केबल टीवी नियमों' का हिस्सा बनाकर क़ानूनी मान्यता दी जाए ताकि सभी समाचार चैनलों के लिए इन निर्धारित दिशा-निर्देशों का पालन करना अनिवार्य हो.

न्यूज़ चैनल्स के माइक

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टीवी न्यूज़ और मनमानी

'न्यूज़वर्दी' नाम की डिजिटल मीडिया संस्था चलाने वाली वरिष्ठ पत्रकार अनुभा भोंसले बताती हैं कि नियामक दिशा-निर्देशों का अपना महत्व है लेकिन सवाल यह है कि पूरी तरह उनका पालन कौन करता है?

वे कहती हैं, "सुदर्शन टीवी का मामला यह साफ़ बताता है कि दिशा-निर्देशों की भूमिका कितनी कम रह गयी है. यह तथ्य है कि पत्रकारिता के सभी नियमों को ताक पर रख रहे और वैमनस्य भड़का रहे एक कार्यक्रम पर रोक लगाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में जाना पड़ा."

अनुभा कहती हैं कि सुदर्शन टीवी का मामला "यह बताने के लिए काफ़ी है कि टीवी के लिए जारी दिशा-निर्देशों का उल्लंघन किया जा रहा है. अगर टीवी प्रसारण के लिए जारी दिशा-निर्देशों का अक्षरशः पालन किया जाए तो आज प्रसारित हो रही ज़्यादातर सामग्री प्रसारण के लायक़ समझी ही नहीं जाएगी".

वरिष्ठ मीडिया विश्लेषक और पत्रकार सेवंती नैनन अनुभा की बात को आगे बढ़ाते हुए कहती हैं, "1995 में भी सुप्रीम कोर्ट ने टीवी मीडिया से ख़ुद ही अपने लिए एक स्वतंत्र और सक्षम नियामक संस्था बानने की माँग की थी. लेकिन वह आज तक सम्भव नहीं हो पाया. आज हमारे पास एनबीएसए है जिसके दिशा-निर्देशों का पालन करने की बाध्यता नहीं है".

दूसरी ओर, सूचना-प्रसारण मंत्रालय भी परोक्ष रूप से एक नियामक संस्था के तौर पर काम करता है क्योंकि लाइसेंस देने और चैनलों के अप-लिंक को मंज़ूरी देने का अधिकार मंत्रालय के पास है.

अनुभा कहती हैं, "अभी यह साफ़ नहीं है कि डिजिटल स्पेस को नियमित करने के मामले में सरकार की नीति क्या होगी और इसका नतीजा डिजिटल मीडिया में काम करने वालों पर कैसे और कितना पड़ेगा. शायद शुरुआत पत्रकारिता करने के लिए एक यूट्यूब चैनल को पंजीकृत कराने से हो!"

सोशल मीडिया

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डिजिटल मीडिया की ताक़त

दूसरी तरफ़, कुछ ऐसे भी डिजिटल मीडियाकर्मी हैं जिन्हें लगता है कि डिजिटल मीडिया सरकार की लोकतांत्रिक आलोचना का लगभग अंतिम मोर्चा है और इसलिए उस पर शिकंजा कसा जा रहा है.

कई वरिष्ठ पत्रकार टीवी और प्रिंट से अलग होने के बाद अपने यूट्यूब चैनल चला रहे हैं, इनमें से ज़्यादातर लोग अपने डिजिटल कंटेंट को प्रसार देने के लिए सोशल मीडिया की मदद लेते हैं, इस तरह डिजिटल कंटेंट और सोशल मीडिया भी एक दूसरे से ऐसे जुड़ गए हैं कि उन्हें अलग करके नहीं देखा जा सकता.

