You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
'मन की बात' कहने वाले नेताओं का क्या होगा कांग्रेस में भविष्य
- Author, कमलेश
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
कांग्रेस में आया तूफ़ान अभी थमाता नज़र नहीं आ रहा है. कांग्रेस के 23 वरिष्ठ नेताओं के केंद्रीय नेतृत्व को पत्र लिखने के बाद अब फिर से नया विवाद खड़ा हो गया है.
साल 2022 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव की तैयारियों के लिए ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी ने सात समीतियों का गठन किया है.
इसमें घोषणा पत्र समिति, विस्तार समिति, सदस्यता समिति, कार्यक्रम कार्यान्वयन समिति, प्रशिक्षण और काडर विकास समिति, पंचायत चुनाव समिति और मीडिया और संचार सलाहकार समिति शामिल हैं.
लेकिन, किसी भी समिति में कांग्रेस नेता जितिन प्रसाद, राज बब्बर और आरपीएन सिंह को शामिल नहीं किया गया है.
ये तीनों नेता कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष सोनिया गांधी को पत्र लिखने वाले 23 नेताओं में शामिल थे.
हाल ही में यूपी से जितिन प्रसाद पर कार्रवाई करने की माँग भी उठी थी जिसका कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने विरोध किया था. उन्होंने कहा था कि ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि यूपी में जितिन प्रसाद को आधिकारिक रूप से निशाने पर लिया जा रहा है. कांग्रेस को अपने लोगों पर निशाना साधने की बजाय बीजेपी पर सर्जिकल स्ट्राइक करनी चाहिए.
वैसे तो ये पत्र 23 नेताओं की ओर से लिखा गया था लेकिन यूपी की समितियों में जितिन प्रसाद, राज बब्बर और आरपीएन सिंह का नाम ना होना अहम माना जा रहा है.
इन तीनों नेताओं की यूपी कांग्रेस में सक्रिय भूमिका रही है. जितिन प्रसाद यूपी से सांसद रह चुके हैं और पार्टी का ब्राह्मण चेहरा माने जाते हैं.
राज बब्बर पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान यूपी में प्रदेश अध्यक्ष की ज़िम्मेदारी संभाल चुके हैं. इसके अलावा आरपीएन सिंह यूपी से लोकसभा चुनाव जीत चुके हैं. वह उत्तर प्रदेश यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष भी रहे हैं. आरपीएन सिंह वर्तमान में ओडिशा के प्रभारी भी हैं.
क़रीब दो हफ़्ते पहले सोनिया गांधी को पत्र लिखने और फिर समितियों से बाहर रखे जाने से चर्चा शुरू हो गई है कि क्या इनके ज़रिए असंतुष्ट नेताओं को संदेश दिया गया है? क्या केंद्रीय नेतृत्व ने अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की है.
‘फ़ुल स्टॉप नहीं, कॉमा है’
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई इसे कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं के लिए एक संकेत मानते हैं. उनके अनुसार ये फ़ुल स्टॉप तो नहीं लेकिन कॉमा ज़रूर है.
रशीद किदवई कहते हैं, “समितियों में यूपी के सक्रिय नेताओं को ना रखा जाना एक तरह से असंतुष्ट नेताओं को संदेश है कि अगर आप पार्टी के कार्यक्रम और पार्टी लाइन से नहीं जुड़ेंगे तो आपकी यूपी चुनाव में वो भूमिका नहीं होगी जैसी आप उम्मीद करते हैं. अगर इनके रुख़ में कुछ बदलाव आता है तो पार्टी इन्हें अहम भूमिकाएं दे सकती है क्योंकि यूपी चुनाव में क़रीब दो साल का समय है और कई समितियां आगे भी बनेंगी.”
वहीं, हिंदुस्तान टाइम्स अख़बार में राजनीतिक संपादक विनोद शर्मा मानते हैं कि अभी निष्कर्ष निकालना बहुत जल्दबाज़ी होगी. वर्तमान में तो इस फ़ैसले के पीछे वो पत्र ही वजह नज़र आता है लेकिन अभी चुनाव बहुत दूर हैं और कभी भी समितियों का विस्तार हो सकता है. ऐसे में फ़िलहाल कुछ नहीं कहा जा सकता.
जिस पत्र को कांग्रेस के इस फ़ैसले की वजह बताया जा रहा है वो कांग्रेस कार्य समिति की बैठक से पहले भेजा गया था.
क्या थी वरिष्ठ नेताओं की माँग?
23 वरिष्ठ नेताओं ने सोनिया गांधी को पत्र लिखकर पार्टी के भीतर शीर्ष से लेकर नीचे तक बड़े बदलाव की बात की थी. पत्र लिखने वाले नेताओं में पाँच पूर्व मुख्यमंत्री, कांग्रेस वर्किंग कमेटी के कई सदस्य, मौजूदा सांसद और पूर्व केंद्रीय मंत्री शामिल हैं.
पत्र में कहा गया था की पार्टी से लोगों का भरोसा कम हुआ है और युवा भी पार्टी से दूर हुए हैं. इसमें कांग्रेस के लिए पूर्ण-कालिक और प्रभावी नेतृत्व की माँग की गई थी जो ना सिर्फ़ लोगों को दिखाई दे, बल्कि ज़मीनी स्तर पर सक्रिय हो और पार्टी को नया रूप देने में प्रभावी साबित हो.
