यश गांधीः क़दम कमज़ोर, पर पा ही ली मंज़िल

यश

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    • Author, मधु पाल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

कहते हैं 'जहाँ चाह वहाँ राह'. कुछ ऐसा ही कर दिखाया है मुंबई में रहने वाले 21 साल के यश अवधेश गांधी ने. ज़िंदगी की मुश्किल चुनौतियों का सामना करते हुए यश आईआईएम लखनऊ तक पहुंच गए हैं जहां पहुंचना बहुतेरे छात्रों का सपना होता है.

यश की कहानी इसलिए प्रेरणादायक है क्योंकि वे सेरेब्रल पॉल्सी और डिस्लेक्सिया जैसी बेहद गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं. लड़खड़ा कर चल पाते हैं लेकिन हौसले को लेकर उनके क़दम नहीं लड़खड़ाए.

मुश्किलों के बाद भी यश ने मैनेजमेंट की प्रवेश परीक्षा कैट की तैयारी की और 92.5 अंक लाकर न केवल अपने माता पिता का नाम रोशन किया बल्कि कई युवाओं के लिए मिसाल बन गए. यहां भी ध्यान देने की वाली बात है कि उन्हें लिखित परीक्षा देने के लिए एक राइटर की ज़रूरत होती है, वह ख़ुद अपना पेपर नहीं लिख सकते.

यश गांधी

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'अपने आप को बाक़ी सामान्य लोगों जैसा ही मानता हूँ'

सेरेब्रल पॉल्सी और डिस्लेक्सिया ऐसी स्थिति को कहते हैं जिसमें शरीर की ज़रूरी मांसपेशियां कमज़ोर हो जाती हैं. आईआईएम लखनऊ में शैक्षणिक सत्र 2020-22 के लिए विकलांग कोटा के तहत यश अवधेश गाँधी ने दाखिला लिया है. यश के नंबर देख उन्हें कई बड़े बड़े आईआईएम संस्थान से प्रस्ताव आया लेकिन उन्होंने आईआईएम लखनऊ का हिस्सा बना पसंद किया.

बीबीसी हिंदी ने उनसे बात की. बीबीसी को यश बताते हैं, "बचपन से ही मुझे पढ़ाई का शौक रहा है. मैंने हमेशा पढ़ाई को अपनी ज़िन्दगी बनाया है इसलिए मुझे पढ़ाई में कोई दिक्कत नहीं आई. 12वीं कक्षा से ही मैंने लक्ष्य बनाया था कि मुझे एमबीए करना है और वहीं से मैंने अपनी तैयारी शुरू की. 2019 में मैंने कैट के लिए अप्लाई किया था."

वीडियो कैप्शन, इस महिला के दोनों हाथ कटे, लेकिन हौसला नहीं!

अपने अब तक के सभी संघर्षों को याद करते हुए यश कहते हैं कि, "मेरी पढ़ाई में रूचि बचपन से ही रही है लेकिन मुझे गणित को समझने में बहुत दिक्कत आती थी, मेरी लिखाई भी ठीक नहीं हो पाती थी."

"मैं बहुत उदास रहने लगा था, मैं एमबीए का सपना छोड़ने को भी तैयार हो गया था लेकिन मेरे माता पिता ने मुझे समझाया और मेरा छोटा भाई हर्षल जो अभी 12वीं कक्षा में पढ़ता है उसी ने मुझे गणित सिखाया और वही मेरी देखभाल भी करता है. मेरे साथ कई बार ऐसा हुआ कि कुछ लोगों ने मुझे समझने की कोशिश की लेकिन कुछ लोगों ने थोड़ी भी इच्छा नहीं जताई मुझे समझने की."

