You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
मॉनसून सत्र: ना विपक्ष, ना लोकतांत्रिक बहस और संसद में पास हो गए विवादित बिल
- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बुधवार को संसद के मॉनसून सत्र का आख़िरी दिन था. एक अक्टूबर को ख़त्म होने वाले इस सत्र को तय वक़्त से आठ दिन पहले ही ख़त्म कर दिया गया. 10 दिनों तक चले इस सत्र में लोकसभा में 25 विधेयक पारित किए गए और 16 नए विधेयक पेश किए गए. वहीं राज्यसभा में भी 25 विधेयक पारित हुए और छह नए विधेयक पेश हुए.
कोविड-19 के बढ़ते मामलों के बीच ये सत्र कई तरह से ऐतिहासिक रहा. पहली बार सांसदों ने रात भर संसद परिसर के अंदर धरना दिया. सत्र से पहले सांसदों की कोरोना जाँच हुई, सदन ने शनिवार और रविवार को भी काम किया. इस सत्र में ज़बरदस्त हंगामा भी हुआ, विरोध प्रदर्शन भी हुआ और सांसदों का निलंबन भी हुआ.
सोमवार को जब राज्यसभा के सभापति वैंकैया नायडु ने आठ राज्यसभा सांसदों को निलंबित किया तो विपक्ष ने सदन का बायकॉट किया. विपक्ष की ग़ैर-मौजूदगी के बीच मंगलवार-बुधवार को राज्यसभा में सात बिल बिना लोकतात्रिंक बहस के ही पास हो गए. इनमें लेबर कोड और एफ़सीआरए यानी फ़ॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट जैसे विवादित बिल भी पास किए गए.
आइए जानते हैं उन विधेयकों के बारे में
फ़ॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट 2020
ये बिल ग़ैर-सरकारी संगठन यानी एनजीओ के लिए है. अब एनजीओ को रजिस्ट्रेशन के वक़्त अपना आधार नंबर देना होगा ताकि विदेशी फ़ंड पर नज़र रखी जा सके. इसके साथ ही अब तक जहाँ नॉन- प्रॉफ़िटेबल संस्थाओं के प्रशासनिक कार्यों में 50 फ़ीसद विदेशी फ़ंड का इस्तेमाल हो सकता था, उसे घटा कर 20 फ़ीसद कर दिया गया है. अब विदेशों से मिलने वाले फ़ंड को स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया की नई दिल्ली ब्रांच से ही रिसीव किया जा सकेगा.
ये बिल सोमवार को लोकसभा में पास किया गया और बुधवार को इसे राज्यसभा ने भी पास कर दिया. राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद ये बिल अब क़ानून बन जाएगा.
एनजीओ को मिलने वाले विदेशी फ़ंडिंग पर लगाम लगाने की पहल के तौर पर इस बिल को देखा जा रहा है. सरकार मानती है कि विदेशों से मिलने वाले फ़ंड को रेगुलेट करना चाहिए ताकि ये फ़ंड किसी भी सूरत में देश विरोधी गतिविधियों में इस्तेमाल ना हों सके.
लेकिन बीते दिनों में कुछ एनजीओ और उनसे जुड़े समाजिक कार्यकर्ताओं ने जिस तरह लगातार सरकार की आलोचना की है, उसके बाद सरकार के इस क़दम को उसी संदर्भ से जोड़ कर देखा जा रहा है.
हालांकि सरकार की ओर से ये साफ़ कहा गया है कि वह किसी भी तरह से एनजीओ की स्वतंत्रता में दख़ल नहीं देना चाहती है.
आवश्यक वस्तु अधिनियम (संशोधन) 2020
आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 में संशोधन करते हुए आवश्यक वस्तुओं की सूची से- दलहन, खाद्य तेल, प्याज़, आलू को हटा दिया गया है. यानी इनके स्टोरेज पर सरकार का नियंत्रण नहीं होगा और कोई भी कंपनी या व्यापारी इसका भंडारण कर सकेगी. अब सरकार इनके बाज़ार भाव में भी दख़ल नहीं देगी. ऐसे में व्यापारी इसे किसानों से ख़रीदेंगे और अपने हिसाब से इनका भंडारण कर सकेंगे. ऐसे में इसकी क़ीमत पर भी नियंत्रण नहीं होगा.
