मेनोपोज़ के बाद ब्लीडिंग कहीं ख़तरे की घंटी तो नहीं?

    • Author, सुशीला सिंह
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

एक निजी अस्पताल में काम करने वालीं 55 वर्षीय सरला (बदला हुआ नाम) का मेनोपोज़ हो चुका था. लेकिन, बीते तीन सालों से उन्हें कई बार ब्लीडिंग की शिकायत हो रही थी. बेटी की शादी होने वाली थी तो घर की अपनी व्यस्तताएं थीं और दूसरी तरफ़ अस्पताल का काम.

जब उन्होंने अपनी सहकर्मी से इस बारे में बात की तो उन्होंने सरला को डॉक्टर को दिखाने की सलाह दी. सरला जानती थी कि उन्हें डॉक्टर से सलाह लेनी चाहिए लेकिन अपने घरेलू और अस्पताल के कामों के बीच उनकी ये समस्या सबसे पीछे थी.

लेकिन, जब उनकी दिक्कत बढ़ गई तो उन्होंने डॉक्टर को दिखाने का फ़ैसला लिया. डॉक्टरी जांच में पता चला कि सरला को बच्चेदानी के अंदर का एंडोमीट्रिएल कैंसर है जो काफी बढ़ चुका है. डॉक्टर्स को सरला की सर्जरी करनी पड़ी.

सरला अगर अपना इलाज पहले ही शुरू करवा लेतीं तो शायद उनको कैंसर बनने से पहले या फस्ट स्टेज में उसका पता चल जाता.

सरला पढ़ी लिखी थीं और ख़ुद एक अस्पताल में ही काम करती थीं लेकिन अक्सर देखा गया है कि महिलाएं अपनी सेहत को लेकर लापरवाह हो जाती हैं या आपस में ही बातचीत के ज़रिए समस्या का समाधान निकालने लगती हैं. वहीं, कई बार महिलाएं शर्म के चलते इन विषयों पर बात ही करना पसंद नहीं करतीं और डॉक्टर को खुलकर समस्या बताने से कतराती हैं.

लेकिन क्या मेनोपोज़ के बाद ब्लीडिंग होना आम बात है? इस सवाल का जवाब जानने से पहले हमें ये समझना चाहिए कि मेनोपोज़ होता क्या है और ये भारतीय महिलाओं में औसतन किस उम्र में होता है.

स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉक्टर एसएन बसु के अनुसार, ''मेनोपोज़ तब होता है जब आपके शरीर में ओवरी काम करना बंद कर देती है, बच्चेदानी की झिल्ली पतली हो जाती है और ब्लीडिंग बंद हो जाती है. किसी महिला में मेनोपोज़ हुआ है कि नहीं उसके लिए एक बल्ड टेस्ट(एफ़एचएस लेवल) करवाया जाता है. अगर इसका लेवल 30 से ऊपर होता है तो महिला का मेनोपोज़ हो चुका है.''

मेनोपोज़ कब माना जाए?

दुनिया में जहां महिलाओं में मेनोपोज़ की औसत उम्र 49-51 मानी जाती है वहीं भारतीय महिलाओं में मेनोपोज़ 47-49 की उम्र में हो जाता है यानि भारतीय महिलाओं को दुनियाभर की महिलाओं के मुकाबले मेनोपोज़ जल्दी होता है.

डॉक्टरों के अनुसार जैसे किसी भी महिला की गर्भावस्था एक जैसी नहीं होती वैसे ही मेनोपोज़ भी एक जैसा नहीं होता. मेनोपोज़ से पहले कुछ महिलाओं को सामान्य माहवारी होती है और वो बंद हो जाती है तो कुछ महिलाओं में माहवारी का बहाव धीरे-धीरे कम होने लगता है. वहीं, कुछ में पीरियड्स साइकिल में बदलाव हो जाता है और उसका अंतराल बढ़ जाता है.

इस समय को पेरीमेनोपोज़ कहा जाता है और इसकी अवधि कुछ महीनों से लेकर तीन-चार साल हो सकती है. अगर किसी महिला को अंतिम माहवारी के बाद 12 महीने तक पीरियड्स नहीं आते हैं तो ये मान लिया जाता है कि महिला को मेनोपोज़ हो गया है.

लेकिन, मेनोपोज़ के बाद अगर किसी महिला को ब्लीडिंग होती है तो इसे असामान्य माना जाता है.

कैंसर की आशंका

स्त्री रोग विशेषज्ञ भावना चौधरी मेनोपोज़ के बाद ब्लीडिंग का कारण बताते हुए कहती हैं कि कई बार बढ़ती उम्र के साथ महिलाओं के जननांगों में सुखाव होना, बच्चेदानी के मुंह पर रसौली, गर्भाश्य की परत का मोटा या पतला होना, दवाओं से होने वाले साइडइफेक्ट या इंफेक्शन हो सकता है.

मेनोपोज़ के बाद ब्लीडिंग के कई बार मामूली कारण भी हो सकते हैं और कई बार ये ख़तरानाक बीमारी का संकेत भी हो सकते है जिसमें कैंसर एक है.''

डॉ एसएन बसु कहती हैं,'' मेनोपोज़ के बाद आपको चाहे हल्का दाग़ लगे, हेवी ब्लीडिंग या किसी भी प्रकार की ब्लीडिंग होती है तो आप तुरंत डॉक्टर की सलाह लें. क्योंकि ऐसे मामलों में दस फ़ीसद कैंसर की आंशका रहती है. ये कैंसर गर्भाश्य या उसके मुंह पर हो सकता है या अंडाश्य में या वैजाइना में हो सकता है.''

डॉक्टर सलाह देते हैं कि जब भी आपको ये लक्षण दिखाई देते हैं तो आपको जांच करानी चाहिए जिसमें खून की जांच, पैप-स्मीयर, एंडोमीट्रिएल बॉयोप्सी, सोनोग्राफी और डीएनसी आदि शामिल हैं.

डॉक्टर ये भी बताती हैं कि कई बार महिलाएं ये मान लेती हैं कि अगर उन्हें दो-तीन महीने माहवारी नहीं आई है तो मेनोपोज़ हो गया है और वे गर्भनिरोध के साधन या सावधानी बरतनी बंद कर देती हैं. इससे कई बार महिलाएं ऐसी उम्र में प्रेग्नेंट हो जाती हैं, जब उनका परिवार पूरा हो चुका होता है.

डॉक्टर ये बताती हैं कि उनके पास ऐसी समस्याओं के साथ भी पति-पत्नी आते हैं जहां कई बार गर्भपात बहुत मुश्किल हो जाता है और उनके लिए स्थिति काफ़ी असहज हो जाती है.

इसलिए वे सलाह देते हैं कि जब तक मेडिकली पुष्टि न हो जाए कि महिला को मेनोपोज़ हो गया है तब तक एक कपल को सावधानी बरतनी चाहिए.

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