You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
चीन भारत सीमा विवाद: चीन जंग जीतकर भी अरुणाचल प्रदेश से पीछे क्यों हट गया था?
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बात साल 1962 की है जब चीन और भारत के बीच युद्ध छिड़ गया था.
तब चीन की सेना ने अरुणाचल प्रदेश के आधे से भी ज़्यादा हिस्से पर कब्ज़ा कर लिया था.
फिर चीन ने एकतरफ़ा युद्ध विराम घोषित कर दिया और उसकी सेना मैकमोहन रेखा के पीछे लौट गई.
सामरिक मामलों के जानकार भी इसी उधेड़ बुन में हैं कि जब चीन, अरुणाचल प्रदेश पर दावा करता रहता है तो आख़िर 1962 की लड़ाई के दौरान वो क्यों पीछे हट गया?
वो चाहता तो युद्ध के बाद भी कब्ज़ा किए गए इलाक़े को अपने पास ही रख सकता था.
चीन का एतराज़
चीन कहता रहता है कि वो अरुणाचल प्रदेश को मान्यता नहीं देता क्योंकि ये उसके 'दक्षिणी तिब्बत का इलाक़ा' है.
यही वजह है कि तिब्बती धर्म गुरु दलाई लामा हों या फिर भारत के प्रधानमंत्री, सबके अरुणाचल दौरे पर चीन आपत्ति जताता रहा है.
साल 2009 में मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री रहते हुए अरुणाचल प्रदेश का दौरा किया था तो चीन को इस पर आपत्ति हुई.
फिर वर्ष 2014 में जीत हासिल करने के बाद प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने राज्य का दौरा किया. इस दौरे को लेकर भी चीन ने आपत्ति जताते हुए बयान जारी किया.
अरुणाचल प्रदेश पर दावा
दिल्ली स्थित 'ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन' (ओआरएफ़) में सामरिक मामलों पर शोध के विभाग प्रमुख हर्ष पंत ने बीबीसी से कहा कि सबसे बड़ी समस्या मैकमोहन रेखा का स्पष्ट रूप से मौजूद ना होना है.
उनका कहना है कि चीन चाहता है कि वो कूटनीतिक स्तर पर अरुणाचल प्रदेश पर दावा कर मामले को तूल देता रहे. मगर वो कभी भी इसका 'सक्रिय नियंत्रण' भी अपने पास नहीं रखना चाहता है.
इसकी वजह भी हर्ष पंत बताते हैं कि अरुणाचल के रहने वाले लोग कभी भी चीन के साथ खड़े नज़र नहीं आए.
साल 1914 में भारत में ब्रितानी हुकूमत थी. तत्कालीन भारत सरकार और तिब्बत की सरकारों के बीच शिमला में समझौता हुआ.
इस समझौते पर ब्रितानी हुकूमत के प्रशासक सर हेनरी मैकमोहन और तत्कालीन तिब्बत की सरकार के प्रतिनिधि ने हस्ताक्षर किए थे.
मैकमोहन लाइन
समझौते के बाद भारत के तवांग सहित पूर्वोत्तर सीमांत क्षेत्र और बाहरी तिब्बत के बीच सीमा मान ली गई.
भारत को आज़ादी 1947 में मिली जबकि पीपल्स रिपब्लिक ऑफ़ चाइना 1949 में अस्तित्व में आया.
लेकिन चीन शिमला समझौते को ये कहकर खारिज करता रहा कि तिब्बत पर चीन का अधिकार है और तिब्बत की सरकार के किसी प्रतिनिधि के हस्ताक्षर वाले समझौते को वो स्वीकार नहीं करेगा.
लेकिन भारत में तत्कालीन ब्रितानी हुकूमत ने मैकमोहन लाइन दर्शाता हुआ मानचित्र पहली बार वर्ष 1938 में ही आधिकारिक तौर पर प्रकाशित किया जबकि पूर्वोत्तर सीमांत प्रांत 1954 में ही अस्तित्व में आया.
यूं तो अरुणाचल प्रदेश को लेकर चीन ने उतनी आक्रामकता नहीं दिखाई थी लेकिन जानकारों का कहना है कि वर्ष 1986 में भारतीय सेना ने अरुणाचल प्रदेश के तवांग के सुम्दोरोंग चू के पास चीनी सेना की बनाई स्थायी इमारतें देखीं.
