फ़्रांस से मिला रफ़ाल, रक्षा के मामले में आत्मनिर्भरता की चुनौतियाँ- नज़रिया

    • Author, लेफ़्टिनेंट जनरल सतीश के दुआ (रिटायर्ड)
    • पदनाम, रक्षा विशेषज्ञ, बीबीसी हिंदी के लिए

फ़्रांस से ख़रीदे गए रफ़ाल विमानों की पहली खेप भारत पहुँच चुकी है और ये लड़ाकू विमान औपचारिक तौर पर भारतीय वायुसेना के हिस्सा बन चुके हैं.

ये लड़ाकू विमान हमारी सेना की उन ज़रूरतों को पूरा करते हैं जिनकी लंबे समय से कमी महसूस की जा रही थी. विशेष तौर पर लद्दाख में जारी भारत-चीन तनाव के बीच तो इनकी अहमियत और बढ़ जाती है.

लेकिन भारत को अभी तक केवल पाँच रफ़ाल विमान ही मिले हैं और अगर फ़्रांस से हुए सौदा के तहत पूरे 36 रफ़ाल विमान मिल भी जाएंगे तो इससे सेना के केवल दो और स्क्वाड्रन तैयार होंगे.

ऐसे में अपनी रक्षा ज़रूरतों को पूरा करने के लिए और भी बहुत कुछ चाहिए लेकिन हम विदेश से ही इस तरह के हथियार ख़रीदते रहे, न तो ये मुमकिन है और न ही ऐसा करना चाहिए.

अब देश को ज़रूरत है 'मेक इन इंडिया' की और अब जबकि आत्मनिर्भर भारत के तहत मिशन मोड पर इस दिशा में प्रयास किए जा रहे हैं तो हथियारों को भारत में ही बनाने की ज़रूरत है.

कोई भी राष्ट्र आत्मनिर्भर हुए बग़ैर क्षेत्रीय स्तर पर शक्तिशाली बनने की आकांक्षा नहीं कर सकता, लेकिन आज के दौर में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो पाना आसान नहीं है.

ऐसे में फ़िलहाल की ज़रूरतों के लिए रफ़ाल फाइटर जेट ख़रीदना तो ठीक है लेकिन ज़रूरत इस बात की है कि देश में ही बने लड़ाकू विमान भारत की रक्षा ज़रूरतों को पूरा करें.

लेकिन स्वदेशीकरण की हमारी कोशिशों के वांछित नतीजे नहीं मिल रहे हैं. इसके पीछे एक बुनियादी ख़ामी है. इस क्षेत्र में उत्पादन के साथ-साथ रिसर्च एंड डेवेलपमेंट के काम के लिए हम पब्लिक सेक्टर पर निर्भर हैं जबकि बहुत पहले से इसमें बड़े पैमाने पर निजी सेक्टर को भी शामिल किया जाना चाहिए था.

आज भी हथियारों के उत्पादन के मामले में निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र आपस में प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं. उन्हें साथ मिल कर काम करना चाहिए. हालांकि कुछ हद तक प्रतिस्पर्धा का होना दोनों सेक्टरों के लिए फ़ायदेमंद भी है.

अमरीका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में पब्लिक और प्राइवेट सेक्टर मिलकर काम करते हैं. चीनी मॉडल को समझने की कोशिश करें तो वहां भी भारत की तरह सरकारी कंपनियाँ ही रक्षा के सामान बनाती हैं.

उत्पादन के साथ-साथ डिज़ाइन और डेवेलपमेन्ट के लिए कोलैबोरेटरी मॉडल के रूप में चीन ने अपने रक्षा क्षेत्र को निजी सेक्टर के लिए खोल दिया है. चीनी सेना को देश में ही बने रक्षा उत्पाद ख़रीदने होते हैं जिसमें वो चाहें तो ज़रूरत के अनुसार बाद में बदलाव कर सकते हैं.

मौजूदा हालात देश के भीतर लाइट कॉम्बैट विमान (एलसीए) यानी कम वज़न वाले सुपरसोनिक लड़ाकू विमान बनाने के लिए उचित हैं. इसका निर्माण हिन्दुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड करती है. यह सच है कि ये दुनिया के बेहतरीन लड़ाकू विमानों में से नहीं है, लेकिन बाद में ज़रूरत के अनुसार इसमें बदलाव किए जा सकते हैं.

इसकी ज़िम्मेदारी वायुसेना को दे दी जानी चाहिए. असल में विमानन उद्योग में यूज़र इंटरफ़ेस कम ही है.

दूसरी ओर, भारतीय नौसेना साठ के दशक में डिज़ाइन निदेशालय की स्थापना के बाद से ही जहाज़ निर्माण कर रही है. लाइट कॉम्बैट विमानों के उत्पादन में सुधार के लिए वायु सेना प्रमुख को ज़िम्मेदार बनाया जाना चाहिए.