विपक्ष का कहना है कि इस नए संशोधन के बाद किसानों को उचित क़ीमत मिलेगी इसमें संदेह है.
इससे जुड़ा अध्यादेश सरकार इस साल जून में ला चुकी है, अब इसे क़ानून की शक्ल दी जा रही है.
नए क़ानून के बाद किसी असाधारण परिस्थिति जैसे- युद्ध, आपदा में ही अब इन वस्तुओं पर सरकार नियंत्रण रखेगी.
लेबर कोड बिल
मंगलवार को लोकसभा में तीन लेबर कोड बिल भी पास किए गए और बुधवार को राज्यसभा ने भी इन्हें पास कर दिया. ये तीन बिल हैं- ‘उपजीविकाजन्य सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यदशा संहिता 2020', ‘औद्योगिक संबंध संहिता 2020' और ‘सामाजिक सुरक्षा संहिता 2020'.
सरकार का कहना है कि इससे बिज़नेस करने में सहूलियत होगी. लेकिन ट्रेड यूनियन का कहना है कि ये नया लेबर कोड देश के मज़दूरों को 'ब्रितानी राज की दशा’ में वापस पहुँचा देगा. कहा जा रहा है कि अब तक मज़दूरों के लिए जो भी लड़ाई लड़ी गई और जो भी अधिकार उन्हें हासिल हो सके ये नया क़ानून एक झटके में उनके सालों के संघर्ष को छीन लेगा.
इनमें से एक बिल है - औद्योगिक संबंध संहिता 2020. इसके आने से कंपनियों के लिए कर्मचारियों को नौकरी से निकालना आसान हो जाएगा. अब 300 कर्मचारियों वाली कंपनियों को कर्मचारियों को नौकरी से निकालने के लिए सरकार से अनुमति नहीं लेनी होगी.
एक प्रावधान ये भी कहता है कि अब कर्मचारियों को हड़ताल पर जाने से 14 दिन पहले नोटिस देना होगा और इस नियम से लेबर यूनियन के लिए हड़ताल पर जाना मुश्किल हो जाएगा. इससे पहले पब्लिक यूटिलिटी सर्विस करने वालों को ही हड़ताल पर जाने से पहले नोटिस देना होता था. लेकिन अब नए क़ानून में सभी पब्लिक और प्राइवेट लेबर्स के लिए ये नोटिस ज़रूरी हो गया है.
उपजीविकाजन्य सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्यदशा संहिता 2020 के तहत मज़दूर किस परिस्थिति में काम कर रहा है और उसे कैसी सामाजिक सुरक्षा मिलनी चाहिए - इस बात का ज़िक्र है. इसमें सबसे ज़रूरी है कि कॉन्ट्रेक्ट पर काम करने वाले कर्मचारियों को भी वही फ़ायदे देने की बात कही गई है जो स्थायी कर्मचारियों के लिए होंगे. मसलन- दिन में 8 घंटे और सप्ताह में 6 दिन काम, ओवर टाइम काम करने की स्थिति में मिलने वाले पैसे तय सैलरी से अलग होंगे.
पहली बार अप्रवासी मज़दूर कौन हैं इसकी पहचान के लिए वित्तीय मापदंड तय किया गया है. अगर कोई शख़्स एक राज्य से दूसरे राज्य आया है, कहीं नौकरी कर रहा है या ख़ुद का व्यापार कर रहा है और महीने में आय 18,000 रुपये से कम है तो वह अप्रवासी मज़दूर की श्रेणी में आएगा.
लेकिन जानकार मानते हैं कि औद्योगिक संबंध संहिता कंपनियों को मज़दूरों के दोहन के लिए खुला हाथ दे देगा जो उनके मज़दूरों के अधिकारों के लिए ख़तरनाक साबित हो सकता है.
बैंकिंग रेगुलेशन (संशोधन) बिल 2020
बीते साल पंजाब-महाराष्ट्र सहकारी बैंक में सामने आए घोटाले को देखते हुए ये बिल लाया गया है. अब कॉपरेटिव बैंक भी रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया के अंतर्गत आएगा. खाताधारकों की पूंजी की रक्षा और सहकारी बैंकों के ऑपरेशन को बेहतर बनाने में इस नए क़ानून से मदद मिलेगी.