पहली 'फ्लैग मीटिंग'
भारतीय सेना सक्रिय हुई और उसने हाथुंग ला पर अपनी तैनाती को मज़बूत कर दिया.
सामरिक मामलों पर नज़र रखने वालों का कहना है कि ये भी ऐसा दौर था जब लगा कि चीन और भारत के बीच युद्ध की स्थिति तैयार हो गई गई है.
मामला तब शांत हुआ जब भारत के तत्कालीन विदेश मंत्री नारायण दत्त तिवारी बीजिंग पहुंचे जिसके बाद दोनों देशों की सेनाओं के बीच पहली 'फ्लैग मीटिंग' आयोजित की गई.
लेकिन बाद के सालों में चीन ने आक्रामकता दिखानी शुरू कर दी. एक बार तो दिबांग घाटी में चीन की सेना ने तो पोस्टर लगा कर इलाके को चीन के अधीन बताया. इस दौरान चीन और भारत के संबंधों पर कोई दरार नहीं दिखी.
तिब्बत का अधिग्रहण
पहली बार भारत और चीन के बीच रिश्ते तब ख़राब हुए जब 1951 में चीन ने तिब्बत का अधिग्रहण किया.
चीन का कहना था कि वो तिब्बत को आज़ादी दिला रहा है. इसी दौरान भारत ने तिब्बत को अलग राष्ट्र के रूप में मान्यता दी.
अरुणाचल प्रदेश अलग राज्य के रूप में वर्ष 1987 में अस्तित्व में आया. वर्ष 1972 तक इसे नॉर्थ ईस्ट फ्रंटियर एजेंसी के नाम से जाना जाता था. 20 जनवरी 1972 को इसे केंद्र शासित प्रदेश का दर्जा दिया गया और इसका नाम अरुणाचल प्रदेश कर दिया गया.
पूर्व में स्थित अनजाव से लेकर राज्य के पश्चिम में स्थित तवांग तक 'लाइन ऑफ़ एक्चुअल कंट्रोल' यानी 'एलएसी' के आस पास के 1126 किलोमीटर के इलाके के पास चीन की गतिविधियों के निरंतर बढ़ते रहने की बात सामने आने लगी.
बीच-बीच में चीन मानचित्र जारी भी करता रहता है जिसमें अरुणाचल प्रदेश के कई इलाकों को वो अपना हिस्सा बताता रहता है.
'पीपल्स लिबरेशन आर्मी'
सबसे ज़्यादा गतिविधियाँ दिबांग घाटी में देखी गई हैं जहां से चीन की 'पीपल्स लिबरेशन आर्मी' की घुसपैठ की खबरें मिलती रहती हैं.
नियंत्रण रेखा के पास स्थित इलाकों में चीनी सेना अपनी मौजूदगी लगातार बढ़ाता भी जा रहा है और कई इलाकों में उसने सड़कें और नदियों पर पुल बनाने का भी काम किया है.
सामरिक मामलों के जानकार सुशांत सरीन कहते हैं कि बहुत से विशेषज्ञों का कहना है कि 1962 में चीन वैसा ताक़तवर नहीं था जैसा अब है.
इसलिए युद्ध के बाद उसने खुद को पीछे खींच लिया. लेकिन ये बात भी सही है कि भारत भी 1962 वाला भारत नहीं रह गया है.
सुशांत सरीन ने कहा, "चीन भी जानता है कि भारत की सैन्य ताक़त अब कमज़ोर नहीं रह गयी है. भारत पहले से ज़्यादा मज़बूत है. लेकिन चीन तवांग के मठ पर क़ब्ज़ा कर बौध धर्म को अपने नियंत्रण में रखना चाहता है. तवांग मठ 400 साल पुराना है और ये माना जाता है कि छठे दलाई लामा का जन्म भी तवांग के पास वर्ष 1683 में हुआ था."
वो कहते हैं कि इसलिए चीन ने अरुणाचल प्रदेश के रहने वालों को चीन में प्रवेश के लिए वीज़ा के होने को ज़रूरी नहीं माना.
लेकिन जिस बात से अरुणाचल के राजनीतिक दल और स्थानीय लोग परेशान हैं, वो है चीन की बढ़ रहीं गतिविधियाँ.
कई नेताओं ने केंद्र सरकार का ध्यान भी इस ओर आकर्षित किया है. इनमें से एक हैं अरुणाचल प्रदेश (पूर्वी) सीट के सांसद तापिर गाओ जिन्होंने इसको लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी भी लिखी है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)