यूट्यूब पर अपना चैनल चलाने वाले वरिष्ठ पत्रकार अजित अंजुम बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, "आप कुछ हालिया उदाहरण ले लीजिए. प्रधानमंत्री के जन्मदिन के दिन युवाओं ने लाखों ट्वीट कर 'बेरोज़गारी दिवस' को ट्रेंड करवा दिया. इस तरह रेलवे जब भर्तियों की तारीख़ें जारी नहीं कर रहा था तब युवाओं ने सोशल मीडिया पर कैम्पेन चला कर अपनी बात को रखा".

कई टीवी चैनलों में शीर्ष पदों पर रह चुके अजित अंजुम कहते हैं, "ऐसे में अब यह साफ़ है कि यहां अब भी एक आलोचनात्मक स्पेस बचा है. जहां तक न्यूज़ मीडिया की बात है, अगर सभी माध्यमों के लिए दिशा-निर्देश जारी करने की बात होती तो शायद बात समझ भी आती. लेकिन टीवी को छोड़कर डिजिटल पर निशाना? वैमनयस्य टीवी से आ रहा है तो शिकंजा डिजिटल पर क्यों?"

न्यूज़

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निर्णायक की भूमिका में कौन होगा?

मीडिया विश्लेषक मुकेश कुमार कहते हैं कि "यह बिल्कुल सच है कि बहुत सारी ऐसी वेबसाइटें बन गई हैं जो रात-दिन झूठ फैला रही हैं, ख़बरें देने की जगह प्रोपगैंडा फैला रही हैं, यही वजह है कि पिछले कुछ समय से लगभग सभी प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों ने फ़ैक्टचेक की टीमें बनाई हैं. वे अपनी तरफ़ से झूठ के तंत्र से लड़ने की कोशिश कर रहे हैं."

डिजिटल मीडिया को नियंत्रित करने की कोशिश के बारे में मुकेश कुमार कहते हैं, "डिजिटल मीडिया और सोशल मीडिया का मूल चरित्र ही लोकतांत्रिक है, उसकी बहुत बड़ी चुनौतियाँ भी हैं लेकिन डिजिटल मीडिया को नियंत्रित करके अगर कोई भी सरकार आलोचना को रोकना चाहती है तो अदालत को समझना चाहिए कि ऐसा करना लोकतंत्र की मूल भावना के विपरीत होगा."

मीडिया पर नियमित कॉलम लिखने वाले मुकेश कुमार कहते हैं, "यह व्यावहारिक भी नहीं है, आप किन-किन प्लेटफ़ॉर्म पर लोगों को अपनी बात कहने से रोकेंगे, कैसे रोकेंगे, चीन की तरह आप पूरे प्लेटफ़ॉर्म को ही बैन कर सकते हैं लेकिन वह लोकतांत्रिक तरीक़ा नहीं है."

फ़ेक न्यूज़ की पोल खोलने वाली वेबसाइट 'ऑल्ट न्यूज़' के सम्पादक प्रतीक सिन्हा को लगता है कि किसी भी क़ानून का भविष्य इस बात से तय होगा कि कटेंट की गुणवत्ता जाँचने का अधिकार किसके पास है.

प्रतीक कहते हैं, "जब भी सूचना के माध्यमों को नियंत्रित करने के बारे में मुझसे पूछा जाता है तो मैं यही कहता हूँ कि इस बारे में हमें बहुत सतर्क रहकर निर्णय लेने की ज़रूरत है क्योंकि फिर भविष्य इसी बात पर निर्भर करेगा कि कटेंट की गुणवत्ता जाँचने का अधिकार किसके पास है क्योंकि जिसके पास भी यह अधिकार होगा, चीज़ें उसी के अनुरूप होंगी".

यही सबसे असल बात है कि नियंत्रण किसके पास हो, सरकार जिसके पास पहले से ही असीमित अधिकार हैं अगर वह डिजिटल मीडिया को भी अपने नियंत्रण में ले ले तो सरकार की आवाज़ से अलग कोई आवाज़ कैसे सुनाई देगी?

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