कोरोना वायरस: भारत का ग्राफ़ सुधर रहा है या बात कुछ और है

    • Author, सरोज सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

जब से कोरोना वायरस के बारे में पढ़ना और लिखना शुरू किया है जॉन्स हॉपकिंस यूनिवर्सिटी की कोरोना वायरस रिसोर्स सेंटर के ग्राफ़ पर रोज़ एक बार नज़र दौड़ा ही लेती हूँ.

आज सुबह जैसे ही यूनिवर्सिटी की बेवसाइट पर नज़र पड़ी, भारत का कोरोना ग्राफ़ सबसे अलग नज़र आया. कर्व नीचे की ओर गिरता हुआ दिख रहा था.

और जैसे आप इस ग्राफ़ को देख कर हैरान है, ठीक उसी तरह मैं भी हैरान थी, क्या रोज़ 70-80 हज़ार नए मामले आने के बाद भारत का कोरोना ग्राफ़ सुधर रहा है?

लेकिन जवाब इतना आसान नहीं जितना आप समझ रहे हैं.

दरअसल जॉन्स हॉपकिंस का डेटा पिछले सात दिनों का औसत दिखाता है. इस ग्राफ़ के लिए वो पिछले सात दिनों में नए कोरोना मामलों की संख्या को देखते हैं.

कोरोना ग्राफ़ में कर्व के नीचे जाने का क्या मतलब हैं?

पुणे के सीजी पंडित नेशनल चेयर से जुड़े रमन गंगाखेडकर कहते हैं, "ग्राफ़ नीचे आने का मतलब केवल इतना है कि कम संख्या में नए कोरोना मामले सामने आ रहे हैं. लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि कोरोना का ख़तरा कम हो गया है."

कम टेस्ट होने की वजह से भी मामले कम सामने आ सकते हैं, कॉन्टेक्ट ट्रेसिंग ठीक नहीं होना भी इसके पीछे की वजह हो सकती है.

भारत में 22 सितंबर तक तकरीबन 6 करोड़, 62 लाख टेस्ट हो चुके हैं. आईसीएमआर के मुताबिक़ पिछले एक दिन में साढ़े नौ लाख टेस्ट हुए हैं. लेकिन इसमें से कितने RT-PCR टेस्ट हैं और कितने रैपिड एंटीजेन टेस्ट हैं - ये आँकड़े स्पष्ट नहीं हैं.

डॉक्टर रमन गंगाखेडकर के मुताबिक़, "कितने लोगों की प्रति दिन टेस्टिंग हो रही है, मैं इससे ज़्यादा महत्वपूर्ण इस बात को मानता हूँ कि कितने RT-PCR टेस्ट हुए और कितने रैपिड टेस्ट हुए हैं और रैपिड टेस्ट के बाद कितनों का फ़ॉलो-अप हुआ है. इसमें ये भी जानना ज़रूरी है कि पहले कितने रैपिड टेस्ट हो रहे थे और अब कितने हो रहे हैं. जब तक ये आँकड़े पता न हो, टेस्टिंग की संख्या के आधार पर भारत की कोरोना की सही तस्वीर नहीं खींची जा सकती."

टेस्टिंग के आधार पर नतीजे न निकालें

जानकारों की राय में रैपिड टेस्ट नेगेटिव आने के बाद उस शख्स का RT-PCR टेस्ट ज़रूर होना चाहिए. ख़ास तौर पर सिम्प्टोमैटिक मरीज़ों का. तभी कोरोना की वास्तविक स्थिति का पता चलेगा.

डॉक्टर रमन उदाहरण से इस बात को समझाते हैं. मान लीजिए किसी राज्य में अगर 10 फ़ीसदी ही RT-PCR टेस्ट हो रहे हैं और 90 फ़ीसदी रैपिड टेस्ट हो रहे हैं. बाद में टेस्ट की संख्या आधी हो जाती है. लेकिन पूरा का पूरा RT-PCR टेस्ट ही होने लगे, तो ये टेस्टिंग संख्या कम होने के बावजूद राज्य की कोरोना की सही तस्वीर पेश करेगी. लेकिन अगर RT PCR टेस्ट की संख्या कम हो रही है, तो ये चिंता का सबब है.

इसलिए पूरे टेस्ट में कितना RT-PCR टेस्ट है और कितना रैपिड टेस्ट है, इसके लिए हमें दोनों टेस्ट के अलग-अलग आँकड़े चाहिए होंगे.

RT-PCR को कोरोना जाँच का गोल्ड स्डैंडर्ड टेस्ट माना जाता है.

हालाँकि पिछले दो सप्ताह के टेस्टिंग के आँकड़ों की बात करें, तो टेस्टिंग में ज़्यादा कमी नहीं आई है. 16 सितंबर को भारत में तकरीबन 10 लाख 9 हज़ार टेस्ट हुए थे, वहीं 23 सितंबर को 9 लाख 95 हज़ार टेस्ट हुए हैं.