इस पत्र के बाद ये साफ़ हो गया था कि कांग्रेस दो धड़े में बंट गई है. साथ ही ये भी कहा जाने लगा कि इस पत्र के ज़रिए राहुल गांधी पर भी सवाल उठाये गये हैं. राहुल गांधी ख़ुद युवा नेता कहलाते हैं और उनके समय में युवाओं के दूर होने की बात कहकर संकेत दिया गया है.
हालांकि, इसके बाद सोनिया गांधी ही कांग्रेस की अंतरिम अध्यक्ष चुनी गईं और उन्होंने मिलकर काम करने की बात कही. लेकिन, कांग्रेस कार्य समिति की बैठक में कई कांग्रेसी नेताओं ने असंतुष्ट नेताओं का विरोध किया और उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई की माँग की.
यूपी को लेकर हुए बदलाव के बाद अब ये सवाल भी उठने लगा है कि क्या कांग्रेस ने अपने वरिष्ठ नेताओं की माँग को अनसुना कर दिया है.
क्या हुआ माँगों का?
विनोद शर्मा कहते हैं कि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि कांग्रेस के असंतुष्ट नेताओं को पूरी तरह नज़रअंदाज़ किया जा रहा है. दोनों पक्षों में बातचीत जारी है. संसदीय सत्र से पहले जो राज्यसभा समिति बनाई गई है उसमें आनंद शर्मा और ग़ुलाम नबी आज़ाद को महत्वपूर्ण जगह दी गई है. जबकि ये विरोधी स्वर वाले मुखर नेता रहे हैं. हालांकि, लोकसभा समिति में शशि थरूर और मनीष तिवारी को बाहर रखना ज़रूर कांग्रेस नेतृत्व की नाराज़गी को दिखाता है.
कांग्रेस में कुछ लोगों के असंतुष्ट होने की बात लंबे समय से चलती आ रही है. दिल्ली चुनाव में भाजपा की हार के लिए आम आदमी पार्टी को परोक्ष समर्थन देने पर सांसद मिलिंद देवड़ा ने खुलकर आपत्ति जताई थी. इसके बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस छोड़कर भाजपा में चले गए. सचिन पायलट ने भी खुलकर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर की थी और उसके बाद 23 नेताओं का पत्र आ गया.
लोकसभा चुनाव में हार के बाद राहुल गांधी के नेतृत्व पर भी सवाल उठाए जाने लगे थे. तब भी पार्टी नए और पुराने नेताओं के बीच बँटी हुई दिख रही थी. राहुल गांधी ने हार की ज़िम्मेदारी लेते हुए इस्तीफ़ा दे दिया और तब से कांग्रेस में अध्यक्ष पद को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है.
रशीद किदवई कहते हैं, “कांग्रेस के संकट को ख़त्म करने के लिए राहुल गांधी को स्पष्टतौर पर अपनी बात रखनी होगी. राहुल गांधी कांग्रेस अध्यक्ष बनाने की बात तो कहते हैं लेकिन वो ख़ुद को अध्यक्ष बनाने पर कुछ नहीं कहते.”
हालांकि, रशीद किदवई ये भी मानते हैं कि हो सकता है कि उन्हें सही समय का इंतज़ार हो. अभी बिहार चुनाव होने वाले हैं जिसमें कांग्रेस के हाथ में बहुत कुछ आता नहीं दिखता. ऐसे में वो किसी बड़ी जीत का इंतज़ार कर रहे हैं जैसे केरल और तमिलनाडु के चुनाव ताकि उनकी मज़बूत वापसी हो.
क्या कांग्रेस में होंगे चुनाव
जनवरी में एआईसीसी की बैठक होने की संभावना है. उसमें फिर से कांग्रेस अध्यक्ष का मुद्दा गरमा सकता है. पार्टी में चुनाव होने की बात भी होती रही है लेकिन, कांग्रेस में ऐसा हो पाना कितना संभव है.
इस पर विनोद शर्मा का कहना है कि कांग्रेस में पहले भी अध्यक्ष पद के लिए चुनाव हो चुके हैं. ख़ुद सोनिया गांधी चुनाव जीतकर अध्यक्ष बनी थीं. लेकिन, सवाल ये है कि कांग्रेस में गांधी परिवार के क़द का दूसरा नेता कौन है. वरिष्ठ नेता भी अपने राज्यों तक सीमित हैं और उनकी राष्ट्रीय स्तर की पहचान नहीं है. ऐसे में गांधी परिवार के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ने वाले को कितना समर्थन मिल सकेगा.
विनोद शर्मा कहते हैं कि अभी पार्टी के असंतुष्ट नेताओं ने भी अपना कोई उम्मीदवार सामने नहीं रखा है. दोनों पक्ष बातचीत और इंतज़ार की स्थिति में हैं. हो सकता है कि बात ना बनने पर वो अपना उम्मीदवार सामने लाएं. इसलिए इंतज़ार करना होगा कि ऊंट किस करवट बैठता है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)