लेकिन इस मक़सद को हासिल करने के लिए ज़रूरी है कि वायुसेना प्रमुख को विमानन इंडस्ट्री से जुड़े तीन प्रमुख संगठनों हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (एचएएल), एयरोनॉटिकल डेवलपमेंट एजेंसी (एडीए) और गैस टर्बाइन रिसर्च एजेंसी (जीटीआरई) की गतिविधियों को को-ऑर्डिनेट करने का भी अधिकार दिया जाएगा.

अगर देश अंतरिक्ष के क्षेत्र में सफलता की कहानी लिख सकता है तो ऐसा कोई कारण नज़र नहीं आता है कि यह सफलता विमानन क्षेत्र में ना मिले. इसरो और गोदरेज के बीच की साझेदारी भी एक उदाहरण है, जिससे सीखा जा सकता है.

स्पेस प्रोग्राम और सैटेलाइट इंडस्ट्री के बने सामान का इस्तेमाल सुरक्षा के अलावा नागिरक फ़ायदों के लिए भी होता है. उसी तरह विमानों का भी फ़ायदा हो सकता है.

भारत में विमानन क्षेत्र ने प्राइवेट सेक्टर की क्रय शक्ति को बढ़ाने में मदद की है.

अगले लगभग एक दशक में अनुमान है कि भारत एक हज़ार से ज़्यादा नए कमर्शियल एयरक्राफ़्ट हासिल करेगा. भारतीय सेना भी लगभग इतने ही विमान ख़रीदना चाहती है. राष्ट्रीय स्तर पर इसका फ़ायदा होगा. भारत दुनिया का अकेला ऐसा देश है जहां सैन्य और असैन्य क्षेत्र दोनों में अलग-अलग एयरशोज़ होते हैं. जबकि विकसित देशों में भी दोनों एक साथ होते हैं.

भारत में इसके बढ़ते बाज़ार को देखते हुए विदेशी कंपनियां भी भारत में अपनी कंपनी लगाना चाहेंगी हालांकि जिन कुछ कंपनियों ने ऐसा कर लिया है, उन्हें अभी उतना मुनाफ़ा नहीं हो रहा है.

भारतीय वायुसेना ने 40 एलसीए एमके-1 तेजस लड़ाकू विमानों का ऑर्डर दिया है. इसके अलावा 83 एलसीए एमके-2 विमान की ख़रीद को रक्षा मंत्रालय से मंज़ूरी मिल चुकी है. इसके अलावा हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को हल्के हेलिकॉप्टर बनाने के लिए ऑपरेशनल मंज़ूरी मिल गई है. ये हल्के हेलिकॉप्टर पुराने पड़ चुके चीता और चेतक हेलिकॉप्टरों की जगह लेंगे.

हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड को काम की गति बढ़ाने के बावजूद इन्हें तय समय में बनाने में दिक़्क़त होगी. इसका स्वाभाविक समाधान यही है कि इसमें प्राइवेट सेक्टर को शामिल किया जाए. यह बिल्कुल सही समय है कि प्राइवेट सेक्टर को इस काम के लिए लाइसेंस दिया जाए.

इससे ना केवल भारतीय वायु सेना को मदद मिलेगी कि वो बहुत कम समय में अपने ऑपरेशनल ज़रूरतों में कमी को पूरा कर सकेगी, बल्कि उड्डयन के क्षेत्र में प्राइवेट सेक्टर को भी बढ़ावा मिलेगा. इससे 'मेक इन इंडिया' का मक़सद भी पूरा होगा.

जिस तरह से मारूति कंपनी ने छोटे-छोटे वेंडरों को सफल होने का मौक़ा दिया, ठीक उसी तरह विमानन के क्षेत्र में प्राइवेट प्लेयरों के शामिल होने से ओईएम यानी इक्यूपमेंट बनाने वाली कंपनी या कारख़ाने जो कि दरअसल एमएसएमई हैं उनको भी लाभ पहुंचेगा और आत्मनिर्भर भारत परियोजना में मददगार साबित होगा.

निजी उद्योगों को बराबर का भागीदार बनाने के लिए ज़रूरत है कि परिवर्तनकारी सुधारों को लागू किया जाए. रक्षा क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भागेदारी के लिए परिस्थितियों को अनुकूल बनाने के बाद भी उन्हें आधुनिक तकनीक की ज़रूरत होगी, जिसकी हमारे देश में गंभीर कमी है.

तकनीकी की इस कमी को कम करने या दूर करने के लिए बड़े प्लेटफॉर्म्स के लिए एक 'रणनीतिक साझेदारी' की शुरुआत की गई है ताकि निजी क्षेत्र दुनिया की बड़ी रक्षा कंपनियों के सहयोग से अपने तकनीक को बेहतर कर सकें.

भारत को आयात के विकल्प से आगे बढ़कर सोचने की ओर ध्यान देना होगा. स्वदेशीकरण लंबे समय तक सार्वजनिक क्षेत्र पर निर्भर रहा है और अब निजी क्षेत्र की भागीदारी एक आत्मनिर्भर सुरक्षित भारत को बढ़ावा देने में मददगार साबित हो सकती है.

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