भारत सरकार पर आरोप लगते रहे हैं कि जिस रिकवरी रेट को केंद्र सरकार अपनी सफलता का पैमाना बता रही है, दरअसल वो टेस्ट कम होने की वजह से ही बढ़ा है. लेकिन मंगलवार को केंद्रीय स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण ने भी ऐसे आरोपों को सिरे से ख़ारिज करते हुए कहा कि इस तरह के आरोप निराधार हैं.

कोरोना पर हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार टेस्टिंग का दैनिक, सप्ताहिक और हर 15 दिन पर विश्लेषण कर रही है. इसके अलावा राज्यों के आँकड़ों पर भी हमारी नज़र रहती है. सभी विश्लेषणों में टेस्टिंग कम हो रही है-ऐसा नहीं पाया गया है.

7 राज्य, जो भारत का कोरोना ग्राफ़ बिगाड़ रहे हैं

भारत में सबसे ज़्यादा प्रभावित सात राज्यों की बात करें, तो महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, दिल्ली और पश्चिम बंगाल का नाम आता है.

दिल्ली के अलावा बाक़ी सभी राज्यों में पिछले दिनों कोरोना के नए मामलों में कमी देखने को मिले हैं.

ग्रामीण इलाक़ों में कोरोना का कहर

लेकिन रोज़ बढ़ते मामलों के साथ डर इस बात का है कि ग्रामीण इलाक़ों में कोरोना पैर पसारता जा रहा है.

पब्लिक हेल्थ फ़ाउंडेशन ऑफ़ इंडिया के डॉक्टर गिरधर आर बाबू ने भी ऐसी ही चिंता ज़ाहिर की है.

बीबीसी के सवालों का लिखित में उत्तर देते हुए उन्होंने कहा, "कोरोना ग्राफ़ के कर्व में एक दिन अगर गिरावट दर्ज़ की जाती है, तो इसका ख़ास मतलब नहीं होता. अगर ये ट्रेंड कुछ दिनों तक बना रहे, तो ही माना जा सकता है कि ग्राफ़ में सुधार है. हमें टेस्ट की संख्या बढ़ाने के साथ साथ पॉज़िटिव मामलों का पता सही तरीक़े से लगाने की करने की ज़रूरत है. अगर ऐसा करने के बाद कर्व नीचे आता है, तो इसका निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि जहाँ पहले ज़्यादा मामले थे, अब उन इलाक़ों में कोरोना का ग्रोथ रेट कम हो गया है. हालाँकि छोटे शहरों और ग्रामीण इलाक़ों में हमें कोरोना के मामले में बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है."

सरकार को भी ग्रामीण इलाक़ों की चिंता सता रही है. नीति आयोग के सदस्य (स्वास्थ्य) वीके पॉल ने कहा है कि सरकार तैयारी में है कि हर ज़िला अस्पताल में, जहाँ 100 से ज़्यादा बेड हैं, वहाँ मेडिकल के पीजी स्टूडेंट को तीन महीने के लिए इंटर्नशिप पर भेजा जाएगा, ताकि अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी से निपटा जा सके और छात्रों को भी ज़िला अस्पताल में काम करने का अनुभव मिल सके.

लेकिन गाँव में कोरोना किस तरह से पाँव पसार रहा है, इसके लिए देश में हुए दूसरे सीरो सर्वे के नतीजों का इंतज़ार करना पड़ेगा. सरकार का वादा है कि बहुत जल्द दूसरे सीरो सर्वे के नतीजों को सार्वजनिक किया जाएगा.

डॉक्टर रमन गंगाखेडकर कहते हैं कि राष्ट्रीय स्तर पर हुए दूसरे सीरो सर्वे में ग्रामीण और शहरी इलाक़ों में अलग से स्टडी भी की गई है.

इसके अलावा हर सप्ताह होने वाली कोरोना की प्रेस कॉन्फ्रेंस में सरकार ने एक बार फिर रिकवरी रेट को लेकर अपनी ही पीठ ठोकी है. केंद्र सरकार के मुताबिक़ भारत का रिकवरी रेट दुनिया में सबसे बेहतर हैं. पिछले चार दिनों से रोज़ आने वाले कोरोना के नए मामलों के मुक़ाबले कोरोना से ठीक होने वालों की संख्या अधिक है.

सरकार इस बात पर भी अपनी पीठ थपथपा रही है कि जहाँ 7 जुलाई तक हमने एक करोड़ टेस्ट किए थे. वहीं 22 सितंबर तक कुल टेस्ट की संख्या 6 करोड़ से भी ज़्यादा हो गई है. यानी ढाई महीने के अंतराल में टेस्टिंग में छह गुना से ज़्यादा की वृद्धि हुई है.

हालाँकि वीके पॉल ने ये भी कहा कि आने वाला मौसम त्यौहारों का है. इसमें कोरोना नए तरीक़े से पैर पसार सकता है, इसलिए जनता को पहले के मुक़ाबले और ज़्यादा सतर्क रहने की ज़रूरत है.

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