यश गांधी

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"मुझे उनके रवैये से फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि मैं अपने आप को किसी से कम नहीं समझता. मैं भी अपने आप को बाक़ी सामान्य लोगों जैसा ही मानता हूँ. हमें कभी अपने आप से निराश नहीं होना चाहिए और न ही ये सोचना चाहिए कि मुझसे ये नहीं हो सकता. मैं अपने तज़ुर्बे से बस यही कहूंगा कि वक़्त ज़रूर लग सकता है लेकिन नामुमकिन कुछ भी नहीं हैं और अब मेरा सपना है कि भारत की सबसे बेहतरीन कंपनी में से किसी एक बड़ी कंपनी में काम करूँ."

पैदा होने के बाद हिलना डुलना बंद कर दिया था

यश की कामयाबी में उनके माता-पिता का बहुत बड़ा योगदान रहा है. यश के पिता अवधेश गाँधी एक निजी कंपनी में काम करते हैं और उनकी माँ जिग्ना शाह घर पर टिफ़िन सेवा देने का काम करती हैं.

यश के पिता अवधेश कहते हैं, "यश जब पैदा हुए तो उनका शरीर हिलता डुलता नहीं था. वो सात महीने के हुए तो डॉक्टरों ने बता दिया था कि जब तक ये बड़ा नहीं होगा तब तक आपको इसकी पूरी देख रेख करनी होगी. हमारी ज़िंदगी का बस एक ही मकसद था, यश को अपने पैरों पर खड़ा करवाना क्योंकि आज हम हैं, कल हम नहीं रहे तो वो किसी के भरोसे न रहें. इसलिए हम सब दुःख दर्द सहने को तैयार थे, हम उसे उनके पैरों पर खड़ा देखना चाहते थे."

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सामान्य बच्चों की तुलना में अधिक मेहनत करनी पड़ी

यश के पिता के मुताबिक उनके बेटे ने काफ़ी मेहनत की है. वे बताते हैं, "यश को हमने बचपन से ही सामान्य बच्चों वाले स्कूल में डाला. जब वह स्कूल गया तो उसे सीखने में मुश्किलों का सामना करना पड़ा और वह अपने सहपाठियों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में सक्षम नहीं था. लेकिन उसने धीरे-धीरे सीखा."

अपने बेटे की तारीफ़ करते हुए उनका चेहरा गर्व से भरा हुआ दिखता है.

वीडियो कैप्शन, हौसलों से मुश्किलों को मात

वे बताते हैं, "मेरे बेटे को सामान्य बच्चों की तुलना में अधिक मेहनत करनी पड़ी इसके बावजूद भी अपने कॉलेज में उसने पहला रैंक हासिल किया. मैं बहुत खुश हूँ क्योंकि जब मैंने प्रवेश के लिए फ़ीस भरी थी तब यश दो दिन तक रोता रहा ये सोचकर कि अगर उसने कैट की परीक्षा नहीं पास की तो उसके पिता का पैसा डूब जाएगा."

"उसे जब पता चला कि कोचिंग के लिए जो पैसे दिए हैं वो वापस नहीं मिलेंगे तो वो मुझसे कहता था कि मैं थोड़े समय के लिए नौकरी कर लेता हूँ जिससे आपका पैसा वापस दे सकूं लेकिन हमने उसको समझाया कि अगर नहीं सफल हुए तो ज़्यादा से ज़्यादा क्या होगा. कोशिश तो करो."

वीडियो कैप्शन, उम्र 90 की लेकिन हौसला बुलंद

यश गांधी नई शुरुआत के लिए पूरी तरह तैयार हैं, "अब जब आईआईएम लखनऊ में दाखिला हो गया है तो बेहद खुश हूँ और ऑनलाइन क्लासेस के ज़रिए अपनी पढ़ाई कर रहा हूँ. यहाँ भी थोड़ा संघर्ष है. कई घंटों तक लैपटॉप के सामने बैठना पड़ता है लेकिन इस नए संघर्ष के लिए मैं तैयार हूँ, क्योंकि मैं मानता हूँ ज़िंदगी में आपको सब कुछ तभी मिलता है जब हम तक़लीफ़ों का सामना करते हैं."

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