कंपनी (संशोधन) बिल 2020
छोटी-बड़ी कंपनियों को राहत देने के लिए सरकार की ओर से 'कंपनी (संशोधन) विधेयक-2020' को मंज़ूरी दी गई है. इसमें आर्थिक जुर्म की श्रेणी से कुछ अपराध बाहर किए गए हैं. इस नए बिल के दायरे में छोटी-बड़ी सभी कंपनियां आएंगी.
टैक्स एवं अन्य क़ानून बिल 2020
महामारी के समय में जिन टैक्स छूट की बात की गई थी अब उसे क़ानून की शक्ल दी गई है. मसलन- कोरोना के कारण सरकार ITR फ़ाइल करने के लिए अतिरिक्त समय दिया है, TDS-TCS को लेकर 2021 तक छूट देने की सहूलियत दी गई. ये अध्यादेश सरकार पहले ला चुकी थी जिसे अब सदन से भी पास कर दिया गया है.
कोविड, ड्रामा और सांसदों का निलंबन
बिना बहस के बिल पारित होने के अलावा भी ये सत्र कई मायनों में यादगार रहा.
संसद का सत्र शुरू होने से पहले ही लोकसभा सांसद मीनाक्षी लेखी, हनुमान बेनिवाल, गोड्डेटी माधवी, प्रताप राव जाधव कोरोना पॉज़िटिव पाए गए. इसके अलावा राज्यसभा के भी छह सांसद कोरोना पॉज़िटिव पाए गए.
ये सत्र शुरू होने से पहले ही सुर्ख़ियों में आया और रविवार को कुछ ऐसा हुआ कि राज्यसभा की कार्यवाही का प्रसारण कुछ देर के लिए रोकना पड़ गया.
रविवार को राज्यसभा में दो कृषि बिल पेश किए गए. पहला था - कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) विधेयक, 2020, और दूसरा कृषक (सशक्तिकरण व संरक्षण) क़ीमत आश्वासन और कृषि सेवा पर क़रार विधेयक, 2020.
इससे पहले गुरुवार को केंद्र सरकार में अकाली दल कोटे से मंत्री रहीं हरसिमरत कौर बादल ने इस बिल पर विरोध दर्ज कराते हुए अपने पद से इस्तीफ़ा दिया था.
बिल पर बहस शुरू हुई और इसके बाद उपसभापति हरिवंश ने सदन की कार्यवाही को पूरे दिन के लिए बढ़ा दिया लेकिन विपक्ष इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ था. विपक्ष के नेताओं की माँग थी कि बिल पर चर्चा के बाद वोटिंग हो.
जब उपसभापति ने विपक्ष की बात नहीं मानी, तो उच्च सदन में ज़बरदस्त हंगामा शुरू हो गया. तृणमूल कांग्रेस के सासंद डेरेक ओ ब्रायन उपसभापति के सामने जा कर हंगामा करते दिखे तो एक सांसद टेबल पर चढ़ गए. विपक्ष के विरोध के बावजूद ध्वनिमत से उपसभापति ने इन विवादित विधेयकों को पारित कर दिया.
विरोध में विपक्षी पार्टियाँ उपसभापति के ख़िलाफ़ अविश्वास प्रस्ताव ले कर आए.
सोमवार को ये विवाद एक क़दम और आगे बढ़ गया जब सभापति वैंकेया नायडु ने आठ सासंदों को निलंबित कर दिया और साथ ही उपसभापति के खिलाफ़ लाया गया अविश्वास-प्रस्ताव ये कहते हुए ख़ारिज कर दिया कि ये ‘नियमों के अनुरूप’ नहीं है. इसके लिए 14 दिन पहले नोटिस देना पड़ता है.
इसके बाद विपक्ष ने विरोध करते हुए सदन की कार्यवाही को बायकॉट कर दिया और जिस ढंग से वोटिंग हुई और अविश्वास-प्रस्ताव ख़ारिज कर दिया गया उसे लेकर सरकार की मंशा पर सवाल उठाए गए.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकतेहैं.)